Monday, July 24, 2023

अवधूत।

 अवधूत। 


जडं पश्यति नो वस्तु जगत् पश्यति चिन्मयम्। जो जगत को जड़ नहीं अपितु चिन्मय-चैतन्य रूप देखता है। 


मूर्ति पूजा का यही तो रहस्य है। है तो पत्थर लेकिन उसके पूजक के लिए प्राण प्यारा बन जाता है। लेकिन सिर्फ़ मूर्ति ही क्यूँ, सिर्फ़ अपने काम की वस्तु ही क्यूँ, जब जगत पूरा लबालब एक ही चैतन्य आत्म तत्व से ही भरा पड़ा है, एक ही अनेक रूप में लीला कर रहा है फिर किसका भेद करेंगे?


योगवासिष्ठ में सुषुप्ति के प्रकार बतायें है। घन सुषुप्ति, क्षीण सुषुप्ति और स्वप्न सुषुप्ति। यह पृथ्वी तत्व, पत्थर, पहाड़ सब घन सुषुप्ति में है। चेतना है लेकिन घन सुषुप्त है। यह पेड़, पौधे, वनस्पति क्षीण सुषुप्ति में है। चेतना घन से ज़्यादा सक्रिय है। यह पशु पक्षी मनुष्य इत्यादि जीव स्वप्न सुषुप्ति में है। चेतना का जागरण बढ़ा है लेकिन स्वरूप अज्ञान से स्वप्न सुषुप्ति अवस्था में है। अभी मनचले है। दो ही तो जाग्रत में आएँगे, गुरू और गोविंद। 


जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। देखना ही तो है। चिन्मय रूप से, सब में चिन्मय के दर्शन करने है। एक मूर्ति पर ही नहीं ठहर जाना है। वह तो प्राथमिक शिक्षा है। एक घन सुषुप्त पत्थर को पूजे और क्षीण और स्वप्न सुषुप्त चैतन्य रूपों को भूल जाए, यह कैसे हो सकता है। लेकिन हुआ। अभेद की शिक्षा को भूल हम भेद में चले गए और विषमताओं के पालने लगे। 


अवधूत दशा को पाना है तो अभेद दुर्ग में दाखिल होना पड़ेगा। संतुलन की स्थिति बनानी है। बेकार सब ग़ायब करना और चैतन्य क़ायम करना है। वधू मतलब दूसरा। जिसे एक के सिवा दूसरा कोई दिखता नहीं वही अवधूत है। धूत का मतलब छोड़ना। जिसने भेद की दुनिया छोड़ी और अभेद में सबको एक कर दिया वह है अवधूत। वही संन्यास है। सब कुछ छोड़ना और बस एक ही चैतन्य पकड़े रखना है। स्वप्न सुषुप्ति हटेगी और जाग्रत हो जाएगा। स्वस्थ हो जाएगा।


पूनमचंद 

२४ जुलाई २०२३

Wednesday, July 19, 2023

आत्मदर्शन।

 आत्मदर्शन। 


भगवान बुद्ध अपने भिक्खूओं के साथ वनीय विस्तार से गुजर रहे थे। एक जगह ठहर गए। बुद्धको प्यास लगी थी। एक भिक्खू जल लेने चला गया। एक तालाब खोज निकाला। लेकिन उसमें से एक बैलगाड़ी गुजरी थी इसलिए जल मैला था। वह बिना जल लिए वापस लौट आया। कुछ देर बाद बुद्ध ने उसे वही तालाब से जल लाने को कहा। भिक्खू गया, तालाब शांत था, जल निर्मल और उसने झुककर एक लौटा पानी भर लिया। बुद्ध ने शिक्षा दी कि हमारा मन भी उस तालाब के पानी की तरह है। सामान्य रूप से तो है शांत और स्थिर, लेकिन परिस्थितियों से वह विचलित और मैला हो जाता है। इसलिए मन को निर्मल करने कोई विशेष प्रयास नहीं करने है परंतु जिससे विक्षेप पैदा हुआ है उस स्थिति को गुजर जाने देना है। 


मन का उपादान सत्व गुण है इसलिए उसको निर्मल होने में कोई कठनाई नहीं होनी है। बस हमनें अपने संस्कारों के भण्डार गृह में जो जानकारी भर रखी है, जिसकी वजह से हमारा अहंकार विक्षेप पैदा कर रहा है, उसको ख़ाली करना है। शांत मन निर्मल दर्पण बन जाएगा, अपने आत्मरूप का दर्शन कर लेगा। 


शांत, स्थिर बैठे रहने की शिक्षा दी जाती है। रात में सोते समय सुषुप्ति में हम शांत और स्थिर हो जाते है। न पदार्थ है, न मन, न यह संसार। सुषुप्ति के आनंद से कौन नहीं है परिचित? सुषुप्ति ही हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर की बैटरी को चार्ज कर देती है। लेकिन जागते ही संसार लग जाता है इसलिए तुरीया और तुरीयातीत; शुद्ध विद्या, ईश्वर, सदाशिव का हमें पता नहीं चलता। समाधि इसी में दाखिल होने की साधना है। 


