बौद्ध, वेदान्त और जैन दर्शन : क्या तत्त्व एक है और व्याख्या भिन्न?
भारतीय दर्शन की तीन महान परम्पराएँ—बौद्ध, वेदान्त और जैन—प्रथम दृष्टि में एक-दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हैं। एक आत्मा का निषेध करता है, दूसरा आत्मा को ही परम सत्य मानता है और तीसरा अनन्त जीवों की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार करता है। शब्दावली, तर्क और दार्शनिक प्रतिपादन भी अलग-अलग हैं। फिर भी यदि इनके मूल तत्त्व का अध्ययन किया जाए, तो अनेक स्थानों पर आश्चर्यजनक साम्य दिखाई देता है।
बुद्ध ने निब्बान को तृष्णा, राग, द्वेष और मोह के पूर्ण क्षय की अवस्था कहा। जीवित रहते हुए मन के बंधनों से मुक्त होना और शरीर के अंत के बाद पुनर्जन्म का समाप्त हो जाना—दोनों निर्वाण के आयाम हैं। बुद्ध ने स्थायी आत्मा को स्वीकार नहीं किया, पर कर्म और पुनर्जन्म की निरंतरता को स्वीकार किया। उसका आधार उन्होंने प्रतित्यसमुत्पाद में देखा—कारण और कार्य की अखण्ड श्रृंखला।
यहीं दार्शनिक प्रश्न उठता है—यदि आत्मा नहीं है, तो पुनर्जन्म किसका होता है? यदि कर्म मैंने किया है, तो उसका फल कौन भोगता है? बौद्ध उत्तर है—“न वही, न दूसरा।” अर्थात् शरीर बदलता है, पर कारण-कार्य की धारा चलती रहती है।
वेदान्त भी स्वीकार करता है कि बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में शरीर और मन निरंतर बदलते रहते हैं। मृत्यु के बाद भी यही क्रम चलता है। किन्तु वेदान्त इस धारा को सूक्ष्म शरीर—मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, वासनाओं और कर्म-संस्कारों—के रूप में व्यक्त करता है। आत्मा स्वयं न जन्म लेती है, न मरती है; वह साक्षी है। जन्म और पुनर्जन्म सूक्ष्म शरीर के हैं, आत्मा के नहीं।
यदि इस बिंदु पर दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो बौद्ध प्रतित्यसमुत्पाद और वेदान्त का सूक्ष्म शरीर दोनों ही कर्म-संस्कारों की निरंतरता को स्वीकार करते हैं। अंतर यह है कि एक उसे कारण-कार्य की धारा कहता है, दूसरा संस्कारयुक्त सूक्ष्म शरीर। तत्त्वतः दोनों यह स्वीकार करते हैं कि शरीर बदलता है, किन्तु कर्मों की निरंतरता बनी रहती है।
जैन दर्शन भी इसी समस्या का अपना समाधान प्रस्तुत करता है। वहाँ आत्मा स्वतंत्र चेतन सत्ता है और कर्म सूक्ष्म पुद्गल हैं। राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ के कारण कर्म आत्मा से बंधते हैं। मोक्ष का मार्ग संवर और निर्जरा है—नए कर्मों का प्रवेश रोकना और पुराने कर्मों का क्षय करना।
यदि इन सिद्धांतों को दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो वेदान्त की वासना-क्षय, बौद्ध धर्म की तृष्णा-निरोध और जैन दर्शन की निर्जरा तीनों का लक्ष्य एक ही दिखाई देता है—मनुष्य को उन संस्कारों और बंधनों से मुक्त करना जो पुनर्जन्म और दुःख का कारण हैं।
वेदान्त जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति की बात करता है। बौद्ध दर्शन सोपाधिशेष निर्वाण और अनुपाधिशेष निर्वाण की। जैन दर्शन अरिहन्त और सिद्ध की। तीनों में पहले जीवित अवस्था में बंधनों का क्षय है और बाद में पुनर्जन्म की समाप्ति। नाम अलग हैं, पर साधना का क्रम अत्यंत निकट प्रतीत होता है।
इसी प्रकार बौद्ध तृष्णा, वेदान्त वासना और जैन कर्मबंध की भाषा बोलते हैं। शब्द बदलते हैं, पर संकेत मनुष्य के उसी आंतरिक बंधन की ओर है जो अज्ञान, आसक्ति और अहंकार से उत्पन्न होता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो तीनों परम्पराएँ मानो एक ही पर्वत को तीन दिशाओं से देख रही हैं। एक कारण-कार्य की भाषा में बोलती है, दूसरी आत्मा और सूक्ष्म शरीर की भाषा में, तीसरी कर्म-पुद्गल और जीव की भाषा में। वर्णन अलग है, पर साधना का केंद्र एक ही है—मनुष्य के भीतर संचित बंधनों का अंत।
यह कहना कि तीनों दर्शन पूर्णतः एक ही हैं, इतिहास और शास्त्र की दृष्टि से उचित नहीं होगा; क्योंकि प्रत्येक परम्परा अपने तात्त्विक प्रतिपादन को स्वतंत्र मानती है। परंतु यह कहना भी कठिन है कि उनमें कोई गहरा साम्य नहीं है। कर्म, पुनर्जन्म, बंधन, साधना और मुक्ति—इन पाँचों विषयों पर तीनों की अंतर्धारा अनेक स्थानों पर एक-दूसरे के अत्यंत समीप आती दिखाई देती है।
संभव है कि तत्त्व एक हो और उसकी दार्शनिक व्याख्याएँ भिन्न-भिन्न हों। भारतीय दर्शन की समृद्धि भी शायद इसी में है कि उसने एक ही आध्यात्मिक अनुभव को अनेक भाषाओं और अनेक तर्क-पद्धतियों में अभिव्यक्त किया।
१४ जुलाई २०२६
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