Tuesday, March 29, 2022

माला जप।

 माला जप। 


कल हम तीनों संवाद कर रहे थे; लक्ष्मी, धवल और मैं। धवल ने प्रश्न रखा। लोग माला फेरते है इससे क्या फ़ायदा? लक्ष्मी ने कहा एक्यूप्रेशर हो रहा है, अंगूठे और उँगली पर माला का दबाव पड़ने से ह्रदय चक्र प्रभावित होता है और स्वास्थ्य फ़ायदा होगा। मैंने बताया, चित्त की एकाग्रता बढ़ती है।  भिन्न भिन्न विषयों और विचारों से ध्यान एक मंत्र या जाप पर केन्द्रित होकर सूक्ष्म होता है, जिससे बुद्धि सतेज होती है और समझ बढ़ती है। धवल ने कहा, यह सब सही लेकिन उससे भी आगे संयम बढ़ता है, सहनशीलता बढ़ती है और अहिंसा बढ़ती है। ऐसे लोग प्रतिकार और प्रतिरोध नहीं करते पर बर्दाश्त कर लेते है, जिससे अहिंसा और शांति निर्मित होती है। वर्ना परिस्थिति का विरोध करने से या प्रतिक्रिया देने से हिंसा एवं अशांति बढ़ती है। आप मध्य में हो हर वक्त। या तो अहिंसा को चुनो या हिंसा। माला फेरना, नाम जप करना एक विधि है, जो सहायक होती है, अपने आपको अहिंसक बनाने में। 


मेरे तुरंत सामने आ गई सन २४ सितंबर २००२ में अक्षरधाम पर हुए आतंकी हमले की वह घटना जिसमें ३३ लोग मारे गये थे और ८० से अधिक घायल हुए थे। मंदिर का प्रबंधन करने वाले बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख प्रमुख स्वामी महाराज ने संयम का उत्तम उदाहरण दिया था। हरि इच्छा मानकर सह लिया ओर शांति बनाए रखने की अपील की जिससे कोई प्रतिहिंसा नहीं हुई।प्रमुख स्वामी महाराज ने पूरे जीवन माला फेरी थी और सब के मंगल की कामना की थी। वह अहिंसा का विजय था। 


माला फेरों पर उल्टी माला मत फेरना।😊


पूनमचंद 

२९ मार्च २०२२

Sunday, March 20, 2022

Reincarnation

Reincarnation 


Shri Sanjay Prasad, Shri Vijay Ranchan and I were discussing the concept of reincarnation. We couldn’t finish the talk but whether the concept of rebirth which is the core of Hinduism was there in original Vedas, Upanishads and Gita or had been introduced later was not answered as there were many addition and alterations in these books over the centuries. However, the term Moksha of Hindu, Nirvana of Buddhist, Kaivalya of Jain, the last day of Christianity and Kayamat of Islam are suggestive of some journey and judgement for each individual consciousness. 


Whether God became man or a man achieved human divine to escape reincarnation, the cycle of birth and death and have eternal life is a question that has divided the believers into two beliefs. Vaishnavas in Hindu consider Lord Krishna a God became man. The Vedantis consider all atmas as one eternal Brahman. Similarly in Christianity, Roman fraction believed that Jesus was God become man and the orthodox believed that he was a man who achieved human divine. 


Jainism believe in eternity of each soul but a journey in a cycle of four categories as per karmas of merits and demerits. No role of any God in individual’s destiny. 


Buddhism doesn’t believe in soul, self or spirit but accept only a stream of consciousness. The self oriented mind transcends to nirvana. Anatta is similar to Brahman of Vedanti. Former merges into stream of ‘no self’ and latter merges into the stream of ‘self’. May be like night and day of the same universal consciousness. 


Islam doesn’t believe in reincarnation but believe in Allah and Spirit. It believes that there is only one birth on earth. The Doomsday comes after death and each spirit will be judged as to one has to once for all go to hell or be unified with God. This may be similar to the belief of Christianity that when a person dies their soul would sleep in the grave along with their corpse. This soul sleep continues until a time in the future known as the “final judgment” in which God give to each person according to what he has done. 


Hinduism and Jainism believe in a continuous journey of a soul in a cycle birth and death in which the soul is in no waiting and gets position in rebirth of reward or punishment as per its deeds. 


