मैं जब छोटा था, पिताजी के साथ पानकोर नाका और रतन पोल जाता था। पूरी रतन पोल कपड़ों की दुकानों से भरी रहती थी। मेरे बालमन में एक सहज प्रश्न उठता—इन इतनी सारी दुकानों को ग्राहक कहाँ से मिलते होंगे? इनकी बिक्री कैसे होती होगी? मुख्य रास्ते पर तो कोई ग्राहक आ भी जाए, लेकिन भीतर की संकरी गलियों में कौन जाएगा? फिर भी, आश्चर्य यह था कि हर दुकान चल रही थी।
बड़ा हुआ तो धर्म और दर्शन में रुचि पैदा हुई। धीरे-धीरे एक दूसरी रतन पोल दिखाई देने लगी—विचारों की रतन पोल।
आप जिस दर्शन को पढ़ें, जिस पंथ के साथ बैठें, जिस गुरु का सत्संग करें—यदि भीतर से उसका प्रतिरोध न करें, तो कुछ समय बाद वही दर्शन आपको तर्कपूर्ण, भावपूर्ण और स्वाभाविक रूप से सही लगने लगता है। भारत में जैन दर्शन है, बौद्ध दर्शन है, वेदांत है, सांख्य है, योग है, न्याय है, मीमांसा है, भक्ति की अनेक धाराएँ हैं और इनके भीतर भी अनगिनत पंथ, सम्प्रदाय और शाखाएँ हैं। हर शाखा का अपना तर्क है, अपनी भाषा है और सबसे बढ़कर—अपने विश्वास से बना हुआ एक मानस है।
शायद इसलिए यहाँ हर दुकान को उसका ग्राहक मिल जाता है।
किसी को धन चाहिए, किसी को नौकरी; किसी को संतान चाहिए, किसी को पद; किसी को प्रतिष्ठा चाहिए, किसी को सुरक्षा; किसी को स्वर्ग चाहिए, किसी को मुक्ति; और किसी को आत्मा की पहचान चाहिए। इच्छाएँ अनेक हैं, इसलिए उन्हें पूरा करने वाली दुकानें भी अनेक हैं।
यहीं से सत्य का प्रश्न कठिन हो जाता है।
सत्य अपने आप में निरपेक्ष हो सकता है, लेकिन मनुष्य का सत्य प्रायः सापेक्ष होता है। मन जिस भूमिका में बँध जाता है, उसी के भीतर से वह संसार को देखने लगता है। फिर वही दृष्टि उसे सत्य प्रतीत होती है। और जब उस सत्य के साथ उसका तादात्म्य इतना गहरा हो जाता है कि वह अपने विचार से अलग होकर सत्य को देख ही नहीं सकता, तब विश्वास कट्टरता में बदल जाता है।
कट्टरता का जन्म हमेशा अज्ञान से नहीं होता; कभी-कभी वह आधे सत्य से भी होता है—उस सत्य से जिसे मनुष्य ने सम्पूर्ण सत्य समझ लिया है।
और यहीं से खिलाड़ी का प्रवेश होता है।
जो मनुष्य मानव-मन को समझता है, वह उसकी इच्छाओं, भय, आशाओं और असुरक्षाओं को पहचान लेता है। वह वही दिखाता है जो लोगों के मानस में पहले से मौजूद है; लेकिन करता वही है जिसमें उसका अपना हित हो। वह ग्राहक को नया विश्वास नहीं बेचता—वह उसके भीतर पहले से मौजूद विश्वास को पैक करके बेचता है।
इस अर्थ में धर्म हो या दर्शन, गुरु हो या विचारधारा—कभी-कभी वे मनुष्य की मानसिक आवश्यकताओं के लिए मनोचिकित्सा की दुकानों जैसे भी बन जाते हैं। कोई भय का उपचार बेचता है, कोई आशा का; कोई मुक्ति का, कोई सफलता का; कोई स्वर्ग का, कोई आत्मज्ञान का।
और मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार दुकान चुन लेता है।
लेकिन सत्य शायद किसी दुकान में नहीं मिलता।
वह दुकान के भीतर भी नहीं है और दुकान के बाहर भी नहीं। वह शायद उस क्षण प्रकट होता है जब मनुष्य दुकानों को पहचानकर उनसे मुक्त हो जाता है—जब वह न ग्राहक रहता है, न दुकानदार।
शायद सत्य वहीं से शुरू होता है, जहाँ विश्वास समाप्त नहीं, बल्कि अपनी सीमा को पहचान लेता है।
4 October 2026
Interesting psychological insights. Truth conceived here in a general sense which is different from its conceptions in modern philosophy. Style of writing is engaging
ReplyDeleteAbove comment made by G Subba Rao
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