Friday, September 4, 2026

आत्म साक्षात्कार ।

आत्म साक्षात्कार 


सब जीवों की आत्मा समान है। जो अलग-अलग मानते हैं वे भी समान मानते हैं, और जो एक मानते हे वे भी। 


इस बात पर भी सहमति है कि आत्मा की शक्ति अपार है। वह शुद्ध रूप में सर्व शक्ति, सर्व दर्शन, सर्व ज्ञान, सर्व सुख की धनी है।


जीव कमजोर बना है इसलिए की उसे कर्मों की गठरी ने बाँध रखा है। 


हर कर्म की अलग-अलग प्रकृति होती है। जैसे ही जीव कर्म के अनुरूप व्यक्ति या घटना के सामने आता है, वह कर्म प्रकृति के आधार पर उसका प्रतिकार करता है और नये कर्म बाँधता रहता है।  


जीव को कर्म से छूटकारा पाने के लिए उसे नये कर्मों के बंधन से मुक्त रहना है और पुरानी गठरी के कर्मों का क्षय करना है। गीता का निष्काम कर्मका संदेश किसे नहीं पता? 


यह पंथ में आगे बढ़ने सबसे पहले सम्यक दर्शन की आवश्यकता है। जीव को यह दृढ़ता से मानना पड़ेगा की वह चैतन्य आत्मा है। न शरीर है, न इन्द्रियां, न मन। 


जब वह चैतन्य की डोरी से जीव अपने दर्शन को बदलेगा तो उसे चारों ओर वही चैतन्य नजर आने लगेगा। 


शनैः शनैः वह राग द्वेष से मुक्त होता जाएगा और मिथ्यात्व की इस जगत ग्रंथि को भेद लेगा। 


ग्रंथि भेद के बाद ही उसका उपर के गुणस्थानों में, KSD की भाषा में शुद्ध विद्या में प्रवेश होगा। 


जीव को अब अपूर्व करण के सहारे कर्मों की जाल को तोड़ने महा पुरुषार्थ करना है। महा संकल्प पर चलना है और 

बिना डरे उपर की भूमिका में छलाँग लगानी है। यहां से अब वापस मुड़ना नहीं है। 


जैसे जैसे आत्मा के उपर के अविद्या के आवरण हटते जाएँगे, वैसे वैसे उसका ज्ञान-दर्शन गुण क्षेत्र खुलता जाएगा। 


जो सीमित लग रही थी वह शक्तियाँ खुलने लगेगी, बढ़ने लगेगी। 


लेकिन साधक नहीं रूकेगा, जब तक की उसका सत्य से, अपने स्वरूप का हुबहू- रूबरू साक्षात्कार नहीं हो जाता, वह सिद्ध नहीं बन जाता। 


यह करने उसे अपनी प्रातिभ शक्ति, स्वाध्याय, तप, अनुशासन, संकल्प इत्यादि साधनों को बढ़ाना है। 


किसीकी दया अथवा कृपा पर नहीं अपितु जो राह पर अग्रसर है उसके मार्गदर्शन से चलना है। 


चलना तो खुद को है। किसी फ़ोटो के सामने बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। 


भीतर देदीप्यमान आत्मा तो बैठा ही है, जो सबके पास है, और वह शुद्ध और सर्व शक्तिमान है। 


बस जामवंत याद करवाएगा, हनुमान की छलाँग खुद को लगानी है। 


जागो, उठो, महा संकल्प के बल के सहारे मंजिल पार करो।

जन्माष्टमी - Janmashtami

जन्माष्टमी । 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अज्ञान के अंधकार में जागता चैतन्य

श्रीकृष्ण वासुदेव हैं—वह चैतन्य जो प्रत्येक हृदय में विद्यमान है। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का हेलियोडोरस स्तंभ इस बात का प्राचीन साक्ष्य है कि वासुदेव की भक्ति उस समय तक प्रतिष्ठित हो चुकी थी। उसी परंपरा में गूंजता है मंत्र—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय—जो हमें बाहरी संसार से भीतर के प्रकाश की ओर ले जाता है।

