Wednesday, July 27, 2022

Heart is on the right side

Heart on the right side


In spiritual philosophy of India the Sages talk about the five stages of building a temple of self realisation. The first step is the foundation. If the foundation (भूमि) is weak the whole temple will collapse in no time. Therefore before going to the second stage of making a pedestal (पीठिका) for installing the idol (मूर्ति स्थापन) and infusing the vital force (प्राण प्रतिष्ठा) into it and to meditate (ध्यान) to attend confidence of SELF realisation one has to sincerely work on the foundation. 


Heart is the foundation on which from Earth to Sadasiva (the 34 elements of Kashmir Shaivdarshan) rest. Where is that screen of consciousness on which this diverse universe is manifested?Unless one enters into the abode of the heart, how would one dive deep into it and realise the Self as guided by the Saints and Scriptures. 


I would like to share one dialogue between Shri Raman Maharshi and a young man who had questioned him. 


“Raman Maharshi was asked by an educated young man: Why do you say that the Heart is on the right side? Where as the biologists have found it to the left! What authority you have? 


Maharshi said: Quite so. The physical organ is on the left; that is not denied but the Heart of which I speak is non physical and is only on the right side. 


It is my experience, no authority is required by me. Still you can find confirmation in a Malayalam Ayurvedic Book and the Sita Upanishad. 


Heart usually understood to be the muscular organ lying on the left of the chest. The Bible says a fool’s heart is in the left and wise man’s on the right. You cannot know it (Heart) with your mind. You cannot realise it by imagination. The only direct way to realise is to cease to fantasize and try to be yourself. When you realize it, you automatically feel that the Centre is there. This is the Centre, the Heart.


Again the young man enquire about the real location of the Heart. 


Maharshi said: The heart is used in the Vedas and Scriptures to denote the place from where the notion ‘I’ springs. Does it spring only from the fleshy ball? It springs within us somewhere right in the middle of our being. The ‘I’ has no location. Everything is the Self. There is nothing but the That. So the Heart must be said to be the entire body of ourselves and of the entire universe is conceived as ‘I’. But to help the practiser we have to indicate definite part of the Universe or of the Body. So this Heart is pointed out as the Seat of the Self. But in truth we are everywhere. We are all that is and there is nothing else. I hope you learn. Om Tat Sat!”


Unless we know the location of the Heart at right side the journey of spirituality or heartfulness won’t begin. 


The goal is experiencing absolute union, पर शिव समावेश । What is समावेश? ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, शून्य, निर्विकल्प बोध। making union of knower, knowledge, known, awareness-absolute consciousness without division, thoughtful awareness in which all disappear and only experiencing remains. 


We shall stay in ‘Right Heart’.


Punamchand 

27 July 2022

www.punamchand.com

Sunday, July 24, 2022

चैतन्य प्रकाश।

 चैतन्य प्रकाश। 


एक पब्लिक सर्विस कमीशन का वर्ग १-२ पदों के लिए इन्टरव्यु चल रहा था। उम्मीदवार एक के बाद एक बोर्ड के समक्ष आ रहे थे और अपने ज्ञान और व्यक्तित्व का परिचय दे रहे थे। महिलाएँ भी थी परंतु उनमें दो महिला उम्मीदवारों का इन्टरव्यु विशेष रहा। 


दोनों एक के बाद एक जवाब बड़े ध्यान और एकाग्रता से दे रहे थे। मैं अचंभित था। इतनी समझ, इतना ठहराव और इतना विश्वास कैसे? हम पूछते रहे और वो जवाब देते रहे और आख़िर में उस दिन के दिये गये सबसे ज़्यादा गुण उन्होंने ले ही लिए। 


मेरा ध्यान प्रश्न पूछने, उनके जवाब और व्यक्तित्व के मूल्यांकन के साथ साथ अपने आप पर भी था। सोच रहा था पिछले सब उम्मीदवार अपने पाँच ज्ञानेंद्रियों के साथ जो नहीं कर सके यह इन्होंने कैसे कर लिया?


हम सब जानते हैं और अभ्यास भी कर रहे हैं एक महत्वपूर्ण इन्द्रिय से। यह जो दृश्यमान जगत है, खंड खंड विभाजित दिख रहा है उसमें दिख रहे अखंड विश्वोर्तीर्ण शिव-शक्ति को देखने का प्रयास कर रहे है। जो भी देख रहे है अपनी ही लाइट से प्रकाशित है। अगर अपनी लाइट गुल हुई तो सब गया। उसका शब्द स्पर्श रूप रस गंध हमें लुभाता है और कभी कभी डराता भी है। लेकिन क्या जानते हैं कि इन सब अभ्यासों में अगर चक्षु इन्द्रिय का साथ न हो तो कितना बड़ा विक्षेप हो जायेगा। जब कुछ दिखेगा ही नहीं तब कैसे उस अंधेरे में जल रही रोशनी का और उस रोशनी में प्रकाशित विश्व का सही अनुभव कर सकेंगे? जब देखना ही नहीं रहा फिर कैसे कहेंगे के मैं ऐसे देख रहा/रही हूँ या वैसे देख रहा/रही हूँ। 


परंतु वो दोनों महिला वैसे ही देख रही थी और जवाब दे रही थी जैसे चक्षुवालें उम्मीदवार। उनसे भी अच्छा प्रदर्शन कर रही थी। वे दोनों  प्रज्ञाचक्षु थे। आँख देख नहीं सकती थी फिर भी वह कोन था जो उनके पथ को प्रदर्शित कर रहा था? वे कान से सुन रहे थे, बुद्धि से समझ रहे थे और ज़रूरी विश्लेषण कर विवेकपूर्ण जवाब दे रहे थे। कौन था उनके कान का कान? उनकी समझ का प्रकाश? चैतन्य प्रकाश।


केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथम प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ (केनोपनिषद् १.१)


(यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है। किस प्रयुक्त होकर प्रथम प्राण चलता है। किसके इच्छित वाणी बोलता है। कौन देव चक्षु और श्रोत्र को प्रवृत्त करता है।)


यह जीवन किसके द्वारा प्रेरित है? वह कौन है? वह कौन है, जो हमारी वाणी में, कानों में और नेत्रों में निवास करता है और हमें बोलने, सुनने तथा देखने की शक्ति प्रदान करता है?


