Wednesday, May 29, 2024

सृष्टि रहस्य।

 सृष्टि रहस्य या मिथक  


यह दृश्यमान जगत के रहस्य को उजागर करने मनुष्य जाति सदियों से लगी हुई है। वैज्ञानिकों ने कार्य कारण संबंध से उसका परीक्षण किया लेकिन पहला कार्य किस कारण से हुआ उसका पता नहीं चला। भारत के ऋषि मुन्नियों ने एक सत्ता के रूप में रचयिता की कल्पना की और आदि कार्य उसकी स्वतंत्रता मानकर समाधान कर लिया। फिर उस सत्ता के चेतन और जड़ रूप, पुरूष और प्रकृति रूप को आधार बनाकर जन समूह के सामने रूपक वार्ताओं के रूप में रख दिया। शिव-सती की कहानी भी ऐसी ही एक रोचक कथा है जिसमें मनुष्य रूप में शिव-सती, उनका विवाह, शिव के ससुर दक्ष प्रजापति द्वारा शिव का अपमान, सती का आत्मदाह इत्यादि पात्रों-घटनाओं से इस सृष्टि की रचना को समझाने का प्रयास किया गया है। 

शिव-सती कथा पुराणों से ली गई है। पुराण मतलब पुराना। किसी गड्डे को भरने को भी पुराण कहते है। मनुष्य की सृष्टि रहस्य खोजने की उत्कंठा में जहां जहां उसे अंतर नज़र आया कोई रूपक कथा से उसे जोड़ने का प्रयास किया।

सती अर्थात् सत, शाश्वत, eternal. जो शाश्वत है भला उसका जन्म कहाँ? फिर भी दक्ष प्रजापति की पुत्री के रूप में शक्ति को प्रस्तुत किया गया है। जो दक्ष खुद शक्ति से प्रकट हुआ वह उसका पिता बना हुआ है और महादेव का ससुर।

दक्ष की एक और कहानी है। दामाद चंद्र और उसकी २७ पत्नियों की। वे २७ दक्ष की ही पुत्रियाँ थी। लेकिन चंद्र रोहिणी को ज़्यादा प्रेम करता था। २६ ने पिता दक्ष को शिकायत की और दक्ष ने चंद्र को शापित कर क्षयरोग दे दिया। यहाँ साढ़ूभाई काम आए। शाप का समाधान ढूँढ माह के दो पक्ष बनाकर एक पक्ष में (शुक्ल) चंद्रकला की वृद्धि और दूसरे पक्ष (कृष्ण) में क्षय का वरदान दिया। अब हम सब चाँद को भी मनुष्य बनाकर २७ मनुष्य कन्याओं की कल्पना कर उनका पति पत्नी संबंध जोड़ इस कथा को एक सत्य और ऐतिहासिक कथा के रूप में प्रस्तुत करें तो कौन रोक सकता है? फिर तो गणेश की कथा भी मनुष्य रूप से हाथी रूप बन ही जाएगी। रूपक समझना है।

यहाँ चंद्र और २७ पत्नियाँ नभ में रहे पृथ्वी के उपग्रह चंद्र और उसकी २७ नक्षत्रों में मासिक भ्रमण की खगोलीय घटना की रूपक वार्ता है। चंद्र दूसरे नक्षत्रों की तुलना में रोहिणी नक्षत्र में एक दिन ज़्यादा रहता है इसलिए मनुष्य ने उसमें अपनी प्रणय कथा का सहारा लेकर एक वार्ता के रूप में प्रस्तुत कर इस खगोलीय घटना को समझाने का प्रयास किया। २१ वी सदी के हम सब उँगली जिस ओर इंगित करती है उस दृश्य-घटना को छोड़ उँगली को ही पकड़कर बैठ जाते है। 