जब हम जागते है, तब जीव चेतना स्थूल शरीर में, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर में और सुषुप्ति में कारण शरीर में बनी रहती है। जाग्रति में हम शरीर, इन्द्रियाँ, मन से पदार्थ जगत का उपभोग करते है। स्वप्न में स्थूल शरीर विश्रांति में है लेकिन मन अपने बनाये पदार्थों को भोगता है। सुषुप्ति में शरीर शांत, इन्द्रियाँ शांत, मन भी शांत इसलिए जीव कारण में विलीन होकर पदार्थ विहीन सुखरूपता का अनुभव कर लेता है। लेकिन उठते ही वह संसार की जाल जंजाल में फँसकर सुख दुःख का भोगी बन जाता है। 


कहते हैं कि जागा हुआ पुरूष अपलक हो जाता है, पलक नहीं झपकती। वैसे तो यह स्वचालित क्रिया है। तबीबी हिसाब से पलक न झपकना दिमाग की एकाग्र होने की क्षमता कम होने की निशानी है। लेकिन आध्यात्मिक क्षेत्र में मन को स्थिर करने का उपाय। 


एक प्रयास करें। सुखासन। आँखे बंद करें। अब दोनों आँखों को स्थिर रखनें का प्रयास करें। देखें उसके हल्के वायब्रेशन कैसे शांत होते जा रहे हैं और साथ साथ आपका मन भी शांत होता चला जा रहा है। 


दूसरा प्रयोग करें। सुखासन, आँख बंद, ओठ आधे खुले और जिह्वा को मुँह के मध्य में स्थिर करें। न उपर जाने देना है, न नीचे। बच मध्य में स्थिर। देखते ही देखते, आँखों की पुतलीयां शांत हो जाएगी और मन भी। 


यह तो हुई क्रिया, मन को शांत और स्थिर करने की। परंतु बिना ज्ञान उस मन दर्पण का करोगे क्या? 


बस  इसलिए ही एक दर्शन अभ्यास चाहिए। जिसका श्रवण, मनन, निदिध्यासन करने से, जो देखना चाहते हो वही दिखाई देने लगता है। सगुण चाहो तो सगुण और निर्गुण चाहो तो निर्गुण। 


आज बस इतना ही। 


पूनमचंद 

१९ जुलाई २०२३

Wednesday, July 5, 2023

बिहारी।

बिहारी। 


बिहार का नाम बुद्ध विहारों से पड़ा है ऐसी प्रचलित मान्यता है। बिहार सांख्य, बौद्ध, जैन, नाथ, इत्यादि दर्शनों का गढ़ रहा है। इसलिए क्या बौद्ध भिख्खुओ के रहने के कुछ मकान अकेले उसे बिहार नाम दे सकते है?  


बिहार नाम बिहारी से आया है। कौन हे बिहारी? आत्मा राम। स्थिति ऐसी थी की पूरा प्रांत आत्माराम में रमण करता था, विहार करता था, तत्व चिंतन करता था। परम शांति में रहता था। 


हिन्दू दर्शन यह सृष्टि को खेल या लीला के रूप में पहचानता है। एक ही परम सत्ता का लीलारूप वैभव।एक ही अनुत्तर ने प्राण-अपान की भूमिका पर यह खेल रचाया है। अपनी शक्ति को प्रकट कर यह संसार व्यापार चला रहा है। वह यह निखिल विमर्श में प्रतिबिंबित रहता है। लेकिन जब कोई बिहारी इसी विमर्श शक्ति के सहारे अपने अंतः स्थित प्रकाश में प्रविष्ट हो जाता है तब आत्माराम में रमण करने लगता है। हंस से परमहंस पद आगे बढ़ता है। आज्ञा चक्र से सहस्रार का रास्ता टेडा मेडा है इसलिए बाँके बिहारी बनना पड़ता है, लेकिन जो पहुँच गया वही सच्चा बिहारी है। 😊


पूनमचंद 

५ जूलाई २०२३

मन।

 मन। 


जैसे समग्र अस्तित्व शक्ति है, शिव की; विमर्श है प्रकाश का; वैसे ही मन भी शक्ति है, जीवात्मा की। 


प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम)  में मन सत्व का प्रतीक है। इसलिए उसे दर्पण भी कहा जाता है। 


इसी दर्पण पर जीवन के रसास्वादन के लिए भाव (स्वभाव) खेल चलता रहता है। 


मन  को वैसे तो इस खेल में रहना है साक्षी, दृष्टा, लेकिन वह इन्द्रियों के साथ लिप्त हो जाता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व की जंजाल में फँसकर सुख दुःख का भोगी और जन्म मरण के चक्कर काटनेवाला पुर्यष्टक बन जाता है। 


यही अशुद्धि है, मल है, अशुद्ध मन है। सारे प्रश्नों का यही मूल कारण है। 


यह मन जब दृष्टा बनकर तटस्थ भाव धारण कर लेता है, खेल और रंगमंच का साक्ष्य हो जाता है, तब वह शुद्ध मन बन जाता है। उस शुद्ध मन के दर्पण से जो उभर आती है वह आत्मा है। 


शुद्ध मन तटस्थ साक्षी होते ही भावातीत होता है, प्राण के खेल का तटस्थ साक्षी रहता है। फिर जब मन भी दृश्य बनता है तब दृष्टा आत्मा उभर आती है। 


फिर आगे मन भी नहीं रहता, शिवशक्ति के मिलन में हंस परमहंस हो जाता है। 


अद्भुत है। 


पहले मन (शक्ति-विमर्श) के दर्पण में आत्मा का प्रतिबिंबन और फिर आत्मा में मन का। 


तेरी लीला का नहीं पार। 


आत्मा अद्वय है। अद्वैत है। बाक़ी सब खेल है। राम।


पूनमचंद 

५ जून २०२३

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