हमारा ध्यान उजालेवाले प्रकाश से बाहर नहीं हट रहा है इसलिए वह जो भीतर का प्रकाश है उसकी बात बैठ नहीं रही। उसी प्रकाश से ही तो यह सब सूर्य, नक्षत्रों, तारें, पंच महाभूत, सृष्टि, जीव, हमारा स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर प्रकाशित है। उस प्रकाश की गहराई में उतरिए जहां कोई अंधकार नहीं। जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति का एक सूत्र रूप तुरीया, तुरीयातीत। जहां कोई पीड़ा नहीं। अपूर्व शांति, जागरण और प्रेम का क्षेत्र। जहां सब कोई एक हो जाता है। शिव। शिवोहम्। अहम हमारा व्यक्ति तक रहा तो अहंकार है लेकिन उस अहम जो सब में है और वही तो यह रहस्य का मालिक है जो आपका, मेरा, सबका एक है। 


🕉 नमः शिवाय। 


पूनमचंद 

२४ जुलाई २०२२

Saturday, July 16, 2022

विश्व गुरू।

 विश्व गुरू। 


कुछ साल पहले औरंगाबाद के मेरे एक प्रवास में एक मुस्लिम वृद्ध से मुलाक़ात हुई थी। वह कहते थे कि यह पृथ्वी एक परीक्षा खंड है जिस में जो जैसा करेगा उतना ही पायेगा। इसलिए मनुष्य जन्म मत व्यर्थ गँवाओ, परीक्षा की ठीक ठीक तैयारी करो और रब की बंदगी करो। भगवद्गीता और जैन कर्म सिद्धांत में कर्म और उसके फल की शिक्षा है। परंतु यह सब ज्ञान एक एक जीव को अलग अलग आत्मा में परिच्छिन्न कर उसकी भिन्न भिन्न यात्रा की सीख देते है। लेकिन वेदांत एक, अद्वैत आत्मा की शिक्षा देता है। 


यह विश्व एक शिक्षालय (शिवालय कह दे) है जहां हर एक घटना हर, एक व्यक्ति हमें कुछ न कुछ शिक्षा देता रहता है जब तक हम अपनी सच्ची पहचान में अवस्थित न हो जाए। 


देख तो सब रहे हैं पर सत्य कौन देख रहा है? 


परमात्मा देखने की कुशलता प्राप्त करनी है। बस नजर-vision ही तो बदलनी है। वह vision गुरू दृष्टि से आती है। 


गुरू एक नहीं अनेक होंगे पर बुद्धि को समझते समझते एक दिन जब टप्पा बैठ जायेगा तब काम होगा। यहाँ कोई व्यक्ति या देश के विश्व गुरू होने की बात नहीं, पूरा विश्व गुरू है जहां एक बच्चे से भी आत्म बोध मिल सकता है। 


जब एक ही आत्मा है, तब यह विश्व उससे अलग कैसे होगा? बस हमारी नज़र ठीक नहीं देख रही। यह नज़र के लिए, समझ के लिए कौशल्य चाहिए जो गुरू दृष्टि या गुरू कृपा से मिलती है। पुनः पुनः श्रवण और मनन से, उस बोध को अंतःभाव में स्थिर करने से कुशलता आ जाती है। परमात्मा देखने की कुशलता। 


सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाउउधुना । कुतश्चित् कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ।।AG2.3॥


(अब शरीर सहित इस विश्व को त्याग कर किसी कौशल द्वारा ही मेरे द्वारा परमात्मा का दर्शन किया जाता है ॥३॥)


तीन-चार दृष्टांत दिये जाते है। रज्जु-सर्प, पानी-तरंग, कपड़ा-धागा, गन्ना-चीनी। 


अज्ञान अवस्था में यह दृश्यमान विश्व हमें सर्प नज़र आता है जो जन्म, ज़रा, व्याधि, मृत्यु के दुःख से पीड़ित करता है क्योंकि कि हम देहभाव को सत्य मान जी रहे है। यह देहभाव ही सर्प है। जैसे हि ज्ञानदृष्टि से, निदिध्यासन से देहभाव त्याग दिया, आत्मा-चैतन्यभाव का रज्जुभाव आ गया। सर्प चला गया और सर्प से बनी सब पीड़ाएँ विभाजन ख़त्म हुआ। जब रज्जु देखता हूँ तो सर्प नहीं देखता। मैं वह आत्मा (पारमार्थिक सत्ता) हूँ जिसमें यह विश्व (व्यावहारिक सत्ता) व्याप्त है। 


यथा न तोयतो भिन्‍नस्तरंगा फेनबुखदा: । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ।।AG2.4।।


(जिस प्रकार पानी लहर, फेन और बुलबुलों से पृथक नहीं है उसी प्रकार आत्मा भी स्वयं से निकले इस विश्व से अलग नहीं है ॥४॥)


जैसे तरंग, फेन, बुदबुदा पानी से भिन्न नहीं वैसे यह विश्व मुझ आत्मा से भिन्न नहीं। यहाँ ‘I’ का मतलब consciousness है। यह विश्व, चैतन्य से अलग नहीं। पानी जैसे आत्मा है और विश्व जैसे तरंग, फेन, बुलबुले। जैसे पानी में बुदबुदे होते है इस तरह नामरूप से भिन्न और देश काल में बाधित यह विश्व वास्तव में पानी यानि चैतन्यात्मा ही है। एक ही अनेक दिख रहा है। आत्मा साक्षी, विभू (अधिष्ठान), पूर्ण, एक है, उस पर निदिध्यासन करतें रहे। 


तंतुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारत ।

आत्यतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ।।AG.2.5॥


(जिस प्रकार विचार करने पर वस्त्र तंतु (धागा) मात्र ही ज्ञात होता है, उसी प्रकार यह समस्त विश्व आत्मा मात्र ही है ॥५॥)

कपड़ा क्या है? धागा ही तो है। धागा नहीं तो कपड़ा कहाँ? अगर धागा निकल गया तो कपड़ा कहाँ रहा।यह उदाहरण में धागा नष्ट होने से कपड़ा नष्ट हो जाता है। परंतु आत्मा-विश्व के अस्तित्व में विश्व जाने के बाद भी आत्मा रहता है, क्योंकि आत्मा शाश्वत है।


विश्व आत्मा से ही उभरा है इसलिए वह भी आत्मा ही है। जैसे माँ से बच्चा पैदा होते ही माँ और बच्चा अलग हो जाते है। यहाँ ऐसा नहीं है परंतु रस्सी में साँप का प्रोजेक्शन हो जाता है हमारी बुद्धि में। साँप है ही नहीं, बुद्धि से कल्पित है। रस्सी ही है। आत्मा ही है। चिन्मय है। जैसे अन्नमय का अर्थ अन्न ही अन्न, प्राणमय का अर्थ प्राण ही प्राण, वैसे ही चिन्मय का अर्थ चैतन्य ही चैतन्य। विश्व आत्मा ही है, the Self। 


यथैवेमुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तेव शर्करा । तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरतरम् ।।AG.2.6॥


(जिस प्रकार गन्ने के रस से बनी शक्कर उससे ही व्याप्त होती है, उसी प्रकार यह विश्व मुझसे ही बना है और निरंतर मुझसे ही व्याप्त है ॥६॥)