सती और शिव की घटना भी कुछ ऐसी ही सृजन शृंखला की कहानी का एक रूपक निरूपण है।

नासदीय सूक्त की भाषा इसी रहस्य का बयान है। भारत एक खोज का टाइटिल गीत याद होगा। 

“सृष्टि से पहले सत नहीं था,
असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं,
आकाश भीं नहीं था
छिपा था क्या कहाँ,
किसने देखा था
उस पल तो अगम,
अटल जल भी कहाँ था
सृष्टि का कौन हैं कर्ता
कर्ता हैं यह वा अकर्ता
ऊंचे आसमान में रहता
सदा अध्यक्ष बना रहता
वोहीं सच मुच में जानता.
या नहीं भी जानता
हैं किसी को नहीं पता
नहीं पता
नहीं है पता, नहीं है पता...........
वोह था हिरण्य गर्भ सृष्टी से पहले विद्यमान
वोही तो सारे भूत जात का स्वामी महान
जो है अस्तित्वमाना धरती आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता कि उपासना करे हम अवि देकर
जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर
स्वर्ग ओर सूरज भी स्थिर
ऐसे किस देवता कि उपासना करे हम अवि देकर
गर्भ में अपने अग्नी धारण कर
पैदा करता था जल इधर उधर नीचे ऊपर
जगह चुके वो का एकमेव प्राण बनकर
ऐसे किस देवता कि उपासना करे हम अवि देकर
ॐ ! सृष्टी निर्माता स्वर्ग रचायता पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्मं पलक अतुल जल नियामक रक्षा कर
फैली हैं दिशाएं बहु जैसी उसकी सब में सब पर
ऐसी ही देवता कि उपासना करे हम अवि देकर
ऐसी ही देवता कि उपासना करे हम अवि देकर....”

अगर कुछ भी न था तब क्या था? 
यह सृष्टि कैसे बनी? 
शून्य से कुछ नहीं निकल सकता, वर्ना उसे शून्य कहें कैसे? 
एक अलौकिक सत्ता की हाज़िरी बनती है। 

उसे परम या ब्रह्म या अ़क्षर नाम उपाधि देते है। वैसे तो जिसका नाम उसका नाश इसलिए नाम देकर शाश्वत के सामने ग़ुस्ताख़ी हुई। लेकिन क्या करें लकीर खींचने बिंदु तो करना पड़ेगा। परम अहं रूप में आ जाता है। ‘मैं हूँ’ यह भान उसे आदिनाथ-शिव बना देता है। अहं कहते ही शक्ति का संचार होता है जिसे हम शिव का विमर्श, शक्ति, स्वातंत्र्य कहते है। पुरूष हुआ, प्रकृति हुई। दोनों के संयोजन से सृष्टि हुई। फिर यह दक्ष-पुत्री-दामाद-अपमान-अग्निस्नान क्या?

शिव क्या अस्तित्वहीन है? क्या एक विराट शून्य है? क्या अंधकार है? जिसके गर्भ से निकलकर यह गेलेक्सीयाँ, सितारे, चाँद, धरती, हम सब व्यक्त और फिर अव्यक्त हो जाते है। शक्ति बिना शिव शव है। उसमें एक चिनगारी, शक्ति-सती का आत्मदाह, सृजन की शृंखला की पहली कड़ी है। जिससे यह संसार बना है। सती-शिव प्रेमासक्त है इसलिए शिव अर्धनारीश्वर बन इस cosmos-ब्रह्मांड की सृष्टि स्थिति और लय में प्रवृत्त है, उच्छलित है। 

मिथक कहें या कल्पना शिव सत्य (सती) है, और यह सत्य हम आप ही है। 

पहचान कौन? 😁

पूनमचंद 
२९ मई २०२४

Thursday, May 23, 2024

बुद्ध पूर्णिमा।

 बुद्ध पूर्णिमा। 


बुद्ध का जन्म, बोध और मृत्यु इसी वैशाख पूर्णिमा पर हुआ था। उन्होंने अपना पहला बोध पाँच शिष्यों को सारनाथ में दिया था तब थी गुरू पूर्णिमा- आषाढ़ पूर्णिमा। बुद्ध बोध के पश्चात ४९ दिन बोध गया में रहे थे और फिर ११ दिन सासाराम के रास्ते चलकर २५० किमी दूर सारनाथ पहुँचे थे। 

बुध के चेहरे की शांति अलौकिक तेज देखकर रास्ते में एक बालक ने पूछ लिया। क्या आप भगवान हो? बुद्ध ने कहा नहीं। क्या आप देवदूत हो? बुद्ध ने कहा नहीं। क्या आप मनुष्य हो? बुद्ध ने कहा नहीं। फिर आप क्या हो। मैं बुद्ध (बुध) हूँ। जागा हुआ। बुद्ध ने जवाब दिया और चल दिए। बोध वह चैतन्य पट है जिस पर सब कुछ उभरता है और मिट जाता है। बोध का पट ज्यों का त्यों निश्चल बना रहता है। 

बुद्ध को इतिहास शाक्य मुनि के नाम से भी जानता है। कोई कोई उन्हें शक जाति के महात्मा के रूप में देखते है। लेकिन असोक के minor edict Maski (Karnataka) को पढ़े तो वहाँ असोक अपने लिए 2.5 years passed since he became बोध शाक्य दर्शाता है। शाक्य का अर्थ यहाँ हुआ शिष्य। समण (गुरू) -शिष्य परंपरा का भारतीय प्राचीन धर्म यहाँ उजागर होता है। सीख धर्म का सीख शिष्य का ही पर्याय है। 

