Sunday, November 21, 2021

जल में मछली।

 जल ही मछली का जीवन है, वह है भी तो जल में, बस उसका जगत छोटा कर, टुकड़ों में विभाजित कर जी रही है। वह खुद चैतन्य और सब आकृति और अनुभव चैतन्य स्याही से लिखि उसकी अपनी कृति। फिर भी वह उससे अनभिज्ञ क्यूँ? कहाँ है जगत? चैतन्य से चलती इन्द्रियों को मन से जोड़कर किया अनुभव है तब तक। लेकिन अनुभव करनेवाला और अनुभव दोनों एक ही है ऐसा पता लग जायें फिर क्या? चित्रों कहानियों को जो भी नाम दे लेकिन, मेरा जगत मेरी ही चैतन्य अभिव्यक्ति है। मैं ही मेरी चेतना-ज्ञान शक्ति से अपना जगत द्वैत (अपोहन) बनाकर अपनी स्मृति शक्ति से उसे चला रहा हूँ।


श्रीगुरू उसे अखंड शिव स्वरूप अंबा (प्रकट विश्व) का बोध कराकर संविद में स्थापित करते है तब स्वयं का साक्षात्कार होता है। 


उस श्रीगुरू को नमन। 


ओम  गुरूभ्यो नम:।  🙏

जीवन एक सफ़र।

 संसार अद्वैत का द्वैत प्राकट्य है, इसलिए बिना अद्वैत अनुभव, द्वैत को बुद्धि से समजा सकते हो लेकिन मिटा नहीं सकते। 


यह एक मनोवैज्ञानिक सफ़र है। शिव का ना जन्म है ना मृत्यु और उसी का ही यह जगत रूप में प्राकट्य है, फिर भी इतने सारे शिव (जीव) इतनी सदियों से पृथ्वी खंड पर क्यूँ लगे है? क्या अधूरापन है, कमी है, जो पूरी करनी है? जब सब कुछ, सब और ‘एक अखंड बोध’ ही है तो कौन किससे मुक्त होगा? 


जब तक जीव भाव है तब तक द्वैत जा नहीं सकता। फिर चाहे  कल्पना रंगों के कितने ही चित्र बना ले, अद्वैत अनुभूत नहीं हो सकता। शिव का अनुग्रह ही अद्वैत को  बुद्धि में प्रकाशित कर प्रत्यभिज्ञा करा सकता है, और जीव भाव से हमें मुक्त कर शिव भाव में स्थापित कर सकता है। 


एक की सफ़र और साक्षात्कार दूसरों को मार्गदर्शित कर सकती है पर सामुदायिक मुक्ति नहीं। हर जीव को अपनी मंज़िल खुद काटनी है। परम शिव जब अपनी क्रीड़ा ख़त्म करेगा, तब सब समेट लेगा। साक्षात्कार किया तब भी शिव में निवास है, और नहीं किया तब भी। शिव, शिव से अलग रहे कैसे? कभी नहीं। शिवोहम। 


पूनमचंद

संविद सेवात्मनि

संविद स्वात्मनि


तुरीया खोजन मैं चला, तूरीया मिल्या न कोय; 

मैं रह्या पर ध्यान दियो तो, सब में चिन्मय ठोर। 


मैं आत्म अखंड बोध, चैतन्य, संविद नाम;

आभास भेदे त्रिपुटी रचाई, एकोहम पंच विलास। 


मैं चैतन्य, मैं शिवा, मैं भैरव, मैं ही शक्ति तत्वा;

सर्वाकार निराकार रूप धर, बहुधा गुहा निवासा।


मैं ही वह चेतन पर्दा, काल अकाल जिस पर रमता;

पूर्णा-कृषा उभय स्वभावे, क्रम अक्रम स्वतंत्र रूपा।


ना बंधन ना मुक्ति, स्वात्म पहचाने साक्षात्कार;

छूटे जब भेद मेरा मुझसे, जग मेरा अभेद प्रकाशा। 


गुरू मैं, शिष्य भी मैं, मैं ही शंका, मैं समाधान; 

प्रकाश विमर्श विश्वरूपा, मैं ही बोध अखंडा।  


पिघल्या उसने पा लिया, बर्फ़ पानी संजोग;

शरणागत वत्सल, प्राप्तस्य मेरी प्राप्ति सरल। 


आवन जावन प्राण पथ, संधान जब प्राणन करता;

सूक्ष्म से उद्वहन सुरता, शंभु शरण विरला ज्ञाता। 


तुरीया खोजन मैं चला, तूरीया मिल्या न कोय; 

मैं रह्या पर ध्यान दिया तो, सब में चिन्मय ठोर। 


पूनमचंद 

११ सितंबर २०२१

परा प्रवेश।

 પરા પ્રવેશ


ભૈરવ ત્રિશૂલે ભૈરવી રમે, ભરણ રમણ વમન કરે; પરામ્બિકા તારો અખંડ પ્રકાશ, ના ઉદય ના અસ્ત. 