गन्ने (इक्ष्वाकु) और चीनी का उदाहरण दिया जाता है। भगवान राम और जैन तीर्थंकरों के कुल को इक्ष्वाकु कुल कहा गया है। जैसे चीनी गन्ने के रस से भरी है, गन्ने की मिठास उस में प्रतिष्ठित है वैसे ही यह विश्व आत्ममय है। ‘I’ pervade the whole world।  नई दृष्टि बनानी है। मैं जो देखता हूँ वह भी आत्मा है, वही सत्य है। जो सर्प दिख रहा था वह वास्तव में रस्सी है। यहाँ कोई अलग आत्मा, अलग विश्व नहीं, एक ही आत्मा है, और वह मैं (self) हूँ।


आत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते। 

रज्जवज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि॥AG.2.7)


(आत्मा अज्ञानवश ही विश्व के रूप में दिखाई देती है, आत्म-ज्ञान होने पर यह विश्व दिखाई नहीं देता है । रस्सी अज्ञानवशसर्प जैसी दिखाई देती है, रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प दिखाई नहीं देता है ॥७॥)


यक़ीन करिए। यही सत्य है। यही वेदांत सार है। 


बस इतना करिए कैसे करके यह बोध बैठ जाये। 


जो यह बोध बैठा दे वह गुरू, चाहे एक या अनेक। आख़िर तैरना तो आपको है अपनी प्रातिभ सत्ता से। आपके गुरू आप ही है। न फिर धारी चाहिए न फ़्लोटर। आप बस तैर रहे है। निराधार। 


पूनमचंद

१६ जुलाई २०२२

Monday, July 11, 2022

अष्टावक्र गीता १.१४

 अष्टावक्र गीता (१.१४)


देहाभिमानपाशेन चिरंबद्धोऽसि पुत्रक।बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव॥अ.गी.१-१४॥


ऋषि अष्टावक्र शिष्य जनक को उपदेश देते हैं कि देहाभिमान ही वह पाश है जो बंधन का कारण है। मैं बोध (ज्ञान) हूँ ऐसे ज्ञान खड्ग से उस बंधन को काट कर सुखी हो। 


मैं पुरुष हूँ। मैं स्त्री हूँ। मैं इस जाति का उस जाति का। मैं इस धर्म-पंथ का उस धर्म-पंथ का। यह सब उपाधि पहचान है। क्या शरीर कहता है कि मैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शुद्र हूँ? जो शरीर नहीं है परंतु चेतना है वह कैसे अपने को शरीर कहेंगीं? 


चार चीजें समझ लें। बाल्टी, बाल्टी का पानी, पानी में सूर्य का प्रतिबिंब और सूर्य। बाल्टी स्थूल शरीर है, बाल्टी का पानी मन बुद्धि रूप सूक्ष्म शरीर, उसमें रही चेतना समष्टि चेतना का परावर्तन है और चौथा वह वास्तविक सूर्य-चेतना (pure consciousness)। 


कौन है आप? बाल्टी? बाल्टी का पानी? पानी में सूर्य प्रतिबिंब? या सूर्य? 


अब जिसे अपनी असली पहचान का पता नहीं और बस बाल्टी पर ही रूक गये उनको सूर्य तक कैसे पहुँचाएँ। अभी जिनका ध्यान शरीर जाति, संख्या, धन संपादन, फैलाव पर से हटा नहीं, वह अपने विशुद्ध आत्मरूप स्वरूप तक कैसे पहुँचेंगे? 


उनका वह लक्ष्य नहीं। अनात्म में आत्म बुद्धि करनेवाले इसलिए धनवान हो सकते है, बुद्धिमान हो सकते है, सत्तावान हो सकते है परंतु सुखी नहीं। 


सुख का मतलब यहाँ पद धन स्त्री पुत्र इत्यादि नहीं परंतु अव्यय (कभी कम न हो), अभव (कभी चला न जाय), पूर्ण (all complete) है। जो कि कूटस्थ चिद्रुप स्वयं प्रकाश है। 


पूनमचंद 

११ जुलाई २०२२

Friday, July 8, 2022

गुरू।

 गुरू। 


गुरू पूर्णिमा का पर्व नज़दीक (१३ जुलाई) है। आकाश में काले घने बादल उमड़ रहे है। वर्षा ऋतु अपने चरम की और आगे बढ़ रही है। पूर्णिमा का चाँद नज़र आने की संभावना कम है फिर भी आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन यह पर्व समग्र विश्व में जहां जहां भारतीय है बड़े उल्लास से मनाया जायेगा। भगवान वेद व्यास के जन्मदिन की व्यास पूर्णिमा ही गुरू पूर्णिमा है। यह घने बादल जीव को आवृत किये हुए तीन मलों (आणव, मायीय, कार्म) का प्रतीक है। आवरण के उस पार तो चाँद अपनी पूर्ण कला से सूरज की रोशनी को प्रतिबिंबित कर रहा है। 


भगवद्गीता में भगवान अर्जुन को दिव्य चक्षु देकर अपने असीम विश्वरूप विराट स्वरूप के दर्शन कराते है। अर्जुन भगवान के अद्भुत अनंत स्वरूप में अनगनित मुख, आँखें, भुजाएँ, उदर देखता है। उनके विराट रूप का कोई आदि और अन्त नहीं है और वह प्रत्येक दिशा में अपरिमित रूप से बढ़ रहा है। उस रूप का तेज आकाश में एक साथ चमकने वाले सौ सूर्यों के प्रकाश से अधिक है।भगवान के विश्व रूप को देखकर उसका हृदय भय से कांप रहा है और उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। भयतीत अर्जुन श्रीकृष्ण से उस पर दया कर उन्हें एक बार पुनः अपना आनंदमयी भगवान का रूप दिखाने की प्रार्थना करता है।श्रीकृष्ण उसकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए पहले अपना चतुर्भुज नारायण रूप और तत्पश्चात अपना दो भुजाओं वाला मनोहारी पुरुषोत्तम रूप धारण करते हैं।(११.१०-५५)। 


भगवान को सूरज की उपमा दी है। जिसका रूप सीधे देखना किसी के लिए सहज नहीं। गुरू को चाँद बताया है। जो सूरज की उष्ण और दाहक किरणों को अपने में समेट कर भगवान के शीतल स्वरूप को उजागर करता है। जिससे कि साधक भय नहीं परंतु प्रेम और भक्ति से अपने इष्ट की उपासना कर सके।


गुरू किसलिए? 