असोक के उत्तर पश्चिम के शिलालेख खरोष्ठी में है जब कि बाकी सारे धम्म लिपि (प्राचीन ब्राह्मी) में है। ईरान के शासक (Achaemenid Empire) ईसा पूर्व छठी शताब्दी में सिंधु घाटी तक राज्य करते थे इसलिए इस प्रदेश में प्रचलित लिपि थी जो right to left लिखी जाती थी। जबकि भारत वर्ष (पूर्व) की लिपि left to right लिखी जाती थी। 

यहाँ के लोगों ने पश्चिम की लिपि को नाम दिया खरोष्ठी क्यों कि उसके वर्ण कुछ मरोड़ लेकर लिखे जाते थे जैसे की गधे काँ ओठ, खरोष्ठ। 😁

भारत में ध्यान की परंपरा, मुद्राएँ, सम्यक् बोध, art of living, बुद्ध की देन है। दुःख है। दुःख का कारण है तृष्णा। तृष्णा के त्याग से निर्वाण होगा। लेकिन इसके लिए अष्टांग सम्यक् मार्ग पर चलना होगा। 
सम्यक् दृष्टि। 
सम्यक् संकल्प।
सम्यक् वाक्। 
सम्यक् कर्म। 
सम्यक् जीविका। 
सम्यक् व्यायाम। 
सम्यक् स्मृति।
सम्यक् समाधि। 

आज बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर इस विश्व गुरू को नमन। 

🕉️ मणि पद्मे हम। सोहम। 

🙏🙏🙏

पूनमचंद 
२३ मई २०२४

Wednesday, May 8, 2024

तथागत।

 तथागत।


कल शाम श्री विजय रंचन साहब से भेंट हुई। कुछ सामाजिक चर्चा के बाद उनके दो काव्य ‘ब्रह्म राक्षस’ और ‘यथागत गुलामरसूल संवाद’ का रसास्वादन किया। काव्य रचना वह स्वयं प्रस्तुत करेंगे लेकिन मेरा कुतूहल तथागत में ज़्यादा रहा। तथागत ‘बुध’ का विशेषण था। रंचन साहब ने कुछ व्याख्या बताईं जैसे की ‘thus gone’ अथवा ‘तत् थत्’ अथवा जैनों कि ‘गच्छ’ (जाना) परंपरा के साथ जोड़कर जाने की बात समजाने का प्रयास किया।

क्या यह ‘तत् सत्’ का दार्शनिक पर्याय है? रास्ते में चलते चलते मेरा मनन रहा था। एक बात ज़रूर बैठी थी कि बात आने की नहीं, जाने की है। उन्होंने अपने काव्य संवाद में अनायास ही ‘यथा’ शब्द प्रयोग किया है परंतु मेरी बुद्धि ‘तथा’ के अर्थ को खोजनेमें लग गई।

मेरा ध्यान छह साल पूर्व औरंगाबाद के एक प्रवास पर चला गया जहां पानचक्की बगीचे में एक बुजुर्ग फ़क़ीर से मेरी मुलाक़ात हुई थी।वह दिखने में औरंगजेब (चित्र) जैसा था इसलिए मेरा ध्यान उसकी ओर सहसा आकर्षित हुआ था। औरंगजेब ने यहाँ अपने जीवन के आख़री २५ साल गुज़ारे थे और सादा जीवन जीते हुए बिना मक़बरा दो गज ज़मीन के नीचे दफ़्न हो गया था। उस फ़क़ीर ने इस्लाम की व्याख्या करते हुए समझाया की यह ज़मीन एक इम्तिहान कक्ष है जिसमें हम सब इम्तिहान देने आए है। इम्तिहान में जो लिखेंगे (जिएँगे) वैसा फल क़यामत के दिन मिलना है।इसलिए पल भी न गँवा कर उस परवरदिगार कीं बंदगी में बिताने में भलाई है।

गीता का अध्याय २ पूरी गीता का सार है। उसके श्लोक ११-३० वेदांत तत्वज्ञान का सार है, ३१-५३ कर्मयोग है और ५५-७२ स्थितप्रज्ञ के लक्षण है। हम सब ज़्यादातर लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए राजसी कर्मों में व्यस्त है इसलिए कर्म और उसके फल के बंधन से ग्रसित है। लेकिन कुछ सीमित लोग निःस्वार्थ सेवा को अपना जीवन बनाकर कर्मयोग की साधना करते है। ऐसा कर्मयोग मन को पवित्र करता है। पवित्र मन एकाग्र - स्थिर होता है और स्थिर मन में प्रज्ञा - स्वरूप ज्ञान (who am I) स्थित होता है।