We are witness to our conscious life of some years, therefore, it is not difficult to believe in existence and our presence as soul or no soul. What happens after death is a mystery. Whether each soul takes on the flesh again or not, there is difference in opinion and only faith can end the arguments. When we look at a tree passing through the seasons of autumn and spring, the tree remains but the leaves get changing through the cycle of birth and death. Similarly, the stream of Consciousness, whether call it God, Brahman, Allah or No-Self, is eternal. The bodies made of flesh are taking birth and are dying but the consciousness remains as it is like the life in a tree. Tree is just an example as it also dies one day but the Consciousness is eternal, never die.


न जायते म्रियते वा कदाचि

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।Gita. 2.20।।


Punamchand 

20 March 2022

Tuesday, March 15, 2022

Gitasar, Samyak Darshana

 


गीता की आख़री सलाह सम्यक् दर्शन। 

गीता समस्त उपनिषदों का सार है। क्षेत्र भौगोलिक कुरुक्षेत्र रहा या हमारा अंतर्मन जहां पर अच्छे बुरे के बीच अहर्निश लड़ाई चालू रहती है वह तो तत्व चिंतक तय करेंगे लेकिन १८ अध्याय और ७०० श्लोक से बनी गीता उपनिषदों का सार है। सांख्य, ज्ञान, कर्म और भक्ति का अनोखा संगम है। कुछ ७०० श्लोक में से संजय और धृतराष्ट्र के २३ , अर्जुन प्रश्न के ५७ और भगवान श्रीकृष्ण के जवाबदेही  ६२० श्लोक है। अध्याय २ पूर्व सारांश है और अध्याय १८ उत्तर सारांश। अध्याय ३-१७ में सब विस्तार से समझाया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय १८ के ६६ वे श्लोक में अर्जुन को दी हुई आख़री सलाह सब के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। 

भगवान श्रीकृष्ण आख़री सलाह देते है। 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: || 

“शोक मत कर। सब धर्मों को त्याग कर मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा।”

अर्जुन को सिर्फ़ एक ही काम करना है। सब कुछ छोड़कर ईश्वर शरण जाना है। बाक़ी सब ज़िम्मेदारी उस ईश्वर की है। 

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? धन, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करना? नहीं, रहस्यमयी सृष्टि के भेद को उजागर कर आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना है। यानि आत्मा जैसा है वैसा जानना और उस आत्मा का सर्वत्र दर्शन करना ही जीवन का परम लक्ष्य है। 

क्या है आत्मा? 

आत्मा ज्ञान स्वरूप है। जैसे एक दीया अग्नि और प्रकाश स्वरूप है, वैसे ही आत्मा ज्ञानप्रकाश स्वरूप है। सब जीव जैसे ज्ञान के टिमटिमाते दीये। उपर लगे सूक्ष्म और स्थूल आवरण से उस प्रकाश की अभिव्यक्ति अलग अलग, लेकिन ज्ञानप्रकाश सबमें एक। 

कैसे शरण जायेंगे? कहने से नहीं होता। कुछ करना है। वही साधना है। 

हिन्दू धर्म में द्वैत, अद्वैत और द्वेताद्वैत मत होने से एक ही श्लोक के भिन्न अर्थ निकलते है। हालाँकि सरिता की तरह उस सब का गंतव्य तो उस परम की प्राप्ति ही है। 

द्वैत मत: जो सभी धर्मों में प्रमुख है, जिसमें भक्त और भगवान दो अलग मानकर भगवान की भक्ति से मुक्ति पानी है। सांसारिक जीवन बहिर्मुखता का है। हर कोई कर्म जो हमें बहिर्मुख बनाता है, वह सब धर्म, अधर्म सब कर्मो का त्याग कर ईश्वर की शरण में रहना है। अंतर्मुखी होना है। शांत बैठना और भगवान में तल्लीन होना ही लक्ष्य है। आत्मा ह्रदय में स्थित है इसलिए ह्रदय में ठहरने के लिए मन का स्वास्थ्य, एकाग्रता और स्थिरता प्राप्त करनी है। ईश्वर की करूणा जो निरंतर बह रही है उसका अनुभव करना है। जो हुआ अच्छा हुआ, मानना है। कृपा कठोर भी हो सकती है, ऐसा सोचने से शरणागति बढ़ती है। शरण के लिए जाति, वर्ण, संस्कार, भूतकाल, अवगुण, इत्यादि विचार और अवस्था की सोच नहीं रखनी है। भगवान सब को शरण देते है, स्वीकार करते है। बस इतना ही कहना है, तवास्मि, मैं आपका हूँ। जो शरण में आये है उनके लिए वह वात्सल्य का सागर है। सब पापों से मुक्त कर मोक्ष देता है। बस इतनी सी बात है। तवास्मि। 