कश्मीर शैवीजम में सभी आत्मा शिवरूप है, बस खुद की मर्ज़ी से ज्ञान संकोच कर जीवरूप धारण किया है। अब जीवरूप से शिवरूप बनने में एक बड़ी बाधा आईं है। ज्ञान संकोच का संकल्प शिव का है, जिससे बना जीव उसे कैसे तोड़े? इसलिए जो शिवरूप में स्थापित हुआ है ऐसे गुरू के अनुग्रह और संकल्प की ज़रूरत रहती है जो जीव को पुनः शिवरूप में स्थापित करें। शिवरूप होने से गुरू में शिव की पंचकृत्यकारी शक्तियाँ आ जाती है। जिसमें से अनुग्रह से वह शिष्य का मंगल करते है। गुरू कृपा वैसे तो अविरत बहती रहती है पर साधक के अवस्था भेद से उसे कम या ज़्यादा लाभ होता है। 


कौन है गुरू? 


गुरूगीता में गुरू को परमेश्वर रूप माना है।   


ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥


ब्रह्मा के आनंदरुप, परम सुखरुप, ज्ञानमूर्ति, द्वंद्व से परे, आकाश जैसे निर्लेप, "तत्त्वमसि" हि जिसका लक्ष्य है, अद्वितीय, नित्य, विमल, अचल, सब भावों से और त्रिगुण (सत्व-रज-तम) से परे है ऐसे सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ ।


गुरू व्यक्ति नहीं ज्ञान है जो साधक के ह्रदय में स्थापित होकर अपनी स्थिति का दान दे देते है।गुरू एक ही है। साधक को चाहिए बस समर्पण। 


गु मतलब गुह्य (अंधकार) और रू मतलब दूर करने वाला (प्रकाश)। अज्ञान के अंधेरे से निकालकर हमें जो ज्ञान की रोशनी दें वही गुरू। 


चार प्रकार के गुरू होते है। कल्पित, अकल्पित और दोनों के मिश्रित। कल्पित गुरू शास्त्र संमत क्रम से दीक्षा लेकर शास्त्र ज्ञान पाकर शुद्ध विद्या के मार्ग से होते हुए परानुग्रह अधिकार प्राप्त करता है। कोई कल्पित होने पर भी स्वतः प्रवृत्ति होकर रहस्यों को समझ लेता है। ऐसे गुरू कल्पिताकल्पित है। 


अकल्पित गुरू के किसी गुरू की अपेक्षा नही। अपनी भावना से ही वह शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर लेते है। महाज्ञानी प्रातिभ ज्ञान से साक्षात्कार कर लेते है। बौद्ध धर्म में श्रावक अनाचार्यक होते है। वह भीतर से ही ज्ञान पाते है। गुरू की अपेक्षा नही। साधक बिना गुरू बुद्धत्व को प्राप्त कर लेता है। 


कुछ असद्गुरू होते हैं जो माया वर्ग में भोग तो दे सकते है परंतु दिव्य ज्ञान देकर माया से तार नहीं सकते। सद्गुरू ज्ञानान्जन शलाका से अज्ञान तिमिरान्ध दूर कर ज्ञान चक्षु खोल देते है। वह कृपापूर्वक दर्शन, स्पर्श या शब्द से शिष्य के देह में शिव भाव का आवेश करा सकते है। (योगवासिष्ठ, १.१२८.१६१)। गुरू युक्तियों से अपद्म को पद्म रूप में परिणत करके है। ऐसे सद्गुरू की प्राप्ति भगवान के अनुग्रह से होती है। 


गुरू का महत्व। 


गुरु गोविन्द दोऊ खड़े , काके लागू पाय|

बलिहारी गुरु आपने , गोविन्द दियो बताय||


संत कबीरदास जी  गुरु की महिमाका वर्णन  करते हुए कहते हैं कि जीवन में कभी ऐसी परिस्थिति आ जाये की जब गुरु और गोविन्द (ईश्वर) एक साथ खड़े मिलें तब गुरु ने ही गोविन्द से हमारा परिचय कराया है इसलिए गुरू को ही पहला प्रणाम करना चाहिए। 


गुरू सिद्ध गुरू हो या दिव्य गुरू, मूल में परमेश्वर ही अनुग्राहक है। सद्गुरू में साक्षात परमेश्वर का दर्शन करना है। 


गुरू खोजे कैसे? 


यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।

शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।

इस दोहे में कबीरदास जी ने शरीर की तुलना विष के बेल से की है वहीं गुरु की अमृत की खान से। वे कहते हैं कि अपना शीश देकर भी अगर गुरु की कृपा मिले तो यह सौदा बहुत ही सस्ता है। लेकिन चेतावनी भी देते है। ज्ञान और गुण देखकर गुरू कीजिए। ‘गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं। भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि ॥’


सद्गुरू भगवद्कृपा का प्रासाद है। 


गुरू से क्या चाहिए?


स्वरूप ज्ञान। मोक्ष। असली पहचान। 


परंतु कुछ लोगों को ज्ञान चाहिए कुछ को भोग और कुछ को दोनों। सिद्ध योगी में यह दोनों देने की क्षमता है। लेकिन मोक्ष के लिए ज्ञानी गुरू ही उत्तम है। 


गुरू एक नाव है। नदी पार करने काम तो आते है परंतु जब किनारा आ जाता है तब नाव को किनारे छोड़ आगे बढ़ना होता है। गुरू मार्गदर्शक है और ह्रदय में ज्ञानरूप से बिराजते है इसलिए गुरू शरीर के बंधन से मुक्त होकर आगे की यात्रा साधक को खुद करनी है। अपने आत्म स्वरूप की असली पहचान में स्थित होना है। 


आत्मा तो केवल एक ही है। फिर उसे शिव कहो, गुरू कहो या जीव। बिंदु ही सिंधु है। बस जानने का और मानने का फ़र्क़ है। जैसे ही जीव भाव छोड़ा, अपना अहंकार समर्पित किया, स्वरूप ज्ञान हो गया। जब एक ही है फिर कौन अपना या कौन पराया। 


बचपन में मेरे मोहल्ले में युपी से एक साधु आया करते थे और एक ही भजन गाते थे। शायद सूरदास के भजन प्रभु मेरे अवगुण चित्त न धरो से बना था। 


“गुरू मेरे समदर्शी है, मैं मैला नदियाँ का नीर। 

अगला पिछला पाप धोले तुं, उतरी जायेगा पार।”


श्रवण से शास्त्र ज्ञान आता है। चिंतन से चिंतन ज्ञान। परंतु तत्व विशेष के साक्षात्कार में भावनामय ज्ञान का उत्पन्न होना उत्तम माना गया है। 


गुरू पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर सब साधकों और शिक्षार्थीयों को अभिनंदन और सब गुरूओं (आध्यात्मिक, शैक्षणिक, जीवन पथ के मार्गदर्शक) को साष्टांग दंडवत् प्रणाम। 