प्रश्न यह उठेगा कि इस स्वरूप ज्ञान की, आत्मा की प्रत्यभिज्ञा की क्या ज़रूरत? यावत जीवेत सुखम् जीवेत। जो लोग अपने को शरीर-मन-प्राण का एक खोखा समझते हैं उनके लिए वर्तमान जीवन ही सत्य है। फिर भी किसी का भी जीवन ले लें, कोई भी पूर्ण सुख और पूर्ण दुःखमय जीवन से कभी नहीं गुजरता। जब सुख होता है आदमी मस्त हो जाता है, बेफ़िक्री आ जाती है। भूल जाता है कि संचित शुभ कर्मो का ढेर कम हो रहा है। दुःख भले दुःख दे, लेकिन दुःख में रामनाम सुखधाम हो जाता है; इन्सान भगवान की बंदगी करता है और अपने आत्म तत्व के निकट आ जाता है। गीता में इसलिए अपनी सच्ची पहचान में स्थित होने के लिए कर्मो के समत्व (evenness) और कुशलता (निष्काम कर्म) पर ज़ोर दिया गया है।

हम आ तो गए लेकिन ‘यथा’ जाना है या ‘तथा’, जीवनयात्रा का यही सत्व है। 

चयन है किः 

जैसे आए थे वैसे ही शरीर-मन-बुद्धि की सीमित पहचान को यथा पकड़कर ‘यथा-गत-जाना’

अथवा 

‘तथा’- अपने सत् स्वरूप को पहचान कर दुःखों (आवागमन) से मुक्त हो जाना - ‘तथागत’। 

जब चलना शुरू किया तब सही, लेकिन मंज़िल का हर कदम उत्थान की ओर ले जाएगा।

तत् सत्। तथागत।

Life is a journey within ‘No Time No Space’! 

पूनमचंद
८ मई २०२४

Saturday, April 13, 2024

पूर्ण।

पूर्ण। 

ईशावास्य और बृहदारण्यक उपनिषद का शांति पाठ पूर्णमदः पूर्णमिदं… एक अद्भुत रचना है।

अर्थ अनेक होंगे लेकिन एक पूर्ण कहीं दूर और एक पूर्ण यहाँ अपने सामने ऐसा नहीं लगता। अदः और इदं दो अलग-अलग नहीं परंतु एक है। 

अदः शब्द रूप पुल्लिंग प्रथमा विभक्ति एकवचन है। सर्वनाम है। इदम् स्री लिंग एकवचन सर्वनाम है। परम का अनुक्रम से शिव और शक्ति रूप इंगित है। दो नहीं एक है, सामरस्य है। अदृश्य दृश्य। 

परम में होने की आहट चिदानंद शिव (प्रकाश-awareness) है। इच्छा-ज्ञान क्रिया शक्ति (विमर्श) है। अंकुरण ध्वनि ओम (तत्सत) सदाशिव है। फिर ईश्वर, शुद्ध विद्या और आगे मायालय का हमारा पृथ्वी तत्व तक का हमारा विश्व। व्यापकता से संकोचन की यात्रा। जितना संकोच उतनी जड़ता और जितनी व्यापकता उतनी चेतनता। 

संकोच विस्तार की क्रिडा है। 

किसकी? 

अद्वैत की। 

कहाँ हो रही है? 

पूर्णोहं के पटल पर। 

कहाँ है? 

है, हम परिचित है। बस ठीक से इंगित कर पहचानना बाकी है। कोई नया नहीं जो मिल जाएगा। कोई दूर नहीं जहां जाना है। 

हमारे साधन शीशे है, उसे माँझ लेना है निष्काम कर्म से; स्थिर करना है उपासना, भक्ति से; और जान लेना है शरणागति, श्रद्धा, ज्ञान से। 

प्राप्तस्य प्राप्ति। निवृतस्य निवृत्ति। 

पूर्णता अमरता है। मृत्यु के भय से पार शाश्वत का साक्षात्कार। आत्मा की प्रत्यभिज्ञा।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥

