Friday, January 5, 2024

 ध्यान। (meditation) 


किसी ने प्रश्न किया था कि ध्यान करते करते नींद आ जाती है। ध्यान करते करते नींद आ जाना स्वाभाविक क्रिया है क्योंकि साँस की गति धीमे होते ही ओक्सिजन की मात्रा कम होने लगती है और मन अपनी जाग्रति खोने लगता है और नींद आ जाती है। 

हमारी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति मन की ही तो अवस्थाएँ है। मन प्रधान है इसलिए हम मनुष्य है। मन जब चैतन्य के पूर्ण तेज से भर जाता है तब जाग्रत हो जाता है और मन जब थक जाता है तब साँस की गति धीमी कर सोने लगता है और सुषुप्ति में चला जाता है। सपने आमतौर पर पहली नींद ख़त्म होने के बाद जब हम सोने का प्रयास करते है तब प्राण हिता नाड़ी में प्रवेश करते ही हम सपने देखने लगते है।  यह अवस्था अर्ध सुषुप्ति जैसी है। इसलिए पूर्ण जाग्रति की अवस्था का बोध हमारी याददाश्त में लंबे वक्त तक रहता है; स्वप्न प्रयास से याद रखने पड़ते हैं और नींद तो हमने आधा जीवन सोने में बिताया लेकिन कुछ भी याद नहीं रही। पूरा खेल ओक्सिजन की मात्रा और मन की अवस्था भेद का है। 

आत्म साक्षात्कार में हमें तो मूलाधार में साडे तीन कुंडल मार बैठी शक्ति को जगाना है, उसे सुषुम्ना पथ में दाखिल कर उपर ले जाना है और ब्रह्मरंध्र में बैठे शिव के साथ मिलन कर आत्म साक्षात्कार करना है। यह करने के लिए बस अहं-मन को निर्मल कर अपने सत् स्वरूप का साक्षात्कार करना है। 

कश्मीर शैव दर्शन के आचार्य स्वामी लक्ष्मण जू सुषुम्ना को सूक्ष्म साँस से समझाते हैं जिसमें सासों की गति न के बराबर हो जाती है, जिसमें नथुने के आधा एक इंच जितना प्राण संचार बना रहता है। धीमी साँस से धीरे-धीरे ओक्सिजन की मात्रा कम होती जाएगी, मन शिथिल होने लगेगा, जगत विक्षेप घटने लगेगा और आत्म प्रकाश का अनुभव होने लगेगा। अब जब आत्म अनुभव की स्थिति आई तब सोने लगेंगे फिर ध्यान का क्या अर्थ? ध्यान करना है मतलब कम ओक्सिजन में जाग्रत रहना है। क्रिया शैथिल्य से वैसे भी ओक्सिजन की ज़रूरत कम हो जाएगी। साधु बाबा लोग ध्यान करने शायद इसलिए कम ओक्सिजन की जगह वाली पहाड़ियों में चले जाते होंगे। ध्यान करते करते एक बार जब खुद की पहचान हो गई, अपना पता लग गया फिर मन चाहे जाग्रत में हो या स्वप्न में, या सुषुप्ति में, तुरीया तो हमेशा बना रहेगा। बस उस तुरीया को पहचान कर तुरीयातीत सर्वाकार साक्षात्कार करना है। 

इसके लिए लंबे वक्त तक हिले-डुले बिना एक आसन में बैठने की क्षमता पानी है। इसके लिए आसन करने होंगे। साँसों की धीमी गति से कम ओक्सिजन से जाग्रत रहना है इसलिए प्राणायाम करके फेफड़ों को ओक्सिजन से पूरी मात्रा में भर देना होगा। इन्द्रियां आहार के लिए बहिर्मुख है उसे अंतर्मुख कर प्रत्याहार कराना है। बिना उद्देश्य क्रिया का क्या अर्थ? इसलिए धारणा बनानी है। धारणा पर ध्यान करना है। ध्यान करते करते (जाग्रत रहकर) सम+अधि, समत्व धारण किये अपने सत् स्वरूप में अधिष्ठित हो जाना है। तभी तो समाधि घटेगी। 

