Saturday, January 6, 2024

Happy Winter

 Happy Winter 


We went through a perihelion phase this week (2-4 January) when the distance from the Earth to the Sun was the smallest (143.7 mkm). But we in northern hemisphere felt the cold wave. Why? Because our earth in inclined on its axis and is rotating. These days the South Pole is tilted towards the Sun, as a result the rays of Sun are not coming directly to us in northern hemisphere but are slanted, travels a longer distance and hear a larger area. Thus they have less heating power. 

The Sun radiates heat of which earth receives one part of the 2 billion parts. Out of 100% solar energy only 51% reaches the earth, 35% reflected back into space and 14% is absorbed by the atmosphere during insolation. The atmosphere additionally receives 34 units of earth radiation and making it 48%. If the inflow of the heat is less from the Sun, the heat quantity in the atmosphere also comes down in northern hemisphere, and therefore, the atmosphere around us is cold these days though the earth is nearest to the Sun. 

Winter is tough for the old aged people because the atmospheric pressure goes up. Those who have weak heart lungs couldn’t tolerate the pressure of the atmosphere and therefore die more in winter. The air with water vapour in summer and monsoon is lighter because the molecular weight of water (18g/mol) is less than the average molecular weight of air (about 29g/mol). Humid air is less dense, weighs less and exerts less pressure than the dry air. 

After 4th January the distance between the Earth and the Sun will go on rising till it reaches to the greatest (152.1 mkm), the aphelion occurs on 3-6 July, the North Pole will be tilted towards the Sun, will have direct rays of the Sun in northern hemisphere and will have a tough summer heat to face but with low pressure of the atmosphere. We need it, for the rainy season, otherwise how could we survive without water and food? 

Enjoy the play of the nature through the seasons. Season’s greetings. Happy Winter. 🥶 ❄️ 

Punamchand 
6th January 2024

Friday, January 5, 2024

 ध्यान। (meditation) 


किसी ने प्रश्न किया था कि ध्यान करते करते नींद आ जाती है। ध्यान करते करते नींद आ जाना स्वाभाविक क्रिया है क्योंकि साँस की गति धीमे होते ही ओक्सिजन की मात्रा कम होने लगती है और मन अपनी जाग्रति खोने लगता है और नींद आ जाती है। 

हमारी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति मन की ही तो अवस्थाएँ है। मन प्रधान है इसलिए हम मनुष्य है। मन जब चैतन्य के पूर्ण तेज से भर जाता है तब जाग्रत हो जाता है और मन जब थक जाता है तब साँस की गति धीमी कर सोने लगता है और सुषुप्ति में चला जाता है। सपने आमतौर पर पहली नींद ख़त्म होने के बाद जब हम सोने का प्रयास करते है तब प्राण हिता नाड़ी में प्रवेश करते ही हम सपने देखने लगते है।  यह अवस्था अर्ध सुषुप्ति जैसी है। इसलिए पूर्ण जाग्रति की अवस्था का बोध हमारी याददाश्त में लंबे वक्त तक रहता है; स्वप्न प्रयास से याद रखने पड़ते हैं और नींद तो हमने आधा जीवन सोने में बिताया लेकिन कुछ भी याद नहीं रही। पूरा खेल ओक्सिजन की मात्रा और मन की अवस्था भेद का है। 

आत्म साक्षात्कार में हमें तो मूलाधार में साडे तीन कुंडल मार बैठी शक्ति को जगाना है, उसे सुषुम्ना पथ में दाखिल कर उपर ले जाना है और ब्रह्मरंध्र में बैठे शिव के साथ मिलन कर आत्म साक्षात्कार करना है। यह करने के लिए बस अहं-मन को निर्मल कर अपने सत् स्वरूप का साक्षात्कार करना है। 

कश्मीर शैव दर्शन के आचार्य स्वामी लक्ष्मण जू सुषुम्ना को सूक्ष्म साँस से समझाते हैं जिसमें सासों की गति न के बराबर हो जाती है, जिसमें नथुने के आधा एक इंच जितना प्राण संचार बना रहता है। धीमी साँस से धीरे-धीरे ओक्सिजन की मात्रा कम होती जाएगी, मन शिथिल होने लगेगा, जगत विक्षेप घटने लगेगा और आत्म प्रकाश का अनुभव होने लगेगा। अब जब आत्म अनुभव की स्थिति आई तब सोने लगेंगे फिर ध्यान का क्या अर्थ? ध्यान करना है मतलब कम ओक्सिजन में जाग्रत रहना है। क्रिया शैथिल्य से वैसे भी ओक्सिजन की ज़रूरत कम हो जाएगी। साधु बाबा लोग ध्यान करने शायद इसलिए कम ओक्सिजन की जगह वाली पहाड़ियों में चले जाते होंगे। ध्यान करते करते एक बार जब खुद की पहचान हो गई, अपना पता लग गया फिर मन चाहे जाग्रत में हो या स्वप्न में, या सुषुप्ति में, तुरीया तो हमेशा बना रहेगा। बस उस तुरीया को पहचान कर तुरीयातीत सर्वाकार साक्षात्कार करना है। 

इसके लिए लंबे वक्त तक हिले-डुले बिना एक आसन में बैठने की क्षमता पानी है। इसके लिए आसन करने होंगे। साँसों की धीमी गति से कम ओक्सिजन से जाग्रत रहना है इसलिए प्राणायाम करके फेफड़ों को ओक्सिजन से पूरी मात्रा में भर देना होगा। इन्द्रियां आहार के लिए बहिर्मुख है उसे अंतर्मुख कर प्रत्याहार कराना है। बिना उद्देश्य क्रिया का क्या अर्थ? इसलिए धारणा बनानी है। धारणा पर ध्यान करना है। ध्यान करते करते (जाग्रत रहकर) सम+अधि, समत्व धारण किये अपने सत् स्वरूप में अधिष्ठित हो जाना है। तभी तो समाधि घटेगी। 

ध्यान बस एक मन को सँभालकर राह पर लाने का प्रयास है, जिससे की हमें अपने सच्ची पहचान हो जाए। एक बार अमर सत्य को पहचान लिया फिर मृत्यु का भय कैसा? न मृत्यु रहेगी, न जन्म। सिर्फ़ अमृतसर रहेगा। 

चलें अमृतसर?

पूनमचंद 

५ जनवरी २०२४

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