Monday, July 24, 2023

अवधूत।

 अवधूत। 


जडं पश्यति नो वस्तु जगत् पश्यति चिन्मयम्। जो जगत को जड़ नहीं अपितु चिन्मय-चैतन्य रूप देखता है। 


मूर्ति पूजा का यही तो रहस्य है। है तो पत्थर लेकिन उसके पूजक के लिए प्राण प्यारा बन जाता है। लेकिन सिर्फ़ मूर्ति ही क्यूँ, सिर्फ़ अपने काम की वस्तु ही क्यूँ, जब जगत पूरा लबालब एक ही चैतन्य आत्म तत्व से ही भरा पड़ा है, एक ही अनेक रूप में लीला कर रहा है फिर किसका भेद करेंगे?


योगवासिष्ठ में सुषुप्ति के प्रकार बतायें है। घन सुषुप्ति, क्षीण सुषुप्ति और स्वप्न सुषुप्ति। यह पृथ्वी तत्व, पत्थर, पहाड़ सब घन सुषुप्ति में है। चेतना है लेकिन घन सुषुप्त है। यह पेड़, पौधे, वनस्पति क्षीण सुषुप्ति में है। चेतना घन से ज़्यादा सक्रिय है। यह पशु पक्षी मनुष्य इत्यादि जीव स्वप्न सुषुप्ति में है। चेतना का जागरण बढ़ा है लेकिन स्वरूप अज्ञान से स्वप्न सुषुप्ति अवस्था में है। अभी मनचले है। दो ही तो जाग्रत में आएँगे, गुरू और गोविंद। 


जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। देखना ही तो है। चिन्मय रूप से, सब में चिन्मय के दर्शन करने है। एक मूर्ति पर ही नहीं ठहर जाना है। वह तो प्राथमिक शिक्षा है। एक घन सुषुप्त पत्थर को पूजे और क्षीण और स्वप्न सुषुप्त चैतन्य रूपों को भूल जाए, यह कैसे हो सकता है। लेकिन हुआ। अभेद की शिक्षा को भूल हम भेद में चले गए और विषमताओं के पालने लगे। 


अवधूत दशा को पाना है तो अभेद दुर्ग में दाखिल होना पड़ेगा। संतुलन की स्थिति बनानी है। बेकार सब ग़ायब करना और चैतन्य क़ायम करना है। वधू मतलब दूसरा। जिसे एक के सिवा दूसरा कोई दिखता नहीं वही अवधूत है। धूत का मतलब छोड़ना। जिसने भेद की दुनिया छोड़ी और अभेद में सबको एक कर दिया वह है अवधूत। वही संन्यास है। सब कुछ छोड़ना और बस एक ही चैतन्य पकड़े रखना है। स्वप्न सुषुप्ति हटेगी और जाग्रत हो जाएगा। स्वस्थ हो जाएगा।


पूनमचंद 

२४ जुलाई २०२३

Wednesday, July 19, 2023

आत्मदर्शन।

 आत्मदर्शन। 


भगवान बुद्ध अपने भिक्खूओं के साथ वनीय विस्तार से गुजर रहे थे। एक जगह ठहर गए। बुद्धको प्यास लगी थी। एक भिक्खू जल लेने चला गया। एक तालाब खोज निकाला। लेकिन उसमें से एक बैलगाड़ी गुजरी थी इसलिए जल मैला था। वह बिना जल लिए वापस लौट आया। कुछ देर बाद बुद्ध ने उसे वही तालाब से जल लाने को कहा। भिक्खू गया, तालाब शांत था, जल निर्मल और उसने झुककर एक लौटा पानी भर लिया। बुद्ध ने शिक्षा दी कि हमारा मन भी उस तालाब के पानी की तरह है। सामान्य रूप से तो है शांत और स्थिर, लेकिन परिस्थितियों से वह विचलित और मैला हो जाता है। इसलिए मन को निर्मल करने कोई विशेष प्रयास नहीं करने है परंतु जिससे विक्षेप पैदा हुआ है उस स्थिति को गुजर जाने देना है। 


मन का उपादान सत्व गुण है इसलिए उसको निर्मल होने में कोई कठनाई नहीं होनी है। बस हमनें अपने संस्कारों के भण्डार गृह में जो जानकारी भर रखी है, जिसकी वजह से हमारा अहंकार विक्षेप पैदा कर रहा है, उसको ख़ाली करना है। शांत मन निर्मल दर्पण बन जाएगा, अपने आत्मरूप का दर्शन कर लेगा। 