पूनमचंद 

८ जुलाई २०२२

Thursday, July 7, 2022

शक्तिपात।

शक्तिपात। 


शैवों में शक्तिपात साधना का बड़ा महत्व है। आणव, मायीय और कार्म मल से आवृत आत्मा ज्ञान संकोच के कारण अपने शिव स्वरूप को नहीं जानता-मानता और इसलिए शिव के पंचकृत्य सीमित रूप से ही कर पाता है। मल की वजह से वह पाश में बंधा हुआ पशु है और मल पाक या मल विसर्जित होते ही पशु से पशुपति बन पंचकृत्यकारी बन सृष्टि, पालन, संहार, निग्रह और अनुग्रह के ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेता है। 


लेकिन यहाँ संस्कार से कहो या शिक्षा से, उसे शुद्र या दास बनाकर अपने ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए गुरू कृपा और गुरू के शक्तिपात से मलमुक्ति की सलाह दी जाती है। गुरू में वह शक्ति है या नहीं यह तो उसको पता नहीं लेकिन एक ने दूसरे को कहा और दूसरे ने तीसरे को, ऐसे उसे श्रद्धा के पाश से सांप्रदायिक बनाया जाता है। कौन बंधा और कौन मुक्त हुआ यह तो पता नहीं पर मैं ग़लत जगह नहीं हूँ ऐसा दिखाने लोग एक-दूसरे की श्रद्धा या अंधश्रद्धा को बल देते रहते है। सब को सरल मार्ग चाहिए और शोर्टकट। इसलिए यहाँ पूजा पाठ विधियों में भी यजमान के बदले दक्षिणा देकर ब्राह्मणों से कर्मकांड करवाने का रिवाज प्रचलित रहा। किसी विशेष को सिद्धि का बड़ा मोह रहता है। इसलिए सिद्धि और चमत्कार के लिए साधना करते हैं और चेलें चपाटे में घीरे रहने से आह्लादित रहते है।  


मैंने गुरू गीता का आसारामजी आश्रम और उनको जहां से साक्षात्कार हुआ था वह गणेशपुरी सिद्धपीठ में बड़ा महिमामंडन सुना था। कश्मीर शैव मत के प्रत्यभिज्ञा ह्रदयम् ग्रंथ की शिक्षा और साधना के शिविर में पिछले साल नवम्बर (२०२१) में भरूच जाने का मौक़ा मिला था। शिविर के बाद हम एक छोटे ग्रुप में कबीरबड और नर्मदा किनारे आये गायत्री शक्तिपीठ के आश्रम हो आये। वहाँ मेरी मुलाक़ात एक संन्यासी भिक्षुक से हुई। वह अपाहिज था और गायत्री मंदिर के दरवाज़े पर खड़ा था। कच्छ के किसी गाँव में उसका वतन था। कुछ पूछने से पता चला कि पिताजी का बचपन में देहांत हो गया था ओर माताजी भी वह कुछ ६-८ साल का था तब किसी साधु को सोंप चल बसी। उसके गुरू ने उसे बस एक ही शिक्षा दी थी। नियमित गुरूगीता पाठ करना। जो वह नित्य क़रीब ५०-६० साल से कर रहा है और इधर उधर भटक कर अपनी ज़िंदगी काट रहा है। न उसकी ग़रीबी गई। न अपाहिजता। न लाचारी। भगवद्ग प्राप्ति स्वरूप प्राप्ति की एक साधना है जो अंधेरे कमरे में अंधश्रद्धा से नहीं मिलती। अच्छे ज्ञानी, तपस्वी, भक्त, सिद्ध भी ज़रा और मृत्यु की पीड़ा से भाग नहीं सके। इसलिए लक्ष्य साफ़ और सटीक और यात्रा सावधानी, विश्वास और श्रद्धा से होनी ज़रूरी लगी।


शक्तिपात के रहस्य के बारे में मैंने कुछ संतगण से पूछा था; जिसमें आसारामजी, डोल आश्रम वाले सिद्ध कल्याण बाबा, जूनागढ़ के संत पुनिताचार्यजी और दिगंबर साधु नयन सागरजी से और वलसाड शांति आश्रम के स्वामी नित्यानंद के नाम गिन सकता हूँ।वैष्णवों और अद्वैतवादीयों को इस में कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं। स्वामी रामसुखदास, स्वामी हंसानंद सरस्वती, स्वामी सत्यानंद सरस्वती, इत्यादि संतों का और शांकर वेदान्तीयों ने श्रवण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन, अंतःकरण शुद्धिकरण और परमेश्वर पर श्रद्धा पर ज़ोर रहा है। सर्वम् खलु इदम् ब्रह्म या अहम ब्रह्मास्मि, तत्वमसि महावाक्यो में ही सब आ जाता है। आदि शंकराचार्य ने अद्वैत चिंतन किया लेकिन आख़िरी में बता दिया कि व्याकरण ज्ञान से भगवद् प्राप्ति नहीं हो सकती। भज गोविंदम् उनकी प्रसिद्ध रचना रही। बाबा मुक्तानंद ने अपने पुस्तक चित्त शक्ति विलास में कुंडलिनी यात्रा का बारिकियाँ से विवेचन किया है। स्वामी योगानंद परमहंस ने ‘autobiography of a yogi’ में बाबा महोवतार, लाहिड़ी महाशय इत्यादि के क्रियायोग और चमत्कारों की चर्चा है। हिमालय के सिद्ध योगी, जूनागढ़ के अघोरी, नाथ संप्रदाय के नाथ, दिगंबर जैन साधु, सिद्ध लोक के योगीयों की चर्चा भारत के घर-घर में होती है। हज़ारों साल से दर्शन, कुंडलिनी, कृपा और चमत्कार हमारे खून में रचते बसते है। 


श्री आसारामजी, श्री शिवकृपानंद, तथा बहुतायत संतों का ज़ोर ध्यान और कुंडलिनी जागरण विधि पर रहा है।एकाग्र चित्त होकर मूलाधार में सुप्त कुंडलिनी शक्ति को जगाकर सुषुम्ना मार्ग से ऊर्ध्व कर चक्र भेद से सहस्रार में शिव के मिलन यात्रा करनी होती है। बीच राह में चक्रों के दर्शन, सिद्धियाँ मिलती है लेकिन साधक दृष्टा को दिख रहे रंग और दृश्य को छोड़ आगे की यात्रा बनाये रखना है और पिंड में ब्रह्मांड का साक्षात्कार कर लेता है। इस मार्ग में मन की दृढ़ता न हो तो पद पद पर चलित होने का भय बना रहता है। 