दूसरा अर्थ है साधन और साध्य का। दो मार्ग है, एक प्रवृति मार्ग और दूसरा निवृत्ति मार्ग। प्रवृति में तीन आश्रम है: ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम। चतुर्थ संन्यासाश्रम निवृत्ति का है। लोकेष्णा, धनेष्णा, पुत्रेष्णा से मुक्त रहना। शम , दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति और तितिक्षा इन छः साधनों को विशेष मात्रा में करना है। जैसे धनार्थी धन उपार्जन के लिए दिन का ज़्यादातर वक्त उसी काम में देता है, वैसे ही मोक्ष के लिए श्रवण मनन निदिध्यासन की दीर्घकाल साधना कर षट् संपत्ति बढ़ाना है। बाक़ी सब काम छोड़ सिर्फ़ भगवान को ही लक्ष्य बनाना है। 

तीसरा अर्थ जो की मुख्य माना गया है। हमारा जीव जो आत्मा अनात्मा का जोड है उसमें से आत्म स्वरूप को पहचान लेना है। देह से अहंकार पर्यंत जो भी है उस अनात्मा और उसके अनात्म धर्म का त्याग कर आत्मा में स्थित होना है। मेहनत सब अनात्मा से हटने की है। आत्मा में स्थिति तो अपने आप है। देह धर्म देह में रहने देना है। दृष्टा, दृश्य देह से अलग है। वैसे ही इन्द्रियों का धर्म भी अलग है। वैसे प्राण धर्म अलग है। वैसे ही मनो धर्म और बुद्धि धर्भ अलग है। अहं और मन को अलग करने सूक्ष्म विवेक की ज़रूरत रहेगी। सुख दुख मन के धर्म है, उससे अलग हट आत्म स्वरूप पहचानना है। वैसे ही ज्ञान, अज्ञान, निश्चय बुद्धि के धर्म से शुद्ध चैतन्य अलग है। तत्व चिंतन करते हुए देह से बुद्धि तक सब अनात्म पदार्थों के धर्मों को त्याग कर असली आत्म स्वरूप को अहं रूप निश्चित करना है। आखरी में अहंकार धर्म भी छोड़ना है। जो मेरा है वह मैं नहीं हो सकता। शुद्ध ‘मैं’ पर उनके धर्म लागू नहीं है।पर से खिसकना हैं और स्व में बसना है। बाह्य विषयों और व्यक्तियों को छोड़ना वैराग्य हैं, पर उससे भी आगे देह से अहंकार तक के अपने अंदर बसे अनात्म धर्म को त्याग आत्म धर्म में स्थापित होना है। वही विराम मोक्ष है। 

एक है भक्ति का, तवास्मि। दूसरा है साधन कर्म का, षट् संपत्ति का। तीसरा है साध्य ज्ञान का। ज्ञान से ज्ञान का परिचय कर लेना है। तीन अलग-अलग नहीं है पर एक दूसरे के पूरक है। जैसे चलोगे, तीनों साथ साथ चलेंगे। 

एक बार आत्म स्वरूप ज्ञान हो गया तो अंदर बाहर आत्म दर्शन होने लगता है।वही है सम्यक् दर्शन। एकदम सरल और सबसे कठिन भी। 

पूनमचंद
१५ मार्च २०२२

Saturday, March 12, 2022

Digambara Nirgranthi

Digambara Nirgranthi


The word Digambara refers to ‘one who is naked’. Dis means space and ambar means clothing, the space is their cloth is called Digambara. The body is also a cloth of Atma. 


Digambara monks were referred as ‘nigamthesu’ in 7th Major Pillar Edict inscription of Samrat Ashoka of 236 BCE. He mentioned three distinct groups of ascetics other than Buddhists: Nirgranthis, Brahmanas and Ajivikas. 