ध्यान बस एक मन को सँभालकर राह पर लाने का प्रयास है, जिससे की हमें अपने सच्ची पहचान हो जाए। एक बार अमर सत्य को पहचान लिया फिर मृत्यु का भय कैसा? न मृत्यु रहेगी, न जन्म। सिर्फ़ अमृतसर रहेगा। 

चलें अमृतसर?

पूनमचंद 

५ जनवरी २०२४

Wednesday, December 20, 2023

आँख।

 आँख। 


मनुष्य जगत अपने इष्ट की पूजा में रत है क्योंकि उसे परमात्म दर्शन करना है। किसी को अपनी ह्रदय गुहा में बैठा देखना है तो किसी को बाह्य विराट में। चर्म चक्षु से काम नहीं हो रहा इसलिए आँखों की तलाश में है। किसी को ज्ञान की आँख चाहिए औरक़िस्मतों भक्ति की आँख। लेकिन भक्ति बिना ज्ञान नहीं होता और ज्ञान बिना भक्ति नहीं। अजब ग़ज़ब का जोड़ है। 

मनुष्य चित्त तीन गुणों सत्व, रजस और तमस से चलता है जिसे मायिक कहा गया है। साधनाएँ सब सत्व की वृद्धि के लिए है। लेकिन भगवद् दर्शन के लिए यह पर्याप्त नहीं है। अप्राकृत के दर्शन के लिए अप्राकृत सत्व चाहिए जो बिना भाव और भक्ति से मिल नहीं सकता। भाव जगेगा नहीं, भक्ति होगी नहीं तब तक प्रेम फल आता नहीं। प्रेम जब तक राधा नहीं बनता तब तक कृष्ण दर्शन होता नहीं। 

इसलिए दिमाग़ को छोड़ ह्रदय पर ध्यान देना है जहां ह्रादिनी शक्ति का साथ मिलेगा। मांसपिंड ह्रदय नहीं, हमारे होने का, भाव केन्द्र ह्रदय। चित्त को वहीं विश्राम कराना है। तभी भगवद् दर्शन होंगे। स्वयं की तब अनुभूति होगी। फिर क्या करेंगे अंदर बाहर। अंदर भी वही और बाहर भी वही। यहाँ एक के सिवा दूसरा कोई है ही नहीं। स्वयं को स्वयं के प्रेम में पागल करना है। राधा बनकर श्याम की बंसी का स्वाद लेना है अथवा श्याम बन राधा संग रास रचाना है। 

भारत में फिलोसोफी को ‘दर्शन’ कहते है। चित्त के आयने पर पूर्ण चित्काकलामय भगवद् दर्शन। 
बस भगवद् कृपा चाहिए। यही कामना करें। ह्रदय में वास (भक्तिभाव का) हो और दर्शन के लिए आँख (प्रज्ञा) हो। 

पूनमचंद 
२० दिसंबर २०२३

Monday, December 18, 2023

वैदिक गाय, घोड़ा, बकरा और भेड़।

वैदिक गाय, घोड़ा, बकरा और भेड़। 

हिन्दू गौ पूजक है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा लगता है एक पशु गाय की व्याख्या में ही सीमित हो गई। लेकिन वेद में गौ का अर्थ व्यापक है। गौ संबोधन पोषण प्रदा करनेवाली दिव्य शक्तियों के लिए किया गया है। जैसे किः इमे लोका गौ। (ये लोक गौ कहे जाते है।) (शत.ब्रा.६.५.२.१७)। अंतरिक्षं गौ (एत.ब्रा.४.१५)। गावो वा आदित्याः। (एत.ब्रा.४.१७)। अन्नं वै गौः। (तैत.ब्रा.३.९.८.३)। यज्ञो वै गौः। (तैत.ब्रा.३.९.८.३)। प्राणों हि गौः। (शत.ब्रा.४.३.४.२४)। वैश्वदेवी वै गौः (गो.ब्रा.२.३.१९)। आग्नेयो वै गौः।(शत.ब्रा.७.५.२.११)। इस प्रकार लोकों, अंतरिक्ष, सूर्य, अन्न, यज्ञ, प्राण, विश्वदेवी (चिति), अग्नि को गाय का संबोधन किया गया है। 

