Tuesday, February 28, 2023

मन का क्या?

 मन का क्या? 


मन पर पता नहीं आजतक कितने रंग चढ़ गये? लिंग, जाति, धर्म, वर्ग, पद, प्रतिष्ठा, मान, अपमान, राग, द्वेष, इत्यादि। उस पर भी षडरिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य/ईर्ष्या) के आक्रमण चालु। कितना सावधान रहोगे? पल पल जैसे तलवार की धार पर चलना। 


मन को ख़त्म नहीं करना है लेकिन उस परचढ़े उपर्युक्त रंगों से आज़ाद करना है। पहले सात्विक करना है, फिर अमना स्थिति में पहुँचना है। तब जाकर हम आत्मा के द्वार में प्रवेश कर सकते है। प्रविष्ट तो है ही, लेकिन पता नहीं चल रहा। फिर तो अपनी पहचान जैसे जैसे गहरी होती जाएगी स्वस्थता उतनी ही बढ़ती जायेगी। पहले मन या इन्द्रियों पर जीत असंभव लग रही थी, अब जैसे सहज हो गई। 


लेकिन करेंगे कैसे? हर पल परीक्षा और हर पर नाकामयाब। कोई न कोई संस्कार, स्वार्थ, मान्यता बीच में आ ही जाती है।अपने मन का ठिकाना नहीं हो रहा, वहाँ दूसरों के मनों के विचार और क्रिया से जूझना पड़ता है। भाग भी नहीं सकते और छूट भी नहीं सकते। अपने शिव स्वरूप का पता नहीं और सब में शिव शिव दर्शन करना है। कुछ ऐसी ही डामाडोल स्थिति है न हमारे मन की? भेद टूटता ही नहीं। 


श्रीकृष्ण समझ गये थे। अर्जुन को साफ़ सटीक उपदेश शुरू ही में दे दिया था लेकिन वह पूछता ही रहा। किसी एक बोध या पड़ाव पर रूक नहीं पा रहा था। मन के ज्वार भाटे में कभी वह श्रीकृष्ण शिक्षा में तो कभी सांसारिक मान्यताओं के बीच हिचकोले खा रहा था। श्रीकृष्ण ने आख़िर कह दिया की भाई साहब, आपके अकेले से कुछ नहीं बनेगा। 


खुद ही करने लगेंगे तो खुद के अभिमान से पीछा कैसे छुटेगा? भोग के अभिमान से भागे तो त्याग के अभिमान ने पकड़ लिया । अज्ञानी से ज्ञानी होने चले तो ज्ञान के अभिमान में फँस गये। आप तो कहीं गये ही नहीं? एक छोटी सी कुटिया (शरीर) मिली है उसके दायरे में ही घुम रहे है। उस असीम की कृपा के बिना काम कैसे बनेगा?  सब समुद्रों के जल की स्याही बना लें फिर भी उसका बयान नहीं लिख सकते, उस असीम की कृपा के बिना उसे कैसे पा सकते है? 


आख़िर श्रीकृष्ण ने आख़री कुंजी दे ही डाली। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66॥


कहा, भाई साहब, आप अब सब धर्म (रास्ते-क्रिया-प्रयास) छोड़ मेरी (परमेश्वर) की शरण में आ जाओ। मामेकं शरणं व्रज, गीता का सार है। 


जब अहं (छोटी मैं) समर्पित हो गई फिर मन, बुद्धि, इन्द्रियों को तो अपने आप शरणागत होना ही है। शरण कैसे होगी? छोटी ‘मैं’ को भक्ति के रंग में रंगना है। धीरे-धीरे मन के सब ज्वार भाटे अपने आप शांत होते चले जाएँगे। फिर मुझमें राम, तुझमें राम, सबमें राम समाया समझाना नहीं पड़ेगा। अल्लाह हू.. अनलहक का स्वाद आयेगा। पिता पुत्र और परमेश्वर की एकता नज़र आएगी। न जगत बदलेगा। न जगत के रंग ढंग। बस मैं की नज़र बदल जायेगी। सोने के गहनों में जैसे सोने को खोजने के लिए कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता वैसे ही यह दृश्यमान जगत में चैतन्य को खोजना नहीं पड़ेगा। वही है। वही दिखेगा। मैं गया, तुं रहा। 


हाँ, फिर भी साधक को मन सात्विक बनाने के प्रयास छोड़ नहीं देने है। उसकी कृपा बरस ही रही है लेकिन अपने बर्तन के छिद्रों को भरना तो पड़ेगा। शीशा साफ़ स्थिर और बोधि होने तैयार करना पड़ेगा। शीशे को तैयारी में रखिए और खुद को परम के हवाले कीजिए। तब जाकर कह पाएँगे, नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18.73।। स्मृति बनी रहे, संशय समाप्त हो और उसकी आज्ञानुसार चलते रहे। 


शिवकृपा से स्वस्थ हो। 


🕉️ नमः शिवाय। 


पूनमचंद 

२८ फ़रवरी २०२३

Wednesday, February 22, 2023

Panch Kalyanaka

 Panch Kalyanaka 


Panch Kalyanaka is a term used commonly in Jainism, the five auspicious events. 1) garbha-conception 2) janma-birth 3) diksha-renunciation 4) kevalya-absolute knowledge (जीवन मुक्ति) 5) nirvana-departure from body-Siddha (विदेह मुक्ति). 