श्री कल्याण बाबा ने परमेश्वर और शक्ति की भक्ति और अंतःकरण की शुद्धि पर ज़ोर देते हुए शनैः शनैः कृपा पाने की शिक्षा दी थी। श्री पुनिताचार्यजी ने श्वासोंश्वास के साथ ध्यान करते करते नाभि से नासिका तक ध्यानस्थ होते ही गुरू तत्व की जागृति पर ज़ोर दिया था। एकबार भीतर का गुरू तत्व जाग गया फिर बाहर भागने की ज़रूर नहीं। वह अपने आप आगे मार्गदर्शन करता रहता है।दिगंबर श्री नयन सागरजी ने ध्यान करते करते प्रथम आत्मा के भीतरी क्षेत्र में प्रवेश पर ज़ोर दिया जिसके बाद शक्तिपात और सिद्धियों का लाभ अपने आप समझ में आने लगता है। स्वामी नित्यानंदजी (वलसाड) ने मन के विचारों का सतत अवलोकन करते करते राग द्वेष से मुक्त रहने की साधना पर ज़ोर देते हुए एक चरवाहे का दृष्टांत देते हुए बताया था कि कैसे वह गाँव में गरीब और लाचारी में जी रहा था परंतु आश्रम से जुड़ने के बाद उसके और उसके परिवार के विचारों, शिक्षा और समझ में बड़ा परिवर्तन आया। यही शक्तिपात है। शनैः शनैः उस परम के गुणों में अपना विसर्जन ही शक्तिपात का परम उद्देश्य है।


अभी एक किताब पढ़ रहा था। ‘भारतीय संस्कृति और साधना’। महामहोपाध्याय श्री गोपीनाथ कविराज की यह किताब है जिसमें शक्तिपात के बारे में एक प्रकरण है जिसमें उन्होंने द्वैत, अद्वैत और शैव मत से विषय का विवेचन किया है। शक्तिपात के तीन प्रकार  हैः तीव्र, मध्य तथा मन्द। प्रत्येक में फिर तीन उपप्रकारः तीव्र के तीव्र तीव्र, मध्य तीव्र, मन्द तीव्र। इसी प्रकार मध्य और मन्द के तीन उपप्रकार है। तीव्र तीव्र में प्रारब्ध सहित सभी कर्म नाश होते ही देहपात हो जाता है। उससे कम मध्य तीव्र शक्तिपात में देहपात नहीं होता परंतु अज्ञान की निवृत्ति होती है। ज्ञान स्वतः ह्रदय में स्फुरित होता है। अपनी प्रतिभा में स्फुरित होने के कारण इसे प्रातिभ ज्ञान कहा जाता है। यह शुद्ध विद्या है जो परमेश्वर की इच्छा से प्रकट होती है। न्यून शक्तिपात के साधक वामाशक्ति के अधिष्ठान में मायापाश से बंधे प्रलयाकल की अवस्था प्राप्त करते हैं जो सप्त प्रमाता में सकल से उपर है। ज्येष्ठाशक्ति के अधिष्ठान में जीव के ह्रदय में स्वस्वरूप प्राप्ति की इच्छा उदित होती है और वह अपनी योग्यता के अनुरूप भोग या मोक्ष को प्राप्त करता है।


ज्ञान उदय के तीन रास्ते है।या तो गुरू, शास्त्र के अवलंबन से उदित होता है या स्वयं भी उद्भूत होता है। गुरू की अपेक्षा शास्त्र की श्रेष्ठता है और शास्त्र की अपेक्षा अपनी प्रतिभा की श्रेष्ठता है। गुरू शास्त्र का अर्थज्ञान देता है और शास्त्रज्ञान प्रातिभ ज्ञान के उत्पादन में काम आता है। प्रातिभ ज्ञान का उदय होने पर गुरू या शास्त्र का कोई उपयोग नहीं रहता। योग्यता विशिष्ट पुरुषों में प्रातिभज्ञान स्वतः उदित होता है।जीव, ईश्वर, मायादि पाशों का ज्ञान प्रातिभ ज्ञान है। उनके लिए दीक्षा, अभिषेक के बाह्य क्रियाकांड का कोई प्रयोजन नहीं।  


क्या होता है शक्तिपात से? कड़वा नीम मीठा हो जाता है या खट्टी कढ़ीं कड़वी लगती है? वस्तुतः बाह्य दुनिया में कुछ भी बदलाव नहीं होता, हमारी दृष्टि (देखने का ढंग) और समझ बदल जाती है। शक्तिपात से भीतरी शक्तिओं के जागते ही इन्सान का स्वभाव बदल जाता है। स्वार्थ से मुक्त होकर परमार्थ का राही बना जाता है। 


शक्तिपात से भगवद् भक्ति का उन्मेष होता है।इन्द्रिय वृत्तियाँ अंतर्मुख होकर आत्मा से तादात्म्य लाभ करती है। ज्ञान क्रिया और चैतन्य उत्तेजित होते है। प्रातिभ ज्ञान से शास्त्रों का रहस्य ठीक ठीक जान सकते है। यह अपने आप उदित ज्ञान परमेश्वर के अनुग्रह का प्रासाद मानिए परंतु यह महाज्ञान बहिर्मुख चित्त की वृत्तियों को अंतर्मुख कर शक्तियों में परिवर्तित कर लेता है। ऐसा ज्ञानी बंधन से मुक्त होकर पूर्णत्व को प्राप्त कर लेता है और बाक़ी का जीवन लोकहित मे बिताता है। 


जीव में अशुद्धियाँ और चित्त संस्कार अलग-अलग होने से शास्त्र उपकरण भी भिन्न भिन्न होते है। गुरू दीक्षारूप अस्त्र से मायापाश का छेदन करता है तब साधक में प्रतिभा तत्व विकसित होता है। जैसे भस्म में छिपी अग्नि मुख या धौंकनी की वायु से दहक उठती है, जैसे ठीक समय बोया बीज अंकुर से अभिव्यक्त होता है वैसे ही प्रातिभज्ञान गुरु के द्वारा जाग्रत होता है। 


यह प्रातिभ ज्ञान महाज्ञान है जो विवेक (आत्मबोध) से उत्पन्न होता है और शास्त्रानुकुल से श्रेष्ठ है। विवेकज्ञान से दूरश्रवणादि ज्ञान की उत्पत्ति होती है। लेकिन विवेक वैराग्य लाता है और सिद्धियों से उपराम कराता है। प्रातिभ ज्ञान से भीतर बाहर सर्वत्र परमात्मा की सत्ता प्रत्यक्ष होती है। एकमात्र परम की भावना की दृढ़ता से जीवन्मुक्त वह विवेकी स्वयं मुक्त होकर दूसरे को भी मुक्त कर सकता है। 


जीव पंचमहाभूत के अधीन इन्द्रियविशिष्ट है इसलिए वस्त्र बदलने की तरह एक देह से निकलकर दूसरा देह ग्रहण करता रहता है। लेकिन विवेक के उदय से शुद्ध विद्या अवस्था प्राप्त कर निग्रह अनुग्रह में समर्थ हो जाता है। संकुचित आत्मबोध या अपूर्ण ज्ञान से मुक्त होकर परमेश्वर स्फूर्ति में आ जाता है। 