यजुर्वेद में प्रार्थना है (१.३)। हज़ारों धाराओं से लोकों के तेजस को सवित करनेवाली परम व्योम में स्थित अदिति रूप इस कामधेनु (गौ) को आप हानि न पहुँचाएँ। (वसोः॑ प॒वित्र॑मसि श॒तधा॑रं॒ वसोः॑ प॒वित्र॑मसि स॒हस्र॑धारम्। दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता पु॑नातु॒ वसोः॑ प॒वित्रे॑ण श॒तधा॑रेण सु॒प्वा काम॑धुक्षः॥) परम व्योम में स्थित सहस्र धाराओं में स्थित पोषण देनेवाली शक्ति कामधेनु (गौ) पोषण देनेवाली प्रकृति की शक्ति है, केवल एक पशु गाय नहीं।

हिन्दुओं में अश्व और अश्वमेध यज्ञ का बड़ा महत्व रहा है। लेकिन वैदिक ऋषियों ने अश्व की पशु के लिए नहीं लेकिन गुणवाचक तीव्र गति देनेवाले के रूप में उपयोग किया है। अश्निुते अध्वानम् (तीव्र गतिवाला); अश्नुने व्यापनोति (शीघ्राता से सर्वत्र संचरित होनेवाला); बहु अश्नानीति अश्वः (बहुत खानेवाला अश्व है)। इस परिभाषा में वेद में किरणों को, अग्नि को, सूर्य को और ईश्वर को अश्व की संज्ञा गई है। अग्निर्वा अश्वः। (शत.ब्रा.३.६.२.५)। अग्निर्वा अर्वा (तै.ब्रा.१.३.६.४)। असौ वा आदित्योडश्वः। तै.ब्रा.३.९.२३.२)। सौव्यों वा अश्वः। (गो.ब्रा.२.३.१९)। अश्वो यत ईश्वरो वा अश्वः। (शत.ब्रा.१.३.३.५)।

बृहदारण्यक उपनिषद (१.१.१) के मंत्र के अनुसार इस जीवन यज्ञ अश्व की उषा शिर है, सूर्य नेत्र, वायु प्राण, वैश्वानर अग्नि खुला मुख, संवत्सर आत्मा, घुलोक पीठ, अंतरिक्ष उदर, पृथ्वी पैर रखने का स्थान, दिशाएँ पार्श्व भाग, अवांतर दिशाएँ पसलियाँ, ऋतुएँ अंग, मास और अर्धमास संधि स्थान, दिन और रात प्रतिष्ठा (पैर), नक्षत्र अस्थियाँ, आकाश मांस, रेत ऊवध्य, नदियाँ नाड़ियाँ, पर्वत यकृत, ह्रदय मासखंड, औषधि और वनस्पतियाँ लोम, उपर जाता हुआ सूर्य नाभि के उपर काऔर नीचे जाता हुआ नाभि के नीचे का भाग, जम्हाईं लेना बिजली का चमकना, और शरीर हिलाना मेघ गर्जन है। वह (अश्व) जो मूत्र त्यागता हैं वह वर्षा है और उसकी गर्जना उसकी वाणी है। (उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य। द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि। ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमानि। उद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धः। यद्विजृम्भते तद्विद्योतते। यद्विधूनुते तत्स्तनयति। यन्मेहति तद्वर्षति।
वागेवास्य वाक्॥ बृह.१,१.१ ॥ (शतपथब्राह्मणम् १०.६.४.१)। 

क्या यह सूत्र पशु अश्व के लिए हो सकते है?