Shiva in Sanskrit also means auspicious-Kalyanaka. We hv passed through two Kalyanakas, the conception and the birth happened naturally. Now we are in the process of third and fourth Kalyanaka. 


The third stage is to bring an individual to one pointedness towards his/her goal. Duality or multiplicity of mind can’t achieve the goal and therefore one has to be fully focused (renunciate worldly objects) and put one’s 100% attention towards the fourth Kalyanaka, the absolute (true) knowledge. 


The fifth is destined therefore not a matter of worry or hurry.😊


🕉️ नमः शिवाय।


Punamchand 

22 February 2023

Tuesday, February 21, 2023

तीन कदम।

 तीन कदम। 


जीव क्या है? शिव कौन? क्या करना है? किसलिए करना है? यही तो सब प्रश्न साधक के मन विचार पर हावी बने रहते है। 


दो क्षेत्र को ठीक से समझ लेना है। आत्म क्षेत्र और अनात्म क्षेत्र। आत्म क्षेत्र यानि स्व (self), चैतन्य (consciousness), अस्तित्व (existence)। अनात्म क्षेत्र यानि परिवर्तनशील, नाशवंत, शरीर, प्राण, मन, जगत इत्यादि। 


पहला कदम आत्मा और अनात्म का विवेक करना है। दोनों को विभाजित कर समझ लेना है। 


फिर दूसरे कदम पर दोनों के स्वरूप को समझना है। आत्मा सत्य (real) है और अनात्म मिथ्या (unreal)। एक अमृत दूसरा मृत। 


तीसरा कदम है ‘मैं आत्मा हूँ’ (the real is me) और इसी दृष्टि से सबकुछ देखना है और स्वस्थ (शांत) होना है। 


अगर मिथ्या (अनात्म) को सत्य मान लिया तब दुःख भी सत्य हो जाएगा। जीव औपाधिक है, कर्ता भोक्ता भाव है इसलिए उसे सब प्रश्न है। आत्मा न तो कर्ता है न भोक्ता। इसलिए जो आत्म स्वरूप में स्वस्थ हो गया, वह शांत हो गया। उसे फिर बाहरी उथल-पुथल या हलचल अशांत नहीं करेगी। क्योंकि जिसने आत्म स्वरूप में रहना सीख लिया उसने अपने सच्चे स्वरूप को जान लिया, स्वस्थ हुआ और सुखरुप हो गया। 


जब तक हम जीव बने रहेंगे तब तक शरीर, मन, बुद्धि, इत्यादि उपाधियों में बंधे रहेंगे। साधना इस उपाधियों को छोड़ने की है। त्याग इसी उपाधियों का करना है। 


अचानक तो नहीं हो पायेगा इसलिए शिक्षा दी जाती है कि पहले निषिद्ध कर्म (व्यसन, चोरी, हिंसा, इत्यादि) का त्याग करो। फिर बताया जाता है कि सकाम कर्म का त्याग करो। कर्म करो लेकिन फल की अपेक्षा न रखो। full time volunteer. फिर आगे आएगा कर्म सन्यास। सब कर्म त्याग कर श्रवण मनन निदिध्यासन करो। आत्म स्वरूप की पहचान कर लो। एक बार आत्म स्वरूप की पहचान हो गई फिर कर्म करें या न करें उसका कोई असर नहीं रहता। क्योंकि जो स्व है वह उससे अलग हो गया (disassociate). कर्ता भाव चला गया। आत्मा अकर्ता है। कर्ताभाव, कर्म करने का या छोड़ने का, दोनों ही स्थिति अहंकार है। 


इसलिए ठीक से समझ लीजिए। सावधान हो जाइए। आत्म की पहचान कर लीजिए। एक बार आत्मा को पहचान लिया, स्वस्थ हो गया फिर उस मुक्त की मुक्ति का क्या कहना। जीवन मुक्त है, विदेह मुक्त रहेगा।  


एक ही है। परम सत्य। बाक़ी सब मिथ्या। माया। माया को छोड़िए। महादेव को अपनायें।😊


फिर मत कहना, दुविधा में दोनों गये, माया मिलीं न राम। 😜


🕉️ नमः शिवाय। 


पूनमचंद 

२१ फ़रवरी २०२३

Friday, February 17, 2023

Know Thyself

 Know thyself 


The knowledge is straight and simple that we are that Shiva/Brahman for whom we are in search. 