शांत, स्थिर बैठे रहने की शिक्षा दी जाती है। रात में सोते समय सुषुप्ति में हम शांत और स्थिर हो जाते है। न पदार्थ है, न मन, न यह संसार। सुषुप्ति के आनंद से कौन नहीं है परिचित? सुषुप्ति ही हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर की बैटरी को चार्ज कर देती है। लेकिन जागते ही संसार लग जाता है इसलिए तुरीया और तुरीयातीत; शुद्ध विद्या, ईश्वर, सदाशिव का हमें पता नहीं चलता। समाधि इसी में दाखिल होने की साधना है। 


जब हम जागते है, तब जीव चेतना स्थूल शरीर में, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर में और सुषुप्ति में कारण शरीर में बनी रहती है। जाग्रति में हम शरीर, इन्द्रियाँ, मन से पदार्थ जगत का उपभोग करते है। स्वप्न में स्थूल शरीर विश्रांति में है लेकिन मन अपने बनाये पदार्थों को भोगता है। सुषुप्ति में शरीर शांत, इन्द्रियाँ शांत, मन भी शांत इसलिए जीव कारण में विलीन होकर पदार्थ विहीन सुखरूपता का अनुभव कर लेता है। लेकिन उठते ही वह संसार की जाल जंजाल में फँसकर सुख दुःख का भोगी बन जाता है। 


कहते हैं कि जागा हुआ पुरूष अपलक हो जाता है, पलक नहीं झपकती। वैसे तो यह स्वचालित क्रिया है। तबीबी हिसाब से पलक न झपकना दिमाग की एकाग्र होने की क्षमता कम होने की निशानी है। लेकिन आध्यात्मिक क्षेत्र में मन को स्थिर करने का उपाय। 


एक प्रयास करें। सुखासन। आँखे बंद करें। अब दोनों आँखों को स्थिर रखनें का प्रयास करें। देखें उसके हल्के वायब्रेशन कैसे शांत होते जा रहे हैं और साथ साथ आपका मन भी शांत होता चला जा रहा है। 


दूसरा प्रयोग करें। सुखासन, आँख बंद, ओठ आधे खुले और जिह्वा को मुँह के मध्य में स्थिर करें। न उपर जाने देना है, न नीचे। बच मध्य में स्थिर। देखते ही देखते, आँखों की पुतलीयां शांत हो जाएगी और मन भी। 


यह तो हुई क्रिया, मन को शांत और स्थिर करने की। परंतु बिना ज्ञान उस मन दर्पण का करोगे क्या? 


बस  इसलिए ही एक दर्शन अभ्यास चाहिए। जिसका श्रवण, मनन, निदिध्यासन करने से, जो देखना चाहते हो वही दिखाई देने लगता है। सगुण चाहो तो सगुण और निर्गुण चाहो तो निर्गुण। 


आज बस इतना ही। 


पूनमचंद 

१९ जुलाई २०२३

Wednesday, July 5, 2023

बिहारी।

बिहारी। 


बिहार का नाम बुद्ध विहारों से पड़ा है ऐसी प्रचलित मान्यता है। बिहार सांख्य, बौद्ध, जैन, नाथ, इत्यादि दर्शनों का गढ़ रहा है। इसलिए क्या बौद्ध भिख्खुओ के रहने के कुछ मकान अकेले उसे बिहार नाम दे सकते है?  


बिहार नाम बिहारी से आया है। कौन हे बिहारी? आत्मा राम। स्थिति ऐसी थी की पूरा प्रांत आत्माराम में रमण करता था, विहार करता था, तत्व चिंतन करता था। परम शांति में रहता था। 


हिन्दू दर्शन यह सृष्टि को खेल या लीला के रूप में पहचानता है। एक ही परम सत्ता का लीलारूप वैभव।एक ही अनुत्तर ने प्राण-अपान की भूमिका पर यह खेल रचाया है। अपनी शक्ति को प्रकट कर यह संसार व्यापार चला रहा है। वह यह निखिल विमर्श में प्रतिबिंबित रहता है। लेकिन जब कोई बिहारी इसी विमर्श शक्ति के सहारे अपने अंतः स्थित प्रकाश में प्रविष्ट हो जाता है तब आत्माराम में रमण करने लगता है। हंस से परमहंस पद आगे बढ़ता है। आज्ञा चक्र से सहस्रार का रास्ता टेडा मेडा है इसलिए बाँके बिहारी बनना पड़ता है, लेकिन जो पहुँच गया वही सच्चा बिहारी है। 😊