अद्भुत मंत्र है। मंत्र का साक्षात्कार करें। 


पूनमचंद 

१३ अप्रैल २०२४

Thursday, April 4, 2024

बोध।

 बोध। 


सन २००१ जनवरी-फ़रवरी की बात है। हम सब कच्छ में आए भयानक भूकंप के बाद बचाव और राहत कार्य में जुड़े थे। न बिजली थी, न पानी। न गाड़ियाँ थी न उसके चालक। न कचहरी थी न काग़ज़। सबकुछ बिखर गया था, तहस-नहस हो गया था। ऐसे में पूरा दिन इधर-उधर भागना दौड़ना और गांधीनगर से लाए अपने सरकारी वाहन को नया तैल मिलने तब तक सँभालकर चलाना और हताहत हुए लोगों को निकालना, घायलों को अस्पताल पहुँचाना और बचे हुए को राशन, पानी, आश्रय की व्यवस्था करनी, इत्यादि कार्य में सब जुट गए थे। कुछ लोग बिजली के सब स्टेशन को रीस्टोर कर बिजली आपूर्ति में, कुछ जलापूर्ति में, कुछ संचार आपूर्ति के कार्य में लग गए थे। कुछ आश्रय स्थानों के बनाने में और कुछ राहत सामग्री के स्वीकार और वितरण कार्य में लगे थे। हम सब दिनभर १८-२० घंटे काम में लगे रहते थे। रात में तीन-चार घंटे शरीर सीधा कर सुबह फिर काम में लग जाते थे। जैसे जैसे दिन बढ़ते गए मन थका नहीं था लेकिन शरीर साथ छोड़ने लगा। शरीर में पीड़ा होने लगी। लोगों की पीड़ा के सामने यह कुछ भी न था लेकिन फिर भी विराट कार्य में टिके रहने के लिए शरीर को स्वस्थ रखना उतना ही ज़रूरी था। न योगासन करने का वक्त था न व्यायाम का। बस पूरे दिन और देर रात तक दौड़ते रहना, संसाधन जुटाना और व्यवस्था संचालन के लिए टीम के सदस्यों को दौड़ाते रहना ही कर्तव्य पथ था।

एक दिन सुबह जब मैं उठा, उठते ही आह निकल गई। पीठ और कमर में में ज़ोरों से पीड़ा हो रही थी। बाहर की कोरिडोर में सुबह की चाय का कप लेकर मैं नेपथ्य को देख रहा था इतने में अचानक एक कुत्ता सामने आ गया। मेरे सामने ही खड़ा हो गया। उसने मेरी ओर देखा और अपने आगे के पैरों को थोड़ा आगे किया और पीछे के पैरों को पीछे और बीच की पीठ को ज़मीन की ओर झुकाकर एक खिंचाव पैदा किया और फिर मुक्त किया। ऐसा उसने पाँच-छह बार किया और हर वक्त मेरे सामने नज़र करता रहा, मानो कुछ कह रहा हो। वह कुछ ही देर में अपना खिंचाव और मुक्ति दिखाकर चला गया और इस तरफ़ मेरी पीठ का दर्द उपाय माँग रहा था। मैं सहसा उठकर कमरें में गया और कुत्ते ने जो सीखाया था वह आसन धीरे से करने लगा। ८-१० बार दोहराने से मेरी पीठ का दर्द कुछ कम हुआ। उसके बाद सुबह-शाम पुनरावर्तन करने से तीन दिन में दर्द ग़ायब हो गया। फिर एक नए उत्साह से मैं राहत व्यवस्था कार्य में तल्लीनता से लग गया।

गुरू व्यक्ति नहीं शक्ति है। वह कोई भी रूप में आकर मार्गदर्शन कर सकता है। नदी हो, सरोवर हो, पत्थर हो, सूरज हो, चंदा हो, कुत्ता हो, भेड़ बकरी या कोई इन्सान हो। वह कोई भी रूप में आकर अपने बोध को प्रकट कर हमें मार्गदर्शन कर सकता है। हमारी चेतना में उस चेतना की ज्योति का प्रकाश जुड़ने से बोध का उजाला हो जाता है। बस इतना ही चीज ज़रूरी है, खुली आँख, विनम्रता और स्वीकार।

यहाँ अस्तित्व जो भी है सब कुछ एक ही तत्व का अखंड प्रकाश है। चाहे कोई भी नाम दे दो, चाहे कोई भी शास्त्र या किताब पढ़ लो, चाहे कितने ही प्रवचन सुन लो, लेकिन जब तक उस नाम, शब्द के स्वरूप का अनुभव नहीं हुआ तब तक वह एक जानकारी है, ज्ञान नहीं। ज्ञान अनुभूति है, साक्षात्कार है, अपने सच्चे स्वरूप का; इसलिए महापुरुषों ने साक्षात्कार को ही लक्ष्य बनाया था। 

अद्भुत है यह विद्या, पहचान करने की। जो स्वात्मा है वही परमात्मा है। अद्वय है इसलिए यह कहकर इसे अपने से अलग कर नहीं सकते। दूसरा है ही नहीं। विभाजन नहीं, सम्यक् भूमिका है। इस सर्वसमावेशी भूमि पर अपना पराया नहीं रहता, मैं और तुम अलग नहीं रहता। इस एकता में प्रभुता है। इस बोध का साक्षात्कार, सत-चित-आनंद स्वरूप का साक्षात्कार ही मुक्ति है, अमरत्व है। 