इसी तरह अज (बकरा) वाणी के लिए प्रयोग है, नहीं कि बकरा पशु के लिए। वाक् वा अजः। अग्नि का धूम्र अज है। आग्नेयो वा अजः (शत.ब्रा.६.४.४.१५)।पृथ्वी को अवि (भेड़) कहा गया है क्योंकि वह प्रजा की रक्षा करती है। (शत.ब्रा.६.१.२.३३)। यजुर्वेद के ऋषि प्रार्थना करते हैं कि, हे अग्नि देव, उत्तम आकाश में स्थापित, विभिन्न रूपों को निर्माण करनेवाली, वरूण की नाभिरूप, उच्च व्योम में उत्पन्न, असंख्यक की रक्षा करनेवाली इस महिमामयी अवि को हिंसित (नष्ट) न करें।(वरू॑त्रीम्। त्वष्टुः॑। वरु॑णस्य। नाभि॑म्। अवि॑म्। ज॒ज्ञा॒नाम्। रज॑सः। पर॑स्मात्। म॒हीम्। सा॒ह॒स्रीम्। असु॑रस्य। मा॒याम्। अग्ने॑। मा। हि॒ꣳसीः॒। प॒र॒मे। व्यो॑मन्निति॒ विऽओ॑मन् ॥यजु.१३.४४ ॥)

क्या यह सब पशु की बातें है? हो सकता है वेदों के विधानों को पकड़कर पृथ्वी पर विचरण करनेवाले पशुओं के गुणों को देखकर गौ, अश्व, अज और अवि की संज्ञा दी गई हो  जिसे हमने अपनी संकुचित और छोटी सोच से स्वार्थ सिद्धि हेतु और संकुचित कर दिया। हमें तो पशुता से बाहर आकर विश्वमय होकर विश्वोर्तीर्ण के आभारी बनना है जिसने हमें यह मौक़ा दिया। तभी तो वसुधैव कुटुंबकम् का मंत्र चरितार्थ होगा। हमें अपनी सोच को विकसित करना है और गौ, अश्व, अज और अवि के वैदिक अर्थ को समझकर उसकी रक्षा करनी है, उन्हें हिंसा से बचाना है। 

अस्तु। 

पूनमचंद 
१८ दिसंबर २०२३

Monday, November 20, 2023

चिदाकाश।

 चिदाकाश। 

मन है इसलिए शब्द है। शब्द है इसलिए मन। दोनों के पार है अद्वय। न तुम, न मैं।

पहले तो खुद को पहचानना है कि मैं शरीर नहीं हूँ, चैतन्य हूँ। चैतन्य अजर अमर है। 

दूसरा चैतन्य के स्वरूप को जानना है। वह खंड लगता है परंतु अखंड है। घटाकाश से महाकाश की यात्रा करनी है। 

तीसरा जहां खंड भी नहीं और अखंड भी नहीं; प्रकाश भी नही अंधकार भी नहीं, सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। केवल। चिदाकाश। शून्य। क्या नाम देंगे, जिसका न तो नाम है न रूप। 

साकार से सर्वाकार फिर निराकार। 

अनंत यात्रा है अगर विशेष रहे। सामान्य के लिए तो बस यूँही चुटकी बजा के। ठंड में चाय का कस लीजिए और बस खो जाइए उस अनंत में। 

न तुम, न मै। है बस केवल। धर्म का धर्मी और तरंग का जल यूँ मिल जाना आसान थोड़ी है? 😊