I met three ‘Digambar Jain Sadhus’ on Bhavnath road, Junagagh yesterday (11/3/2022). They were doing morning walk. The Chief of the three Nayan Sagarji came forward and after preliminary introductions invited me to his Ashram Samoharan, Nirmal Dhyan Kendra located on Rupaytan road in Girnar taleti. After the funeral of Saint Punitacharyaji was over, I went to the Ashram of Nayan Sagarji. His Guruji died some 15 months ago who had spent 42 years of his life on two spots of Girnar and serve many pilgrims and locals through herbs of Girnar. His Guru, Bharati Bapu, Kashmiri Bapu and Punitacharyaji were like light houses of spiritual kingdoms of Girnar. With their departure in one year, there is vacuum created which will take time to fill up as the kshetra is turning more into a tourist spot. 


I went to Samosharan Ashram in the afternoon. It’s a beautiful campus with a temple, some rooms and a bhojanalaya. A coupon of ₹70 serves you a good satvik meal of a vegetable, pulse, roti, dal-chaval and papad. Each monk stays in his allotted room and spends time as per his daily routine of walking, meditation, reading and writing. The monks take meal and water only once in 24 hours. They don’t eat meal in utensils and drink water in a glass but take the meal and water in two hands as few gulps served by the host. As they don’t deposit money for their food, their daily meal is sponsored by some individual and the manu is limited to the capacity and choice of the host barring the prohibitory items. 


Digambara Sadhus are called ‘nirgranth’ means without any bonds. They have 28 attributes of pure conduct including five major ahimsa, truth, non-thriving, celibacy and non possession. These twenty-eight primary attributes are: five supreme vows (mahāvrata); five regulations (samiti); five-fold control of the senses (pañcendriya nirodha); six essential duties (Şadāvaśyaka); and seven rules or restrictions (niyama). A book of scripture is their only asset. 


We discussed the spiritual subject of Atma which Nayan Sagarji  explained through Aum Naad Sadhana, Pranayama (purak-rechak-kumbhak) and meditation. He was clear that each individual has to walk on his own path but as per the guidance of his master. None can explain the form of Atma unless one realises and experiences himself. A man describes quality and taste of sugar but unless the listener eats and tastes it, he won’t understand the word sweetness of sugar. Similarly, without going into deep meditation inside one won’t experience the taste or form of Atma. The mind is moving in subjects and objects of outer world and it remains in disturbed state mostly. Therefore, the sadhana begins with inverting the attention of mind towards self and thereafter travelling to deep inside where the true form of Atma is realised, experienced. How deep is that meditation, he explained with a story of a monk who didn’t realised a deer rubbed on his back when he was in meditation. 


How to select a master was a difficult question none can answer easily. However, he explained the differences between Sadhana (spiritual practices) and Shadhano (worldly objects). If the master and disciple join for Sadhano, they won’t progress. “लोभी गुरु लालची चेला दोऊ नरक में ठेलम-ठेला।”


“Honour your self. Worship your self. Meditate on your self. God dwells within you as you." -Swami Muktananda (Ganeshpuri)


Ek Omkar Satnam. 


Punamchand 

12 March 2022

Friday, March 11, 2022

Punit (pure) life of Saint Punitacharyaji

 Punit (pure) life of Saint Punitacharyaji 


Shri Paras Nath Pandey a graduate in Sanskrit from BHU travelled in search of truth and landed up in Junagadh some 50 years ago. He followed many methods of Sadhana including fasting and living a life of all hardships guided by the his guides and companions. At last he realised the light of God by the blessings of Guru Datta at Jatashankar and became Saint Punitacharya. Guru Datta and Mother Goddess became his life Mantra for next five decades. A young man came akinchan could develop an Ashram for people and went through grihasthashram as per his destiny. But he never disconnected himself from Guru Datta and never deviated from his path of truth. He has guided many disciples and curious visitors with his excellent knowledge on hindu scriptures without any expectations. Many experienced deep meditation, shaktipat and spiritual journey under his guidance and blessings. Whatever question one may ask, he will answer with a support of verses in Sanskrit. 


I met him first when I was DDO Junagagh in 1990s. His guidance helped me in my search of the truth. As I didn’t visit Junagagh for 22 years (1993-2015), I got disconnected physically but my posting as PS Forest and Environment once again re-connected me with his Sainthood. From 2015 to 2022, we had nearly 8-10 physical meetings and some phone calls in which he guided me how to meditate and solved some queries on spirituality. In our last meeting on 25 January 2022, we were discussing kundalini yoga. As he was unable to hear clearly and therefore the communication was not getting through. He therefore advised me to read a book “Bhartiya Sanskriti and Sadhana” by Gopinath Kaviraj and list the questions and queries if any and thereafter discuss with him for further clarification. Incidentally, I asked him who will guide if he is not there. He told me that if I connect with the heart inside, the Guru (guide) resides there permanently. The answer comes from within, therefore, one needn’t worry about presence or not of any individual. How true! He left this visible world on 8th March 2022 and today on 11th March 2022 his physical body merged into the five basic elements of nature through the fire of pyre. 