पूनमचंद 
४ अप्रैल २०२४

Tuesday, March 26, 2024

प्राण।

 प्राण।

परम परमात्मा निर्गुण है, अपरिवर्तनशील है। लेकिन एकोहं बहुआयाम् के संकल्प से सगुण हुआ। सत्व, रजस और तमस गुण से प्रकृति हुआ। ब्रह्मा-विष्णु-महेश, सृष्टि-स्थिति-संहार, का खेल हुआ, जो विज्ञान के कारण-कार्य नियम से बंधित और परिवर्तनशील है। पुरूष और प्रकृति, शिव और शक्ति के उन्मेष-निमेष की यह लीला है। सामरस्य है। परमात्मा प्रकृति का प्राण है, जीवनी शक्ति है। प्रकृति जगत का प्राण है, जीवनी शक्ति है। पृथ्वी का हर जीव प्राणों से चलता है। उनके प्राण मुख्य स्रोत से जुड़े है इसलिए मनुष्यों में प्राणोपासना का बड़ा महत्व है। 

अगम की खोज की लत हमें बचपन से लगी थी। भजन सुनते रहते थे। भजन का अर्थ पकड़ने दिमाग़ सक्रिय रखते थे।  मन में होता था कि बात इतनी सहज और सरल है फिर बुद्धि में बैठती क्यूँ नहीं? परमात्मा का मिलन-दर्शन क्यूँ नहीं हो रहा? 

रवि साहब की एक रचना थी। 

कोई नुरते सुरते नीरखो, 
एना घडनारा ने परखो, 
आ कोणे बनाव्यो पवन चरखो? 

आवे ने जावे बोले बोलावे,
ज्यां जोऊँ त्यां सरखो, 
देवળ देवળ करें होकारा, 
पारख थइ ने परखो.. 

ध्यान की धून में ज्योत जलत है,
मीट्यो अंधार अंतर को,
ए अजवाળે अगम सूझें,
भेद जड्यो उन घर को। 
आ कोणे बनाव्यो पवन चरखो? 

माँ के गर्भ में साँसों की डोर नहीं थी। प्राणों का आधार माँ थी। लेकिन बाहर आते ही फेफड़े खुल गए और बाहर अंदर का पवन जुड़ गया और पवन चरखा चल दिया। पृथ्वी पर हवा दे दरिया में जीव जगत सब नाक लगाए टिका है। जिस की पवन डोर टूटती है वह बिखर जाता है।  क्या है यह चरखा? कौन चला रहा है। नुरत सुरत से कैसे देखना है? आते-जाते क्या बोल रहा है। ध्यान में कौनसा उजियारा होगा जिससे उसका भेद मिलेगा?  

साँस अंदर जाती है और बाहर निकलती है। एक मिनट में औसतन १५। एक दिन का हिसाब हो गया २१६००। एक साल का हुआ ७८.८४ लाख। १०० साल का हुआ ७८.८४ करोड़। बस यही तो पूँजी है जो हर पल खर्चा हो रही है और कम हो रही है। अंदर जाए शबद करें सो, बाहर आए बोले हम्। सब सोहम का अजपा जाप कर रहे है, लेकिन सबका उस पर ध्यान नहीं। सोहम् का ओहम् 🕉️ से, अनाहत से नाता जोड़ने इस पवन चरखे की डोर को ध्यान देकर नीरखना होगा। उस के नूर और सुर से तालमेल करना होगा। तब जाकर ज्ञान का उजियारा होगा और भेद-भरम सब मिटेगा। 

प्राण पाँच है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। 

आयुर्वेद में प्राण को दस मुख्य कार्यों में विभाजित किया गया है: पाँच प्राण - प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान - और पाँच उप-प्राण - नाग, कूर्म, देवदत्त, कृकला और धनंजय। प्राण की गति उपर अंदर है और अपान की गति नीचे बाहर। उदान ऊर्ध्वमुखी है, समान नाभि के आसपास बैठा है और व्यान पूरे शरीर में व्याप्त है। हमारे श्वसन तंत्र और पाचन तंत्र का आधार पाँच प्राण है। वात पित्त और कफ के सन्तुलन से आदमी नीरोग रहता है। 

अध्यात्म में श्वासोच्छ्वास भीतर प्रवेश कर रहा अपान, बाहर आ रहा प्राण, श्वासोच्छ्वास का बायें नथुने में प्रमुख होना इड़ा, दाहिने में पिंगला और दोनों का समरूप होना समान-सुषुम्ना है। एक गंगा, दूसरी यमुना और तीसरी सरस्वती है। ध्यान से सुषुम्ना में प्राणों का प्रवेश होकर उठना उदान है और कुण्डलिनी जागरण द्वारा ऊर्जा का मूलाधार सहस्रार पहुँचना व्याप्ति-व्यान है। 