पूनमचंद 

२० नवम्बर २०२३

Sunday, November 19, 2023

आत्मज्ञान।

 आत्मज्ञान। 

आत्मज्ञान अनुभूति है। 

अनुभूति अनुग्रह से होती है। 

अनुभूति के लिए आधार चाहिए। 

जो हमारे पास है, चित्त। 

चित्त का निमज्जन (स्नान) करना अति आवश्यक है। 

उसके लिए कर्म, ज्ञान और भक्ति सलिला (पानी) है। 

अभी तो विश्व विषय रूप है। विषय के प्रति इन्द्रियाँ लोलुप है। इन्द्रियों के पीछे मन का अनुसंधान है। और मन आत्मा की शक्ति से बहिर्मुख होकर आनंद की खोज में लगा है। खोज है इसलिए देश और काल जुड़ा है, भविष्य है और जन्म मरण का दुःख है। 

जिसने विश्व को शिवरूप देख लिया उसका विषय इन्द्रियों में विसर्जित होगा। इन्द्रियाँ मन की ओर और मन आत्मा की ओर हो जाएगा। वह बाह्य आकर्षण की ओर भागता बंद होकर आत्माकर्षण बन जाएगा। विश्व के विषय उसकी ओर आकर्षित होंगे। वह विश्व का भोग लगाएगा लेकिन त्याग (अनासक्त) कर के। उसके लिए अब काल न रहेगा। न भूत, न भविष्य। केवल वर्तमान। विश्व और वह अलग नहीं रहेंगे। शरीर के साथ जीवन्मुक्त और शरीर छोड़कर विदेहमुक्त। 

उस चित्त की हमें कामना करनी है जो कर्म, ज्ञान और भक्ति के जल से स्नान करता हुआ द्रवित होते होते चिद्रुप हो जाए और परम शिव को प्रतिबिंबित कर सके। 

यात्रीगण चलते रहो। 

पूनमचंद 

१९ नवम्बर २०२३

Thursday, October 26, 2023

मनु और शतरूपा।

 मनु और शतरूपा। 


भारत देश में मनु स्मृति के विवाद चलते रहते है। परंतु मनु कौन था या कौन है इसके बारे में कम चर्चा होती है। तुलसीदास ने भी रामचरितमानस के द्वारा समाज के मानस को ही चौपाई बद्ध कर दिया था। 

श्रुति कहती है की सृष्टि के पहले जब कुछ भी नहीं था तब भी कुछ नहीं (शून्य) का कारण (सच्चिदानंद) मौजूद था। उस परम (सदानंद) सत्ता (चिद्) को एक से अनेक होने का संकल्प (इच्छा) हुआ और सृष्टि (ज्ञान) का सृजन (क्रिया) हुआ। परंतु परम पुरुष ने संकल्प से पहले मन (इच्छा) पैदा किया। अलिंगी अरति था। अरति हटाने दूसरे (रति) की कामना की। आलिंगन का भाव हुआ। अपने देह को दो भागों में विभक्त किया और (पुरूष और स्त्री) पति पत्नी हुए। यही जोड़े से जगत बना। द्विदल बिना अंकुरण कहाँ? रति बिना रमण कहाँ? मनु संज्ञक यह प्रजापति ने अपनी पत्नीरूप कल्पना से शतरूपा नाम की कन्या से संयुक्त हुआ और जीवसृष्टि प्रकट हुई। 

मन ही मनु है जिसे प्रजापिता ब्रह्मा का पुत्र माना जाता है। अकेला पुरूष मन जैव सृष्टि का सृजन नहीं कर सकता इसलिए उसने स्त्री का सृजन हुआ।फिर द्विदल के मिलन-मिथुन से सृजन कार्य आगे बढ़ता गया। स्त्री को शतरूपा नाम दिया है क्योंकि शतरूपा सोचती रहती है कि अपने से ही उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है? मैं छिप जाऊँ। वह गौ हुई तो मनु वृषभ होकर संभोग में लग गया। वह घोड़ी हुई तो मनु घोड़ा बना। वह गधी बनी तो मनु गदर्भ बन गया। शतरूपा बकरी हुई तो मनु बकरा बना।शतरूपा मनुष्य, गाय, घोड़ी, गधी, बकरी, भेड़ इत्यादि रूप लेती रहती है और मनु पीछे पीछे उसी योनि का पुरूष बनकर संभोग से सृष्टि का विस्तार करता रहा। चींटी से लेकर हाथी तक (रूपक है अर्थात् सब) जितने मिथुन जोड़ें है वह मनु शतरूपा है जो सृष्टि की रचना में लगे हुए है। 