पूनमचंद 

५ जूलाई २०२३

मन।

 मन। 


जैसे समग्र अस्तित्व शक्ति है, शिव की; विमर्श है प्रकाश का; वैसे ही मन भी शक्ति है, जीवात्मा की। 


प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम)  में मन सत्व का प्रतीक है। इसलिए उसे दर्पण भी कहा जाता है। 


इसी दर्पण पर जीवन के रसास्वादन के लिए भाव (स्वभाव) खेल चलता रहता है। 


मन  को वैसे तो इस खेल में रहना है साक्षी, दृष्टा, लेकिन वह इन्द्रियों के साथ लिप्त हो जाता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व की जंजाल में फँसकर सुख दुःख का भोगी और जन्म मरण के चक्कर काटनेवाला पुर्यष्टक बन जाता है। 


यही अशुद्धि है, मल है, अशुद्ध मन है। सारे प्रश्नों का यही मूल कारण है। 


यह मन जब दृष्टा बनकर तटस्थ भाव धारण कर लेता है, खेल और रंगमंच का साक्ष्य हो जाता है, तब वह शुद्ध मन बन जाता है। उस शुद्ध मन के दर्पण से जो उभर आती है वह आत्मा है। 


शुद्ध मन तटस्थ साक्षी होते ही भावातीत होता है, प्राण के खेल का तटस्थ साक्षी रहता है। फिर जब मन भी दृश्य बनता है तब दृष्टा आत्मा उभर आती है। 


फिर आगे मन भी नहीं रहता, शिवशक्ति के मिलन में हंस परमहंस हो जाता है। 


अद्भुत है। 


पहले मन (शक्ति-विमर्श) के दर्पण में आत्मा का प्रतिबिंबन और फिर आत्मा में मन का। 


तेरी लीला का नहीं पार। 


आत्मा अद्वय है। अद्वैत है। बाक़ी सब खेल है। राम।


पूनमचंद 

५ जून २०२३

Friday, June 30, 2023

मातृका-१

 मातृका-१


महाभारत की एक कहानी है। सत्यवती (मत्स्यगंधा) और हस्तिनापुर नरेश शांतनु के बेटे विचित्रवीर्य की शादी नहीं हो रही थी। दूसरी ओर काशी नरेश काश्य ने अपनी तीन पुत्रियाँ अंबा, अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर रचा था। तीनों का देवव्रत भीष्म ने अपहरण किया। अंबा को शल्व से प्रेम था इसलिए उसे छोड़कर अंबिका और अंबालिका की शादी विचित्रवीर्य से हुई। उसे क्षय की बीमारी थी इसलिए सात साल तक दोनों पत्नियों के साथ रहने पर भी उसे संतान नहीं हुई। आख़िर वेद व्यास के द्वारा नियोग से धृतराष्ट्र और पांडु हुए जिनके कौरव पांडवों ने महाभारत खेला। श्रीकृष्ण केन्द्र में रहे। धर्म (युधिष्ठिर) का जय हुआ और अधर्म (दुर्योधन) का नाश हुआ। 


प्राचीन भारत वर्ष में काशी, कश्मीर, कन्नौज, उज्जैन, कांची, तक्षशिला, नालंदा, इत्यादि ज्ञान के केन्द्र रहे है। लेकिन हस्तिनापुर-दिल्ली ज्ञान केंद्र के रूप में कभी उभर नहीं आई थी। अब उपर्युक्त कहानी का रूपक समझते है। 