ધર્યું તેં દિગંબર રૂપ, ધૃતિ ક્રાંતિ કરે વિલાસ; દ્વૈતાદ્વૈત ના દ્વંદ્વ પણ, અખંડ તારો ચિન્મય પ્રકાશ. 


ચિન્મય રૂપમાં દ્રઢતા લાવું, સૂક્ષ્મ બોધમાં સુરતા; ધીરજ ધરી રાખું વિશ્વાસ, શનૈ શનૈ વધુ કદમ. 


ઘટરૂપ થઈ ઘટ જાણું, ભેદ ભરમની દિવાલ પડાવું; બિંબ પ્રતિબિંબ અભેદ રૂપ, હું જ દ્રષ્ટા, હું જ દર્પણ. 


દત્ત ચિત્ત ધ્યાન લગાવો, શક્તિ ઉજાગર કરાવો; કૃપા કરો શિવ ભવાની, પરામાં પ્રવેશ ભાન કરાવો. 


પૂનમચંદ

૧૨ સપ્ટેમ્બર ૨૦૨૧

जय माता दी।

 जय माता दी। 


प्रमाता प्रमेय और प्रमाण; ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान के त्रिशूल को शुद्ध संविद में विसर्जित करने भवानी (भैरव का ह्रदय) की कृपा और भैरव (स्व बोध) का अनुग्रह ज़रूरी है। 


परा, परापरा और अपरा के इच्छा, ज्ञान और क्रिया के भेद को परख त्रिमल से मुक्त सप्त भुवन पर पहुँच मूल गोत्र, निर्मल जगदानंद, पूर्ण बोध, शिव स्वरूप में अवशिष्ट होना लक्ष्य है। 


शरीर भाव से सर्व भाव की और। पूर्णोहम। 🙏


पूनमचंद 

१३ सितंबर २०२१

अग्नि पथ।

 अग्नि (ज्ञान) पथ। 


भोर भयों उठ जाग मनवा, चल रे ज्ञान पथ; 

शिवत्व मंज़िल को पाना, रूक नहीं अब एक पल। 


सकल से निकल, अकल पद लक्ष्य; 

निर्मल होता आगे बढ़, तु ही तुझमें ठहर। 


पशुता से पशुपति बनना, पथ तेरा अपने अंदर;

उत्तिष्ठ जाग्रत उपर उठ, इदम से पार अहम निगल। 


सकल से प्रलयाकल डग भर, प्रमेय से आगे निर्मल पथ चल। सुषुप्ति ना बांधे तुझको, अबोध में मत रे फँस। 


विज्ञानमल से पाँव पसार, मंत्र प्रमात्री में प्रवेश कर; अहम अहम इदम इदम, जाग्रत अपने घर में बस। 


मंत्र नहीं तुं मंत्रेश्वर, गहरे सुन अनाहत नाद;

इदम को अहम जान, खुद ईश्वर खुद संसार। 


अहम अहम मंत्र महेश्वर, अग्नि कुंण्डली मरीच हवन; शिव शक्ति सामरस्य कर; उन्मनि से आगे बढ़।  


प्रमाता तु स्वयं एक, परमेश्वर परम अद्वैत; 

अहम में कर विराम, अकल घर शिव संपूर्ण। 


भोर भयों उठ जाग मनवा, चल रे ज्ञान पथ; 

शिवत्व मंज़िल को पाना, रूक नहीं अब एक पल। 


पूनमचंद

१४ सितंबर २०२१

सप्तपुरी

 सप्तपुरी भीतर जानो, अपने को खूब पहचानो; 

चक्र चक्र पार चलो, सहस्रार में आसन जमाओ। 


बुंद बुंद अमृत छलके, पीया उसमें मस्ती छलके। 

भैरव संग भैरवी नाचे, बजा डमरू तांडव ताड़े। 


सकल से आगे चल, सप्तपुरी को पार कर;

शिवपुरी में गड़ा त्रिशूल, कर लीला तु अपने सूर। 


पूनमचंद 

१४ सितंबर २०२१

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