एक अर्थ और भी कर लेते हैं। 

पान का अर्थ है पीना। पहले प्राण के पान स्वरूप को समझते है। हमारे अंदर आ रही हर साँस हमारा पान (लेना) है और बाहर जा रही हर साँस अपान (छोड़ना) है। तंदुरुस्त आदमी के साँस की लंबाई बारह अंगुल होती है; बारह बाहर, बारह भीतर। लेकिन हमारी हर साँस की बाहर अंदर की लंबाई सम और सहज नहीं होती। हमारे विचार, क्रियाएँ उसमें बाधा डालती रहती है। जब स्वास्थ्य बिगड़ता है तब और दख़ल होती है। भीतर जा रहा पान शीतल है और बाहर आ रहा अपान उष्ण है। जो शीतल है वह इडा है और जो उष्ण है वह पिंगला। इसलिए सब से पहले तो इन दोनों की लंबाई को संतुलित करना है। जिसके बारह-बारह हैं वह बारह-बारह पर संतुलित करें। जिनके साँस आयु और स्वास्थ्य के कारण ११-१०-९ अंगुल लंबाई के है वे उस लंबाई पर संतुलित करें। उपर से भीतर आ रहे शिव और नीचे से उनको मिलने उठ रही शक्ति का संतुलन करना है। दोनों के मिलन संगम (प्रयाग) पर विराम स्थान पर, मध्य पर ध्यान देना है जहां सरस्वती-ज्ञान-बोध का प्रवाह है। 

जैसे जैसे साँस संतुलित होती जाएँगी हमारे शरीर, प्राण, मन में स्थिरता आने लगेगी। ध्यान जब और पैना होगा तब धीरे-धीरे साँस की लंबाई कम होना शुरू होगी लेकिन संतुलन बनाए रखना है। धीरे-धीरे १२-११-१०-९-८-७-६-५-४-३-२-१ अंगुल करते करते शून्य स्थिति आने लगेगी। जब लंबाई नाक के नज़दीक पहुँचेगी तब नाक के आसपास भारीपन महसूस होगा। आगे फिर साँस एक सेन्टीमीटर या उससे भी कम होकर चलता होगा लेकिन जैसे नहीं चल रहा। उस स्थिति में पहुँचते ही ध्यान की एकाग्रता इतनी तीव्र होगी कि उदान उठे बिन रह नहीं सकता। एक उदान क्रियात्मक है दूसरा बोधात्मक। क्रियात्मक उदान के उठते ही मूलाधार में कंपन-सक्रियता आएगी, बिजली का एक सुनहरा तार जैसे चल पड़ा और एक पूरा आवर्तन लिए चक्रों का अनुभव करा देगा। मूलाधार के तार सहस्रार से जुड़ते ही चित व्याप्ति होगी। सद् साक्षात्कार होगा। 

षड्चक्रो के भेदन की क्रिया में हम तो मौजूद है, देख रहे है। हम दृष्टा है और वह दृश्य। इसलिए दृश्य के बदले हमारे बोध पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है। जिनको क्रियात्मक अनुभव नहीं हुआ वह फिक्र न करें क्योंकि बोधात्मक विकास ही मुख्य है और वह होना है। हमारे स्वरूप पर जो आवरण है वह बोध से हटेगा और अपने सत स्वरूप, पूर्णोहं का साक्षात्कार होगा। तब बाहर भीतर जग सब एक हो जाएगा, न अपना न बेगाना; एक नूर ते सब जग उपजा कौन भले कौन मंदे? 

हमारे श्वासोच्छ्वास हमारें प्राण नहीं है, लेकिन प्राण की क्रिया है। उसका लेना और छोड़ना वृत्ति है।उसका मध्य प्रवेश द्वार है। भीतर चिति का स्पंदन है। उस चतुर्थ में ठहरना पर-प्राणायाम है। 

प्रकाश है, आवरण ही तो हटाना है।आवरण हटते ही साक्षात्कार है। वही लक्ष्य है, परम सिद्धि है, अमृत है। 

साँस की डोर पकड़कर स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से पूर्ण की ओर चलें। 

कोई नूरते सुरते नीरखो, एना घडनारा ने परखो, हे जी राम, आ कोणे बनाव्यो पवन चरखो। 

पूनमचंद 
२६ मार्च २०२४

Monday, March 25, 2024

पूर्ण।

 पूर्ण। 

पूर्ण अर्थात् जिसमें कोई कमी नहीं। उसमें से कुछ निकाल भी लो फिर भी वह अपने आप पूरितः-भर देगा। जो निकला वह भी पूर्ण होगा। ऐसा पूर्ण, परम शिव जो अमर है, अपनी शक्ति के रूप धरता है। निर्गुण से सगुण होता है। प्रकाश का विमर्श होता है। शक्ति बना तब शिवत्व नहीं गया। एक का उन्मेष दूसरे का निमेष है। लेकिन शिवशक्ति का सामरस्य बना रहता है।

