राम हृदय में
सबके हृदय में राम—अर्थात् ईश्वर—विराजमान हैं।
तो प्रश्न उठता है: क्या रावण के हृदय में वे नहीं थे?
कर्म-सिद्धांत और free will मनुष्य को उसकी इच्छित कर्म-धारा की ओर प्रवृत्त करते हैं। रावण के हृदय में राम अप्रकट थे। जब प्रकट राम उसके सम्मुख आए, तब रावण-वध हुआ।
दुर्योधन को तो अर्जुन से पहले विराट दर्शन हुए थे, जब श्रीकृष्ण संधि प्रस्ताव लेकर कौरव सभा में गए थे।
तो क्या दुर्योधन के हृदय में राम नहीं थे?
थे—पर उसके मन पर अतृप्ति का आवरण चढ़ा हुआ था। उसी आवरण ने उसे अहंकार के भार से मुक्त नहीं होने दिया, और परिणामस्वरूप उसने राज्य भी गंवाया और प्राण भी।
यहाँ का हर कण शंकर है। जो अच्छा-बुरा घटित होता है, उसमें दूसरा कोई है ही नहीं।
तो फिर फ़रियाद किससे करें?
हाँ, इसका अर्थ यह नहीं कि बुद्धि को पायखाने में छोड़ दिया जाए। बाघ सामने आ जाए तो उसे “शिवराम” कहकर गले नहीं लगाना है; अपने शिवराम की रक्षा के लिए नौ-दस-ग्यारह करना ही होगा।
साक्षात्कार समझ का है।
नज़र बदले तो नज़ारे बदल जाते हैं।
कश्ती ने रुख बदला तो किनारे बदल जाते हैं।
जैसे-जैसे सर्वं खल्विदं ब्रह्म, वासुदेवः सर्वम्, सर्वं शिवम् की अनुभूति गहरी होती जाएगी—फ़रियादें कम होती जाएँगी; स्वीकार बढ़ता जाएगा और शांति व्याप्त होगी। त्रिविध ताप शनैः-शनैः शांत होते जाएँगे। तब रह जाएगा—सब तू ही तू, मैं ही मैं।
ईश्वर कोई कल्पना नहीं है कि कहीं कोई लोक बनाकर बैठा हो और मृत्यु के बाद जीवों को गेस्टहाउस बाँटता हो।
ईश्वर यही अस्तित्व है; अस्तित्व का आधार है।
निराधार होकर भी सबका आधार—अलख निरंजन।
शनैः-शनैः उसके रूप को समझते-समझते, अंततः स्वरूप में लीन हो जाना ही साधना है।
व्यष्टि से समष्टि की ओर,
व्यक्त से अव्यक्त की ओर—
यही समर्पण है।
24 जनवरी 2026
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