इस सृष्टि में अग्नि है और सोम है। सूर्य है और चंद्र है।नाड़ी पिंगला है और इडा है। तेज है और वीर्य (आर्द्र) है। अन्नाद है और अन्न है। अग्नि अन्नाद है और सोम अन्न। द्रवात्मक होने से सोम पोषक है। उष्णता और रूक्षता के कारण अग्नि अत्ता अर्थात् भक्षण करता है। सोम का भक्षण अग्नि करता है। यह जगत अग्निषोमात्मक है। सूर्य और चंद्र को इसलिए परमात्मा की दो आँखें का रूपक दिया गया है। 

चातुर्वर्ण्य की व्याख्या भी कुछ इस प्रकार है। मुख लोमरहित है। मुख से अग्नि देव हुए। ब्राह्मण भी लोमशून्य होता है।दोनों मुखरूप वीर्यवाले है इसलिए यज्ञ अग्नि में आहुति और भोजन में ब्राह्मणों को भोजन का बड़ा महत्व रहा है। बल की आश्रयभूत भुजाओं से इन्द्रदेव और मनुष्यों में क्षत्रिय रचा गया। दोनों बाहुरूप वीर्यवाले है। उरूओं से वसु और वैश्य रचे गए। चरणों से पृथ्वी देवता पूषा (पोषक) और परिचर्चापरायण शुद्र रचे गये। अग्नि ब्राह्मणों का, इन्द्र क्षत्रियों का, वसु वैश्यों का और पूषा शुद्रों का देवता है। देव उसकी प्रजाति पर अनुग्रह रखता है इसलिए प्रजाति अपने अपने देव की पूजा में लग गई। यहाँ जन्म नहीं गुण कर्म प्रभाग है। एक ही शरीर में चातुर्कर्म लगा हुआ है।जीव जगत पूरा चार कर्मों में लगा हुआ है। मनुष्य, पशु, पंखी, कीट, पतंग, हर मुख अग्नि है (अहं वैश्वानरों भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः) इसलिए भूखे को अन्न पुण्यकर्म है। “कहे कबीर कमाल से, दो बातें कर ले। कर साहिब कीं बंदगी भूखे को अन्न दे।” 

अव्यक्त जगत नामरूप योग से व्यक्त हुआ। जैसे काष्ट में अग्नि गुप्त हैं वैसे ही जगत का नियंता जगत में गुप्त है। अदृश्य है। वही सब की आत्मा है। उसके ज्ञान से सब का ज्ञान हो जाता है। अविद्या से स्वरूप का अज्ञान हुआ है। इसलिए ज्ञान और कर्म के साधन से साध्य प्रजापति फल पाना है और संसार वृक्ष को उखाड़ना है। यही पुरूषार्थ है। उसकी उपासना करें। 

मनु और शतरूपा की संतान मनुष्य मननशील है  इसलिए उसने स्मृति रची और मानस भी रचा। लेकिन अज्ञानी भी है। इसलिए ज्ञानी ने रची श्रुति को अज्ञानी अपने अपने स्वार्थ में समझता गया और अर्थ करता गया और जगत को विभक्त करता गया। वह मनुष्य मन ही है जो शांति लाता है और युद्ध भी। मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है क्योंकि जैसा उसने माना, हो गया। बंधन कहा तो बंधन का अनुभव हुआ और मुक्ति कहा तो मुक्ति का अनुभव करने लगा। प्राणन से प्राण, बोलने से वाक्, देखने से चक्षु, सुनने से श्रोत्र, मनन से मन है लेकिन यह सब एक विशेषणरूप अपूर्ण है। जिस में सब आ जाए वह आत्मा है। जिसने उस आत्म तत्व का अनुसंधान किया, आत्म तत्व को जान लिया, वह मन से परे हो गया। परमात्मा (पूर्ण) हो गया। उस पूर्ण की उपासना करें। पूर्णोहं। 