The Ashram is building a Guru Datta temple and he is survived by his wife, daughter and son but he becomes immortal through his teachings. His disciples will remember him forever and the persons who met him won’t forget his love and purity in heart. 


जिस्म राख हुई, रूह गई आसमान;

चिति सर्वव्यापक है, कौन हुआ ओझल। 


Our Pranam to Saint Punitacharyaji. 🙏🙏🙏


Punamchand 

11 March 2022

Junagagh

Tuesday, March 8, 2022

Gray matters

 Gray matters


Former Finance Minister Vajubhai Vala was in joking mood as usual while giving  a farewell speech in a party organised in honour of retiring CS Shri Pravinbhai Laheri and welcoming new CS Shri Sudhir Mankad at CM Residence of Gujarat in 2005. His hairs were total grey and Pravinbhai had partly grey and partly black. He said that the grey hairs are the indicator of the loss of internal gray matter, the brain. With that parameter he had lost the total gray but Pravinbhai still held it, therefore he shouldn’t retire but continue using his balance stock. Laheri Sir did it, served the GoG for some more years, and still associated with Somnath Temple Trust and few NGOs as well as writes a column in a newspaper. Are you thinking of your grey? (Lol). 


Human brain is made of gray and white matter. The gray matter is made up of neuronal cell bodies (soma), one of TR brain components essential in maintaining strong and healthy lifestyle. It plays a huge part in important functions of voluntary movement and sensory perception, as well as memory, emotions, speech, decision making, and self-control. White matter consist of myelinated axons, which are long relays that extend out from the soma, form connection between brain cells. The white fatty myelin insulates axons, letting the signal within travel far faster, enabling the nerve cell function that is essential to normal motor and sensory function. Both the matters are spread throughout the central nervous system (brain and spinal cord). 


Neuronal cell bodies are abundant in the cerebrum, brain stem and cerebellum.  The outer layer of the brain, the cerebral cortex, consists of columns of gray matter neurons, with white matter located underneath. This area is essential to many facets of higher learning, including attention, memory, and thought. The cerebellum is essential for motor control, coordination, and precision.


Hardening of blood vessels preventing oxygen and other nutrients reaching the white matter results into the destruction of the white fatty myelin coating around axon, leading to motor or sensory disruption. In progressive multiple sclerosis, axonal damage is followed by neuron death, which is irreversible.


As we age, the brain starts shrinking, loses neurons about 0.2% to 0.3% every year called neurodegenerative disease. It affects memory and executive functions. Millions of old aged people therefore suffer from Alzheimer’s frontotemporal dementia. The motor symptoms of Parkinson’s disease are directly related to the loss of dopamine-producing neurons in the substantia bigra.


How to mitigate?


Improve the “aerobic capacity” to improve oxygen intake and supply of nutrients to all cells 24x7 is the key of good health of all organs including the brain. Life and death is a fight between oxygen and carbon dioxide. Therefore, one has to focus more on oxygen flow and remove obstacles coming in its way. 


1) There is a link between cardiorespiratory fitness and brain health. Peak oxygen uptake can improves volume of gray matter. Running, cycling, swimming, brisk walking, pranayam, etc, are cardiorespiratory workouts. Must be part of daily routines. 


2) Good heart pumping can keep the brain working in tip top shape for longer. Maintain walking schedule daily to maintain the LVEF. 


3) Yogasanas and light toning up exercises are good to maintain the elasticity of the blood vessels so that the food supply chain of glucose and oxygen to each cell is maintained. 


4) Mindfulness is necessary along with the movements. Meditation improves gray matter which is associated with learning and memory. Other benefits of meditation include focus, emotional control, reduced stress levels, and improved immune system.


5) Extra boost of Vitamin B helps the brain. It slows down age related atrophy. It gives better results with good Omega 3 level. Antioxidants prevent or delay cell damage by removing the free radicals (ROS- reactive oxygen species), the unstable molecules that the body produces as a reaction to environmental and other pressures. Live in pollution free environment, improve intake of food supplements and antioxidants to improve level of Vitamin B and Omega 3, and to remove the free radicals. 