काशी ज्ञान प्रकाश का केन्द्र था, जिसकी अंबा, अंबिका, अंबालिका मातृका शक्ति थी। भीष्म उन्हें अपने राज्य के हित विकास के लिए उठा तो ले आए और अंबिका और अंबालिका को राज्याश्रय भी दिया लेकिन वर विचित्रवीर्य में योग्यता नहीं थी इसलिए उसका विकास नहीं हुआ। फिर विकल्प न रहने पर वेद व्यास से नियोग करवाया लेकिन संतति अंध और पांडु रोगी निकली। इसलिए वेदों के प्रमुख देव यम, वायु, इंद्र, अश्विनीकुमारों का सहारा लेकर मंत्रवीर्य से सद्गुणों रूपी पांडवों की उत्पत्ति हुई। लेकिन उनका विकास होने तक अहंकार के दुर्गुण पुत्रों का बल इतना बढ़ चुका था कि कुरुक्षेत्र का युद्ध लड़ना पड़ा। आत्मा श्रीकृष्ण को रथी बनना पड़ा, जिसने पंचशक्ति के सद्गुणों के द्वारा शत दुर्गुणों का संहार किया। 


उत्पत्ति का केन्द्र बिंदु है। बिंदु के दो त्रिकोण है। एक ऊर्ध्व और दूसरा अधः। साधक का चित्त जिस ओर चलेगा उस त्रिकोण की ओर उसका विकास होगा। मध्यमा से पश्यन्ति अथवा वैखरी की ओर। दोनों ही स्थितियों में मातृका शक्ति केन्द्र में है। शब्द, अर्थ और ज्ञान की तीनों भूमि पर कदम रखना है और आगे बढ़कर परावाक् (केन्द्र) में स्थित होना है। मातृका से बनी है माया, उसे लांघना इतना सरल नहीं। 


पूनमचंद 

३० जून २०२३

Thursday, June 29, 2023

सनातन बुद्धत्व।

सनातन बुद्धत्व। 


श्रीमदभगवद्गीता (ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी) ने सांख्य, योग और वेदांत का संयोजन कर कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्ग से चित्त के गुण विकास द्वारा परमात्मा की शरण लेकर अक्षर शांति/धाम/सुख पाकर मुक्ति का मार्ग दिखाया है। इसलिए सांख्य और योग गीता से प्राचीन हुए। 


प्राचीन भारत में साठ से अधिक दर्शन प्रचलित रहे है और सबका लक्ष्य मनुष्य चित्त को निरावरण कर निर्मल प्रकाश का साक्षात्कार कर मुक्ति रहा है। जिसमें वैदिक के साथ साथ बौद्ध, जैन, नाथ, वैष्णव, शैव, शाक्त इत्यादि धाराओं सम्मिलित हो जाती है। सनातन इस प्रकार वैदिक और अवैदिक सभी दर्शनों का संगम है। 


कपिल मुनि (ईसा पूर्व छठी शताब्दी) का सांख्य (पुरूष-प्रकृति) और पतंजलि (ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ईसा चौथी शताब्दी) के योगसूत्र का अष्टांगः यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग प्रसिद्ध है। कपिल मुनि का प्रभाव बौद्ध और जैन दर्शनों भी है। 


लेकिन पतंजलि के योगसूत्र के साथ साथ बौद्ध वज्रयान के तंत्र को भी समझना होगा जो कश्मीर से तिब्बत तक पूरे हिमालय पर्वतीय प्रदेश में प्रचलित था। 


पतंजलि के अष्टांग में यम नैतिक जीवन है, जिसमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का समावेश है। जैनियों के तपव्रत से मिलता है। नियम व्यक्तिगत नैतिकता के स्वरूप में शौच (तन और मन की शुद्धि), संतोष, तप, ईश्वर प्राणिधान है। आसन शरीर नियंत्रण है। प्राणायाम प्राण नियंत्रण है। प्रत्याहार इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना। धारणा एकाग्र चित्त होना, ध्यान और समाधि द्वारा आत्मा से जुड़ना है। चित्त की एक और संसार है, बंधन है और दूसरी और निराकरण प्रकाश है, मुक्ति है। 


बौद्धों ने षडंग योग का लक्ष्य था बुद्धत्व की प्राप्ति। निरावरण प्रकाश को पाना। इसे ही सम्यक् सम्बोधि या महाबोधि नाम दिया गया है। बौद्ध षडंग योग में प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, अनुस्मृति (तर्क) और समाधि क्रम है। जो निरावरण प्रकाश के बुद्धत्व की सिद्धि पाने के साधन है।