पूनमचंद 
२६ नवम्बर २०२३

Monday, October 23, 2023

पूर्णता और गीता।

 पूर्णता और गीता। 

पूर्णता अमरता है। इसलिए जो अमर है उसका साक्षात्कार करने से मृत्यु के भय से छुटकारा होता है। 

श्रीकृष्ण स्पष्ट करते है कि, जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।(भगी.२.२७)। (जो जन्मा है वह मरेगा और जो मरेगा वह फिर से जन्मेगा) इस बोध को ऊर्जा के नियम से जोड़ सकते हैं कि उर्जा का न तो निर्माण सम्भव है न ही विनाश; केवल इसका रूप बदला जा सकता है। 

लेकिन मृत्यु से पहले श्रीकृष्ण अमरता की बात करते है। न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।(भगी.२.२०) न जन्मता है न मरता है। न उत्पन्न होकर फिर होनेवाला है। (आत्मा) नित्य है, शाश्वत है, पुरातन है, शरीर के मरने से नहीं मरता। इस बात को और ठोस करते हुए बताते हैं कि नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।भगी २.२३।।शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकता, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सूखा नहीं सकती। 

फिर आत्मा नित्यता बताते हुए कहते है, अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।भगी.२.२४।।काटा, जलाया, गीला, सूखाया नहीं जा सकता क्योंकि (आत्मा) नित्य है, सब में है, स्थिर है, अचल है और सनातन है। 

हमें प्रश्न होगा कि हमारे सामने तो सब जन्मता है और मरता है, फिर यह महाशय जो सनातन है वह है कहाँ? 

श्रीकृष्ण कहते है, अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।भगी.२.२५।। (आत्मा) अव्यक्त है, चिंतन का विषय नहीं है, अविकारी है। ऐसा जानकर (मृत्यु का) शोक करना उचित नहीं है। देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।भगी २.३०।।देही (आत्मा) नित्य है, अवध्य है, इसलिए सभी प्राणी और भूतों के लिए शोक नहीं करना है। 

हम है न देही? फिर क्या करना है? 

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।भगी २.३१।। अपने धर्म (कर्त्तव्य) को देखकर उससे विचलित नहीं होना है। यहाँ सुननेवाला अर्जुन है जो युद्ध के मैदान में खड़ा है इसलिए उसे अपने क्षत्रिय कर्म को देखते हुए धर्ममय युद्ध के लिए आह्वान किया गया है। हमें अपने अपने कर्तव्य धर्म का पालन करना है  कर्तव्य से भाग जाने से अमरता नहीं  मिलतीं। अमरता उसे मिलती है जो अमर को पहचान लेता है। मृत्यु के भय से मुक्त निष्काम कर्म करेगा, कुशलता से करेगा, और निश्चिंत होकर करेगा। देही जिस रूप धर व्यक्त है उसकी अभिव्यक्ति पूर्णरूप से करेगा। ऐसा करने से भी उसकी पूर्णता बरकरार रहेगी। 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। वह (परमात्मा) पूर्ण है। यह (जगत) भी पूर्ण। क्योंकि पूर्ण (विश्वोर्तीर्ण) से पूर्ण (विश्वरूप) प्रकट हुआ है। शिव भी पूर्ण, शक्ति भी पूर्ण, शक्ति शिव का ही विमर्श है। दोनों का सामरस्य (एकत्व) है। 

पूर्ण रहें।पूर्ण ही सनातन है।

पूनमचंद 

२३ अक्टूबर २०२३

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