शक्तिपात ग्रहण करनेवाला मनुष्यः भगवान की निश्चला भक्ति, मंत्र सिद्धि, सब तत्वों को स्वायत्त करने में समर्थ और शास्त्रों के अर्थज्ञान के प्राप्त कर लेता है।  


भगवद्शक्ति का शक्तिपात और परमेश्वर की कृपा का बड़ा महत्व है परम पद पाने के लिए। योग्य अयोग्य यहाँ नहीं देखा जाता। बस एक बार हो गया मानो बिना अंतिम लक्ष्य पहुँचे बिना शांत नहीं होता। फिर चाहे अपने आप प्रातिभ ज्ञान से हो, शास्त्र से हो या गुरू से। 


परमेश्वर है, जीव का पुनर्जन्म होता है और सबकुछ एक ही शक्ति का प्राकट्य है यह पूर्व धारणाएँ है। 


शक्तिपात हो या न हो आप शक्ति से ही जी रहे है। चैतन्य शक्ति। चैतन्य के ह्रदय में सत्य का निवास है।


पूनमचंद 

७ जुलाई २०२२

Monday, July 4, 2022

बिन्दु, त्रिकोण और आप।

 



बिंदु, त्रिकोण और आप। 


सृजन को हर धर्म ने अपने अपने अंदाज़ में बयान किया है। प्रजा अशिक्षित थी इसलिए उन्हें सरलता से समझाने प्रतीकों का प्रयोग भी किया गया। परिणाम स्वरूप बिंदु, त्रिकोण, चतुष्कोण, अष्टकोण या वर्तुल के स्वरूप में प्रतीक सभी धर्मो के जन जीवन में पूजा, पेंडेंट या चिह्न के रूप में प्रचलित हुए है।  


शून्य से सृजन हुआ? अव्यक्त से व्यक्त हुआ? कुछ तो हुआ है इस सृजन नींव में जिसके आधार पर यह ग्रह, तारें, नक्षत्र, निहारिकाए, अनंत ब्रह्मांड की रचना और उसमें भी ख़ास पृथ्वी पर जीवन का उल्लास पनप रहा है। वह शक्ति आँखों से ओझल है पर उसकी हाज़िरी उसके सृजन के माध्यम से प्रकट है। 


शैवों ने इस प्राकट्य को बिंदु और नाद से समझाया है। एक परम जो अव्यक्त है उसमें शिव चैतन्य के प्रकाश और उसकी शक्ति विमर्श (पंचकृत्यकारीः इच्छा, ज्ञान, क्रिया, निग्रह, अनुग्रह) 

से सदाशिव बिन्दु का एक स्पन्द, नाद रूप में प्राकट्य। उसमें से पहला ‘अहम’ ईश्वर और उसके बाद अनुक्रम से शुद्ध विद्या, माया, पंच कंचुक (कला, विद्या, राग, काल, नियति), आवरण, पुरूष, प्रकृति, अहंकार, बुद्धि, मन, पाँच कर्मेन्द्रियाँ (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, घराना), पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (वाक्, हाथ, पैर, उत्सर्जन, उपस्थ), पाँच तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध), पाँच  महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) इस प्रकार ३६ तत्वों का यह विश्व। एक असीम के ज्ञान संकोच से यह सारा संसार बना है। सांख्य और अन्य दार्शनिक शाखाएँ उसे २४ या २३ तत्वों से गिनती कराते है। 


आत्मा/शिव चित् (प्रकाश)रूप है। उसका विमर्श शक्ति वाक्र-रूपा है।उसके गर्भ में अ से क्ष तक की मातृका शक्ति चक्र में सब ज्ञान निहित है। वह परा अवरोह क्रम से पश्यन्ति, मध्यमा, वैखरी बन भिन्न भिन्न सृजन को प्रकाशित करती है। शिव प्रकाश के चार अंश हैः अम्बा, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री तथा वामा। शिव विमर्श की शक्ति के भी चार विमर्शांश हैः शान्ता, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया। उसका वाक् स्फुरण परा, पश्यन्ति, मध्यमा तथा वैखरी है। 


अम्बा-शान्ता-परा; वामा-इच्छा-पश्यन्ति; ज्येष्ठा-ज्ञान-मध्यमा; रौद्री-क्रिया-वैखरी इस प्रकार शक्ति आविर्भाव होता है जो सृष्टि विश्व की स्थिति का कारण है। यह चार प्रकार परस्पर मिलकर मूलत्रिकोण अथवा महायोनि के रूप में परिणत होती है।  शान्ता अम्बिका का सामरस्य परावाक् इस त्रिकोण का बिन्दु केन्द्र है जो नित्य स्पन्दन है और अभिन्न शिवशक्ति का आसन है। त्रिकोण की वाम रेखा पश्यन्ति, दक्षिण रेखा वैखरी और बेज रेखा मध्यमा है। यह त्रिकोण क्रम से शान्त्यतीत, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति के पाँच आभामय स्तर से उज्ज्वल है। यह त्रिकोण के बाहर एक चतुष्कोण अंकित किया जाता है जिसे भूपुर कहते है। 


भूपुर से केन्द्र बिन्दु का साधना मार्ग है। जिस पर तांत्रिक साधनाएँ अपरोक्ष अनुभव तक की गति करा सकती है। इसी त्रिकोण के स्पन्दनो से अष्टकोण कल्पित है। 


योग मार्ग में मूलाधार के अग्निबिम्ब से क्रमशः स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत (सूर्यबिम्ब), विशुद्ध (चंद्र बिंब), आज्ञा, और उपर बिन्दु, अर्ध चन्द्र, निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना तक की; सकल से निष्कल तक का मार्ग है। उसके बाद महाबिन्दु सदाशिव जो शिवशक्ति का आसन है वहाँ चक्रवेध क्रम से पहुँचा जा सकता है। यह श्रीचक्र है। जिसके तीन विभाग हैः चतुष्कोण से त्रिकोण, बिन्दु से उन्मना और महाबिन्दु। भूपुर, षोडशदल, अष्टदल, चतुर्दशकोण, बाह्य दशकोण, आन्तर दशकोण, अष्टकोण और त्रिकोण इतना मूलाधार से आज्ञा तक के सुषुम्ना मार्ग में अवस्थित है। 