But to reach to that firm conclusion there is lot of chakki picing and picing…साधन चतुष्टय, साधना, नाम जप, 

निष्काम कर्म, उपासना, ध्यान, purification process, etc. Just to merge the mind into Lord Shiva. The mind is absorbed that’s all. No body identity, no mind identity. The rope becomes rope, no more snake. 


The truth is not associated with time that for few minutes when we are in meditation and become Shiva and when move out of meditation turns into Jiva. How could? The truth remains truth as it is in all the states. 😊


🕉️ नमः शिवाय। 👏


Punamchand 

16 February 2023

विवर्त।

 विवर्त। 


अध्यात्म शिक्षा में विवर्त शब्द का उपयोग अक्सर किया जाता है। वैसे तो यह शब्द का प्रयोग धोखा या भ्रांति के रूप में किया जाता है परंतु वेदांत उसे एक रूप या स्थिति छोड़कर दूसरे रूप या स्थिति में आना या होना समझा है। वेदान्त का यह मत या सिद्धान्त है कि परिवर्तनशील सारी सृष्टि है ज़रूर लेकिन वास्तव में मिथ्या है, उसका वास्तविक से हटकर जो रूप हमें दिखाई देता है वह भ्रम या माया के कारण ही है।


सृष्टि है इसलिए असत् तो नहीं कह सकते लेकिन प्रश्न यह है कि जो है वह वास्तविक रूप हमें दिखाई क्यूँ नहीं देता? 


अगर सिर्फ़ रस्सी ही है तो साँप क्यूँ दिख रहा है? साँप का भय क्यूँ बना रहा है? अगर अमृत ही है तो यह मौत और मौत का ख़ौफ़ क्यूँ और किसे? एक है फिर अनेक क्यूँ नज़र आ रहा है? अभेद हैं फिर यह भेद जाल क्यूँ? यह मान अपमान, राग द्वेष क्यूँ? क्या पाने की दौड़ है? एक है अर्थात् सबकुछ मैं तब तो सब मेरा हुआ फिर यह कमी का अहसास या पाने की चाह क्यूँ? 


इसी को माया कहा है जिसके पाश में सब मन बंधे हैं और कर्म के सिद्धांत के अनुसार इस संसार में गतिशील रहते है। चक्की की इस पिसाई में जिसे नहीं घुमना है उसे प्रयास कर चक्की के केन्द्र की ओर मुड़ना है और कील को पकड़ लेना है। चलती चक्की के पाटों के बीच कुछ दाने जो चक्की के कीले के साथ लगे रह जाते हैं, वे साबुत बच जाते हैं।


चलती चकिया देखि के, हंसा कमाल ठठाय। कीले सहारे जो रहा, ताहि काल न खाय। 


मन का समर्पण विसर्जन जब तक उस आत्मरूप कील में नहीं होता तब तक उसका काल के मार से निकलना संभव ही नहीं। 


दृष्टि कीं ख़ामी है। इसीलिए दृष्टि को बदलने की साधना है। गुरू दृष्टि पाने की साधना है। चमत्कार करने या सिद्ध बनने की साधना नहीं है। सिद्ध तो हो ही। समाधि तो लगी ही है। बस पता नहीं। 


कश्मीर शैव दर्शन शिव को प्रकाश और शक्ति को विवर्त रूप में प्रायोजित कर यह जगत को चित शक्ति के विलास के रूप में दर्शाता है। दिख रहा सब शिव ही है लेकिन दृष्टि की कमी से हमें कुछ उलट नज़र आता है। इसलिए पहले चिति शक्ति के रूप में उसकी दृष्टि एकता करनी है और बाद में उस शिव परम में स्थिति करनी है। सकल से अकल की यात्रा करनी है। 


प्रश्न होता है कि हमारे सम्मुख हाजरा हुज़ूर इस शिव को छोड़कर क्यूँ हम उपर गगन में किसी मंडल में, किसी भुवन में बैठे भगवान की कल्पना कर आराधना करते रहते हैं? जो सामने है उसे नज़रअंदाज़ क्यूँ करते है? किस रूप में वह नहीं आया? माता, पिता, भाई, बंधु, भगिनी, पत्नी, पति, पुत्र, पुत्री, पौत्र, पौत्री, दौहित्र, दौहित्री, बहु, दामाद, संबंधी, पड़ोसी, साथी, संगी, शिक्षक, मालिक, सेवक, किसान, मज़दूर, व्यापारी, सहायक, सहकर्मी, मित्र, शत्रु, पशु, पंखी, जीवजंतु, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, ग्रह, उपग्रह, तारें, नक्षत्र, निहारिका, ब्रह्मांड, इत्यादि और खुद में…शिव ही शिव, ख़ुदा ही ख़ुदा। 


प्रार्थना करें उस शिव को की हमें शिव दृष्टि प्रदान करें। शिव को जानना है फिर उसके प्राकट्य का विरोध क्यूँ और किसलिए? 


🕉️ नमः शिवाय। 


पूनमचंद 

१७ फ़रवरी २०२३

Powered by Blogger.