Don’t see the grey in the mirror. It is mostly the outcome of chlorinated water and shampoos. But do check the condition of gray inside and mitigate the fall by modifying life style and improving aerobic capacity. 😊🌹


Punamchand 

8 March 2022

Tuesday, March 1, 2022

Maha Shivratri

 क्या चूके थे स्वामी दयानन्द? 

महाशिवरात्रि। 


बचपन में कहानी सुनी थी। आर्य समाज के स्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवनधारा महाशिवरात्रि की एक घटना ने बदल दी थी। उनका नाम मूलशंकर और पिता का अंबाशंकर था। उन्होंने महाशिवरात्रि का उपवास रखा था। रात्रि जागरण की थी। पर मध्य रात्रि में एक चुहिया को शिवलिंग पर दौड़ते और नैवेद्य खाते देख उनके मन मस्तिष्क में प्रश्न खड़े हो गये। जो देव चुहिया नहीं भगा सकता वह अपना कल्याण कैसे करेगा? मूर्ति पूजा से उनका विश्वास उठ गया और चल पड़े वैदिक यज्ञ धर्म की ओर। वेद वेदांत पढ़ें और स्थूल लिंग को छोड़ ज्ञान ज्योति को आगे बढ़ाया और धर्म में चल रहे पाखंड को खुला किया। आख़िर विरोधीयो ने उन्हीं के रसोइये का सहारा लेकर ज़हर से उनकी ज्ञान चेतना को शांत कर दिया। मूर्ति पूजा विरुद्ध उनका आंदोलन काफ़ी चला और पिछड़ी जातियों को धर्म धारा में जोड़ने का काम भी आगे चला। लेकिन क्या बरसों से चली आ रही मूर्ति पूजा से ब्रह्म खोज की पद्धति से वे चूक कर गये थे?  


हर देश के गौरव का निशान एक झंडा है। बना तो है कपड़े के एक टुकड़े से जिसमें प्रतीक रूप रंग सजाये है। लेकिन अगर झंडा पवन के झोंके से गिर जायें या आग लगने से जल जायें तो वह देश गिर नहीं जाती या जल नहीं जाती। प्रतीक को ही सब कुछ समझ लेने से गलती होगी। 


शिवलिंग एक प्रतीक है, परम शिव का। एक निराकार, कल्याणकारी ऊर्जा, ज्योतिर्लिंग, जिससे यह सारा संसार है, उसका प्रतीक। यह पूरा जगत वही तो है। शिव शक्ति। उस निरुपाधिक विराट को कहाँ खोजें? इसलिए सोपाधिक ईश्वर और उसके प्रतीक सामने आये। सर्जन, संवर्धन और विसर्जन के प्रतीक। जिसको देखकर, पूजा कर, हर जीव उस परमात्मा का अनुसंधान कर लेता है। बात तो आख़िर है खुद से जुड़ने की, भीतर से तार जोड़ने है खुद से ख़ुदा से। मन जो बाहर भटका रहा है, उसे ही भीतर की ओर ले जाना है। ‘निराधार मन चकृत धावे’ (सूरदास)। चेतन धागा और मन मोती। बस धागे में मोती पिरोये जाना है। यह पलटने की- पिरोने की विधि जो भी समझा दे वह गुरू; और जो भीतर जाने की सहूलियत कर दे वह देव या लिंग। 


आज महाशिवरात्रि है। रात्रि के अंधकार में आप बाहर नहीं देख सकते। इसलिए भीतर टिमटिमाती रोशनी पर सरलता से ध्यान जायेगा। सब कुछ काला होगा आसपास, पर भीतर का दीया जलता नज़र आयेगा। मन सरोवर द्रवित होगा तो शिव कैलाश नज़दीक ही नज़र आयेगा। जैसे सूरज की एक किरण को पकड़ ले तो उसके स्रोत सूरज तक नज़र पहुँच जाती है, ठीक वैसे ही भीतर की किरण को पकड़कर वह विराट के दीदार हो ही जाते है। बस प्यास चाहिए, साफ़ शीशा (अंत:करण), और नज़र-ध्यान। 


अपने भीतर बैठे शिव को ही नमन करना है।जो भीतर है वही बाहर, सब ओर, एक। दूजा कोई नहीं। 


🕉नम: शिवाय। 


शुभ महाशिवरात्रि। 


पूनमचंद 

१ मार्च २०२२

Powered by Blogger.