शिव अग्नि है, शक्ति सोमरूप। दोनों का सामरस्य बिन्दु जिसे रवि या काम कहते है। इसके क्षोभ (साम्य भंग) से सृष्टि का प्रारंभ होता है। अग्नि के ताप से जैसे घृत पिघलकर बहने लगे वैसे ही शिव प्रकाश अग्नि के विमर्शरूपा शक्ति स्राव से श्वेत और रक्त बिन्दु के बीच से चित्कला का निःसरण होता है। महाबिन्दु के स्पन्दन से तीन बिन्दु अलग अलग होकर रेखा रूप में परिणत होकर महात्रिकोण आकार धारण कर शिव से पृथ्वी पर्यन्त छत्तीस तत्वों से बने इस विश्व का आविर्भाव होता है। 


सृजन की शृंखला में पृथ्वी पर जड़ और चेतन समूह नज़र आते है। वास्तव में सबकुछ शिव का प्राकट्य ही है परंतु घन, क्षीण, स्वप्न और जाग्रत सुषुप्ति भेद से सब विभाजित नज़र आ रही है। उन सबमें मनुष्य शिरोमणी है। एक सुप्त चेतना ८४ लाख योनियों में से उत्क्रांत होते हुए मनुष्य रूप तक पहुँची है। इसलिए मनुष्य जीवन का बड़ा महत्व है। यही एक योनि अपनी बुद्धि, याद शक्ति और वाक् शक्ति के बल से बिन्दु की शब्दात्मिका वृत्ति को वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा (नाद) भेद से पहचान कर स्वर व्यंजन की अ-क्ष तक की मातृकाओं को मंत्र, वाक्यों, प्रार्थना में जोड़कर उस शक्ति की उपासना, आराधना करती है।जीवमात्र में यह शब्द व्याप्त है परंतु मनुष्य योनि में बुद्धि की विशेषता से ज़्यादा लाभ है। वह अपने स्वरूप पर लगे तीन मलावरणः आण्व, मायीय और कार्म मल से मुक्त होकर सर्वज्ञता और सर्वकर्तृत्व की भूली शक्ति को अर्जित कर सकता है।

चैतन्य की अभिव्यक्ति का यही रहस्य है, जो की आप ही हो।  


पहचाना? 


पूनमचंद 

४ जुलाई २०२२

महायज्ञ

 महायज्ञ। 


हिन्दु धर्मशास्त्रो में अग्नि का बड़ा महत्व है। अग्नि से जीवन की शुरुआत है और अग्नि में अंत। आरोग्य और जीवन रहस्योद्घाटन भी अग्नि में है। इसलिए यहाँ यज्ञों का बड़ा महत्व था। अग्नि की ज्वालाओं को सात जिह्वा गिनकर उसमें आहुति देने का बड़ा महत्व रहता था। इस सात जिह्वाओं के सात नाम भी दिये गये थेः हिरण्या, कनका, रक्ता  कृष्णा, सुप्रभा, अतिरिक्ता। आहुति से और आहुति के प्रकार से फल निष्पन्न होता था। यज्ञों में सोमयाग, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध प्रधान थे। 


हम भी एक अग्नि पिंड है। जठराग्नि में भोजन की आहुति देकर अपनी जीवन रेखा को काल से बचा रहे है। आयुर्वेद में अग्नि के सात स्तर और हर स्तर के सत्व (धातु) और मल का बड़ा बारीकी से अवलोकन है, और इन्हें एक निश्चित क्रम में रखा गया है।


हम जो भी खाना खाते हैं वो पाचक अग्नि द्वारा पचने के बाद कई प्रक्रियाओं से गुजरते हुए अनुक्रम से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य, सप्तधातुओं में बदल जाती है। ये सारी धातुएं एक क्रम में हैं और प्रत्येक धातु अग्नि द्वारा पचने के बाद अगली धातु में परिवर्तित हो जाती है। जैसे कि जो आप खाना खाते हैं वो पाचक अग्नि द्वारा पचने के बाद सबसे पहले रस अर्थात प्लाज्मा में बदलता है। इसके बाद प्लाज्मा खून में और फिर खून से मांसपेशियां बनती है। मांसपेशियों से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, इसी तरह यह क्रम चलता रहता है। सबसे अंत में शुक्र अर्थात प्रजनन संबंधी वीर्य-शुक्राणु आदि बनते हैं। इस क्रम में जो अपशिष्ट बनता है जिसका शरीर में कोई योगदान नहीं वो मल के रुप में शरीर से बाहर निकल जाता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर में पाचक अग्नि का ठीक होना और सप्तधातु का बनना बहुत ही ज़रूरी है।


अन्न की शुद्धि क्रिया से बना शुक्र जीवन केन्द्र है। यह अधोगामी होकर कालाग्नि कुंड (योनि) में गिरता है, तो नये जीवन को जन्म देता है, परंतु दाता के जीवन को ह्रास कर जरा, मरण, विकार, मालिन्य देता है। लेकिन वही बिंदु  अगर शुद्धीकरण यात्रा चालु रखें और ऊर्ध्वगति सिद्धि क्रम से आगे बढ़े तो आनंदमय स्थिति को प्राप्ति करता है। इसके लिए बिंदु की क्रमोत्तर द्वितीय अग्नि में आहुति का बड़ा महत्व है। 


हम पाँच कोषों (शरीर) से बने हैः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। हम जो कुछ खाते है उसके शोधन से शुक्र-वीर्य बनता है। देह का प्रथम अमृत वीर्य है जो अन्नमय कोष का पोषक है। वीर्य शुद्ध होकर ओज बनता है जो प्राणमय कोष का पोषक है। ओज शुद्ध होकर मनोमय को पुष्ट कर निर्मल ओज मन बनता है। पर मन में अशुद्धि रहती है इसलिए उसके विकल्परूपी मल की आहुति देकर संकल्प का विज्ञान बनता है। विज्ञान से विज्ञानमय कोष की पुष्टि होती है। विज्ञान में अनुकूलता का सुख और प्रतिकूलता का दुःख (मल) होता है। इसलिए विज्ञान की आहुति देकर पंचम आनंद प्राप्त होता है। आनंदमय माँ की गोद है जहां फिर कोई आहुति की ज़रूरत नहीं। 


यहाँ शुद्धीकरण ही धर्म है और कल्याण मार्ग है इसलिए आहार शुद्धि, देह शुद्धि, इन्द्रियशुद्धि, अहंकारशुद्धि और चित्तशुद्धि का महत्व है। कर्म स्वार्थ के लिए नहीं अपितु परार्थ हो; जिससे नया आवरण न बनें और पहले का आवरण क्षीण हो। जिससे क्रमशः महाज्ञान (स्वरूप ज्ञान) की प्राप्ति हो। वही यज्ञ है। 


ज्ञानगंगा में स्नान करें और ज्ञानाग्नि में मल विसर्जित करें। आप शुद्ध बुद्ध हो। बस असली पहचान करनी है और उस असलियत में स्थित रहना है। खाने से गाने (आनंद) तक का सफ़र है। 


सब का कल्याण हो। 


पूनमचंद 

३ जुलाई २०२२

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