प्रत्याहार मंत्र सिद्धि है। दशानन-दस इन्द्रियों जो की वृत्ति लाभ के लिए अपने अपने विषयों में बहिर्मुख प्रवृत्त है उसे स्वरूप की ओर अंतर्मुख करना प्रत्याहार है। विषय ग्रहण बंद होने से और प्रत्याहार के निरंतर अभ्यास से जब बिंब दर्शन की सिद्धि होती है तब ध्यान का प्रारंभ होता है। 


ध्यान में पंच कामरूप भावो की बुद्धरूप में भावना करनी है। बाह्यभाव कट जाने से चित्त दृढ़ होता है और बिंब से चित्त के तादात्म्य से अनिमेष/दिव्यचक्षु की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार दिव्य श्रोव आदि का उदय होता है। तब प्राणायाम में प्रवेश होता है। 


प्राणायाम में वाम और दक्षिण नाड़ीयो में प्रवहणशील दो श्वास प्रवाह को एकभूत कर पिण्ड आकार में बदलकर पिण्ड को मध्य मार्ग में संचारित कर क्रमशः उपर उठाकर नाभाग्र में धारण करना है। प्राण को नाभि, ह्रदय, कण्ठ, ललाट और उष्णीय कमल बिंदु तक ले जाकर स्थिति लाभ करना है। प्राणायाम कि सिद्धि धारणा अभ्यास का अधिकार प्राप्त होता है। 


इष्ट मंत्र प्राण को ह्रदय में ध्यान कर उपर उठाकर ललाट में बिंदु स्थान में निरुद्ध करने से प्राणवायु स्थिर होता है, नाभि चक्र से चाण्डाली/कुण्डली उपर उठती है और उष्णीय कमल कर्णिका में पहुँचती है। धारणा सिद्धि से चाण्डाली उज्ज्वलता प्राप्त करती है। ग्राहक चित्त शून्यता बिंब ग्राह्य में समाविष्ट हो जाता है। बिंदु धारणा से गतिशून्य प्राण एकाग्र होता है। वृत्ति संवृति सत्वाकार हो जाती है। योगी बोधिसत्व अवस्था में पहुँचता है।


फिर आता है पंचम पड़ाव अनुस्मृति या तर्क का। संवृति सत्वाकार वृत्ति को आकाशव्यापी रूप में दर्शन करना है। त्रिकालस्थ समग्र भुवन का दर्शन होता है। परिणाम स्वरूप विमल आभामंडल का आविर्भाव होता है जिसमें योगी का प्रवेश होता है। 


ऐसे विकल्प शून्य चित्तवाले योगी के लोमकूप से महारश्मि निकलती है। ग्राह्य और ग्राहक चित्त एक हो जाता है और अक्षर सुख का आविर्भाव होता है। निखिल आवरण की निवृत्ति होती है। अचानक एक महाक्षण के महाज्ञान निष्पत्ति होकर समाधि आविर्भूत होती है।महाज्ञान का उदय होता है। चल अचल सारे प्रतिभासों का उपसंहार होता है। वह सिद्ध रस में सबकुछ ग्रास कर स्वयं अखंडरूप में बिराजता है। अद्वय रूप प्रकाशता है। यही समाधि है। यही बुद्धत्व है। बुद्ध आत्मा का परम स्वरूप है। 


कश्मीर नौवीं शताब्दी में शैव मत के विकास के पहले बौद्ध धर्ममय था। लोग नागार्जुन और धर्मकीर्ति के उपदेश से प्रभावित थे। नौंवी शताब्दी में शैव आचार्य वसुगुप्त ने शिवसूत्र और स्पन्दकारिका की रचना की। जिसे आगे जाकर आचार्य अभिनवगुप्त (१०-११ वी शताब्दी) ने तंत्रलोक इत्यादि सुंदर रचनाओं के माध्यम से और फैलाया। कौल और त्रिक दर्शन आज भारत में कश्मीर शैवीजम के नाम से प्रचलित हो रहा है। शिव ही अपने स्वातंत्र्य चयन से मलावृत संसारी जीव बना है, जो मलावरण से निरावरण होते ही अपने शिवस्वरूप में स्वस्थ होकर मुक्त हो जाता है। 