जन्माष्टमी की कथा हमें स्मरण कराती है कि श्रीकृष्ण का जन्म केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारे भीतर चैतन्य के जागरण का रूपक है। 

देवकी शरीर हैं, कंस अहंकार और कारागार बँधा हुआ मन। वसुदेव विवेक के मंथन से जो मक्खन पैदा होता है वह है श्रीकृष्ण। अज्ञान के अंधकार की काल रात्रि को दूर हटाता चैतन्य दीप —यही कृष्ण का जन्म है। 

आठवीं संतान, अष्टमी और आठवाँ अवतार संख्या नहीं रूपक है।अष्टकोण आठ दिशाओं, अष्टांग साधना, अष्टांग मार्ग; सनातन, जैन, बौद्ध और योग परंपराओं में आत्मचेतना की पूर्णता और आत्म जागरण के संकेत है।

जब अहंकार शांत होता है, मन निर्मल होता है और प्रेम का दीप अंधकार में प्रज्वलित होता है, तभी वासुदेव हमारे हृदय में प्रकट होते हैं।

सांख्य का पुरुष, जैन दर्शन की शुद्ध आत्मा और बुद्ध का बोध—ये सब उसी एक सत्य की भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। 

भक्ति का अर्थ किसी दूर बैठे देवता को खोजना नहीं, बल्कि अपने भीतर जागते उस प्रेम, करुणा और आनंद में डूब जाना है।

जन्माष्टमी का संदेश यही है: अपने हृदय में वासुदेव को जन्म दो।

जहाँ प्रेम की राधा है, वहीं कृष्ण हैं।

आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

वासुदेव का प्रकाश आपके जीवन में प्रेम, आनंद, करुणा और आत्मबोध का उत्सव बनकर सदैव प्रकाशित रहे।

जय श्रीकृष्ण।

४ सितंबर २०२६


Janmashtami

Om Namo Bhagavate Vāsudevāya

Consciousness Awakens in the Darkness of Ignorance

Sri Krishna is Vāsudeva—the divine consciousness that resides in every heart. The Heliodorus Pillar of the 2nd century BCE stands as one of the earliest historical testimonies that the worship of Vāsudeva had already become well established. From that same tradition echoes the sacred mantra:

Om Namo Bhagavate Vāsudevāya—a prayer that leads us from the outer world to the light within.

Janmashtami reminds us that Krishna’s birth is not merely a historical event; it is a profound allegory for the awakening of consciousness within us. Devaki symbolizes the body, Kansa the ego, and the prison the mind bound by ignorance and attachment. Vāsudeva represents awakened wisdom, and Krishna is the pure butter born from the churning of discernment. The lamp of consciousness that dispels the dark midnight of ignorance—that is the true birth of Krishna.

The eighth child, Ashtami, and the eighth incarnation are not numbers alone; they are symbols. The octagon, the eight directions, the Eightfold Path, and the eight limbs of Yoga all signify the fullness of self-awareness and spiritual awakening across the Sanātana, Jain, Buddhist, and Yogic traditions.

When the ego becomes silent, the mind grows pure, and the flame of love is kindled in the darkness, Vāsudeva manifests in the human heart. The Purusha of Sāṅkhya, the pure Self of Jain philosophy, and the Awakened Bodhi of the Buddha are different expressions of the same eternal truth.

Bhakti is not the search for a distant deity; it is the experience of the love, compassion, and bliss that awaken within.

The message of Janmashtami is simple: Let Vāsudeva be born in your own heart.

Where there is Radha—the embodiment of love—there Krishna is present.

Heartfelt greetings to everyone on the sacred festival of Sri Krishna Janmashtami.

May the light of Vāsudeva illuminate your life with love, joy, compassion, and self-realization.

Jai Shri Krishna

4 September 2026


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