शिव, शक्ति पंचक है। चिद् है, आनंद है, इच्छा है, ज्ञान है और क्रिया है। चिद् यानि चैतन्य। आनंद यानि peaceful-blissful, इच्छा यानि will, ज्ञान यानि सर्वज्ञता, क्रिया यानि सर्वकर्तृत्वता। शिव ही शक्ति बन विश्वरूप धारण करता है। शक्ति सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह, अनुग्रह करती है। पंच शक्तियों के संकोच से नाना प्रकार की सृष्टियाँ बनती है। चिद् संकोच, आनंद संकोच, इच्छा संकोच, ज्ञान संकोच, क्रिया संकोच। शक्तियों का संकोच ही दृश्य जगत है, रूप जगत है, रंग जगत है। रंगमंच है। जैसा संकोच वैसी उपाधि। उपाधि भेद से इच्छाभेद, ज्ञानभेद, कर्मभेद होता है। जिससे हर कोई अपने अपने संकोच के दायरे में रहकर यह जगत खेल का हिस्सा बना है।कोई घन सुषुप्त है, कोई क्षीण सुषुप्त, कोई स्वप्न सुषुप्त। तत्वरूप में सब शिव है और विमर्श रूप में शक्ति। इसलिए नाना प्रकार ही सही लेकिन इस जगत का हर जीव, हर कण शिव है, शक्ति है, पंचशक्ति  पंचकृत्यकारी है।  

संकोच सीमा पैदा करता है। कमी लगती है। कुछ अंधकार-अज्ञान जैसा लगता है। शरीर और संसार से आसक्त जीव मौत से डरता रहता है। अपूर्णता उसे खटकती है। मूलतः अपना स्वरूप पूर्ण है इसलिए अविद्या के कारण अनुभव हो रही अपूर्णता से छूटने और पूर्णता पाने बहिर्जगत की ओर अथवा कोई कोई गुरूगमवालें अंतर्जगत की ओर चल पड़ते है। 

परम, शिव हुआ, शक्ति हुई। कृष्ण हुए, राधा हुई। है दोनों एक, लेकिन एक देखता रहेगा, दूसरी लीला करेगी। कहीं शक्ति देगी, कहीं से हट जाएगी। जीवन संचार करेगी, समाप्त करेगी। शिव साक्षी - कृष्ण साक्षी निष्कंप होकर दृष्टा बन अपनी ही शक्ति का, अपनी दुर्गा का, अपनी राधा का खेल देखता रहेगा। एकोहं बहुष्याम् की यही को लीला है। जब शिव संकल्प की अवधि पूरी होगी, उपाधि सब विलय हो जाएगी। फिर नया संकल्प, नया संसार। शिव की पूर्णता का उच्छलन ही शक्ति है, जगत है, विश्वरूप है। 

क्या चाहिए? जगत के भोग या अमृत? दोनों मार्ग खुले है। शक्ति दायाँ भी देगी और बायाँ भी। चाह जाँचिए और चल पड़े। जो माँगे वह मिलेगा। अमृत कुंभ छोड़ कौन मृत्यु के मुँह में जाएगा? 

अपनी ह्रदय गुहा में जो संस्कार पड़े है उसके अनुरूप शिव भजें या शक्ति, निर्गुण भजें या सगुण, कृष्ण भजें या राधारानी, सब नाव नदी पार कराएगी। जिसमें चित्त स्थिर हो, बैठ जाना। पहुँचने की जगह तो एक ही है। ह्रदय गुहा। जहां अपने असली रूप की पहचान करनी है। असत (नश्वर) छोड़ना है और सत (शाश्वत) का साक्षात्कार करना है। अंधकार-अज्ञान-अविद्या से मुक्त होना है और परम तेज-बोध-ज्ञान पाना है। अमरत्व की पहचान करनी है और मृत्यु से पार हो जाना है। 

ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । 

मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ 

पूर्ण को अपूर्णता कैसी? 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥

क्या होगा? आँखें बदल जाएगी। नई आँखें लग जाएगी। संकोच सब हट जाएगा। चारों ओर एक ही नज़र आएगा। उसके वैभव को देख, अपने वैभव को देख, गदगद होगा, द्रवित हो उठेगा, नाचेगा, गाएगा और मौन हो जाएगा। 

पूर्ण है, पूर्ण है, पूर्ण है। 

पूनमचंद 

२५ मार्च २०२४

साभारः कश्मीर शैव दर्शन, बृहदारण्य उपनिषद। 

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