कश्मीर शैवीजम में तत्व ३६ और योग षडंग है। ३६ तत्व में कपिल सांख्य के २५ में ११ नवीन जोड़े है। कपिल के २५ तत्वों के उपरांत पाँच शुद्ध तत्व (शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर, शुद्ध विद्या), छ अशुद्ध तत्व (माया, पाँच कंचुकः कला, विद्या, राग, नियति, काल) को मिलाकर ३६ का आँकड़ा बनता है। षडंग में क्रम प्राणायाम, धारणा, तर्क, ध्यान, समाधि, प्रत्याहार है। प्राणायाम पतंजलि के सूत्रों जैसा है। धारणा बिंदु और नाद की है। तर्क स्वीकार अस्वीकार का विवेक है। ध्यान शिव स्वरूप का है। समाधि निश्चलता है। प्रत्याहार मन निवृत्ति है। मोक्ष के चार उपाय है। आनवोपाय, शक्तोपाय, शाम्भवोपाय, अनुपाय। प्रत्यभिज्ञा दर्शन है। 


गहराई में जिस दर्शन का भी अभ्यास करें, लक्ष्य एक ही नज़र आता है। मनुष्य चित्त को बहिर्मुख विषयों से मुक्त कर निरावरण, दिगंबर, शुद्ध, अद्वय, चिद्रूप में परिवर्तित करना। आत्मा के निर्मल प्रकाशरूप में स्थित होना। यही सत्य है। चित्त का बंधन, चित् मुक्ति। 


🕉️


पूनमचंद 

२९ जून २०२३


साभारः तांत्रिक साधना और सिद्धांत, महामहोपाध्याय डॉ. श्रीगोपीनाथ कविराज।

Friday, June 23, 2023

शिवोहं-पूर्णोहं।

 शिवोहं-पूर्णोहं। 


शिव का संकोच जीव (पशु) है और पशु का प्रसार शिव। शिव का जब संकोच होता है शक्ति का प्रसार होता है, सृष्टि होती है। शक्ति का संकोचन होता है तो सृष्टि का संहार होता है। एक क्षीण होता है दूसरा पुष्ट होता है। 


इस संकोचन विस्तरण  चक्र का प्रयोग काल की क्रियाओं में भी किया गया है। जैसे की दिन बढ़ने की या सूर्य प्रकाश बढ़ने की छह मासिक प्रसार स्थिति को उत्तरायण गति और घटने की संकोच स्थिति दक्षिणायन गति कहते है। चंद्र की कलाओं के ज़्यादा होने का पखवाड़ा शुक्ल पक्ष और कम होने का पखवाड़ा कृष्ण पक्ष कहते है। हमारे श्वासों की गति में अंदर जा रहा अपान अनुलोम है और बाहर निकल रहा प्राण विलोम है। जैनियों का काल चक्र भी सुख और दुख के प्रसार और संकोच की गति से जाना जाता है। वैदिक संवत्सर चक्र अथवा युग-काल गणना भी शक्ति के प्रसार और संकोच से नापी जाती है। 


लेकिन प्रसार संकोच की इस बहिर्गति और अंतर्गति के विश्वात्मक (immanent) खेल में उसका मध्य बिंदु, उसकी धुरी, अविभक्त रहती है। साक्ष्य और साम्य रहती है। यही विश्वातीत (transcendent) पूर्ण (absolute), अभिन्न, स्वप्रकाश के सामरस्य का साक्षात्कार करना है। तभी तो इस अनेकाकारता की एकाकारता होगी। वही स्वरूप ज्ञान है। वही मुक्ति की सबको कामना है। 


शक्ति (सृष्टि) और शिव (धुरी) दोनों सत्य है। बस भेद-अभेद का फ़र्क़ है। उस भेद को लांघने शक्ति का  जागरण चाहिए। शक्ति जगाने सोयी कुण्डली (आधार शक्ति) जगानी पड़ेगी। कुण्डलरूप से दण्डरूप में लानी है। मूलाधार के भूमध्य से सहस्रार के मध्य बिंदु पहुँचना है। शक्ति और शिव का मिलन कराना है। तभी तो विकल्प हटकर निर्विकल्प होगा। शिवोहं का साक्षात्कार होगा। पशु, पशुपति बनेगा। 


शब्दों से थोड़ी होगा? अनुसंधान करना होगा। जागेंगे तब वह जागेगी। जागेगी तो उजियारा होगा। अंधेरा जाएगा और प्रकाश का प्राकट्य होगा। 


🕉️ 

पूनमचंद 

२३ जून २०२३

Powered by Blogger.