Monday, February 3, 2025

चित्रकूट।

 चित्रकूट। 


महर्षि वाल्मिकी कृत श्रीमद्भागवत रामायण पढ़ने के बाद चित्रकूट के रमणीय प्रदेश को देखने हम लालायित थे पर जा नहीं पाए। लेकिन इस बार महाकुंभ की यात्रा करते उस प्रांत से गुज़रते हुए उसकी सुगंध ज़रूर ले आए। मन तो बहुत था कि वहाँ रुके, परिभ्रमण करें लेकिन वॉल्वो का समयपत्रक इजाज़त नहीं दे रहा था। 

चित्रकूट उत्तर प्रदेश राज्य और मध्य प्रदेश राज्य की सीमाओं को जोड़ता बुंदेलखंडी प्रदेश है। कामदगिरि पहाड़ियों और मंदाकिनी (पयस्विनी) नदी के प्रवाह के साथ बना यह क्षेत्र इतना रमणीय और सुंदर है कि महर्षि वाल्मिकी और महाकवि कालिदास उसका वर्णन करते हुए नहीं थकते। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने यहाँ वनवास के ११ साल बिताए थे। 

श्रीराम २५ वर्ष के हुए थे और सीताजी १८ वर्ष की। राजा दशरथ को जो चाहते थे उसे करने में आ रहे विघ्न का अंदेशा आ गया था। वह जानते थे कि पट्टराणी का स्थान कैकेयी का था और उसका पुत्र भरत श्रीराम से सिर्फ़ एक ही दिन छोटा था। वह श्रीराम को युवराज घोषित करना चाहते थे इसलिए पुत्र भरत और शत्रुघ्न को भरत के ननिहाल कैकय (पाकिस्तान, गांधार के पूर्व का पेशावर प्रदेश) भेज दिया था। गुरु वशिष्ठ के परामर्श में उन्होंने श्रीराम को युवराज घोषित कर दूसरे दिन पदाभिषेक की तैयारी भी कर दी थी। अयोध्या की प्रजा आनंदित थी और सब लोग नगर को श्रृंगार करने में लग गए थे। लेकिन रात अभी बाक़ी थी। कैकेयी के कक्ष में दशरथ की लाचारी और कैकेयी के मातृप्रेम का आक्रोश दुःखद चित्र का निर्माण कर रहा था। वचन से बँधे दशरथ क्या करते? उन्होंने आदेश तो नहीं दिया लेकिन राम को १४ साल वनवास और भरत को राजगद्दी की मौन सहमति दे चुके थे। सुबह होते ही राम युवराज परिवेश के बदले तपस्वी परिवेश में आ गए थे। उनके साथ में सीताजी और लक्ष्मण भी चल पड़े। वनवास के नियम से श्रीराम बँधे थे, सीताजी और लक्ष्मण नहीं फिर भी उन दोनों ने भी तपस्वी वेश धारण किया था। हाँ, सीताजी अपने गहने साथ लेकर चली थी। श्रीराम को वनवास देने में राणी कैकेयी की शायद एक कूटनीति भी रही होगी। राम वन में रहते हुए अयोध्या राज्य को वन प्रदेश के हमलों से सुरक्षित रखेगा और भरत शांतिपूर्ण राज्य कार्य करेगा। श्रीराम और बाली संवाद में आर्यों के इस राज्याधिकार की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। 

वे तीनों अयोध्या (कोशल) राज्य की सीमा प्रदेश को पार कर श्रृंगवेरपुर से गंगा पार कर प्रयाग होते हुए २७०-७५ किलोमीटर की सफ़र कर चित्रकूट आए थे। सीताजी ने गंगा पार करते समय वापस लौटकर गंगाजी को १०० कुंभ चढ़ाने की मन्नत मानी थी। चित्रकूट में उन्होंने सुंदर कुटिया बनाई थी, वास्तु पूजा और बलिदान भी किया था और १४ साल के वनवास में से ११ साल रहे थे। भरत यहीं पर श्रीराम से मिलने आए थे और उनकी खड़ाऊ लेकर लौटे थे। जब राक्षसी हमले बढ़े और ऋषिगणों ने प्रदेश ख़ाली करना शुरू किया तो राम लक्ष्मण और जानकी को भी दक्षिण की ओर चलना पड़ा। पंचवटी में वे अपनी दूसरी कुटिया बनाकर रहने लगे लेकिन सुवर्ण मृग के मोह में भटके, सीताहरण हुआ और सीतायण शुरू हुई। 

चित्रकूट आज भी रमणीय प्रदेश है। हम जब इस क्षेत्र से गुज़र रहे थे तब दो तरफ़ पहाड़ियों के बीच का मैदानी प्रदेश हरियाला मन लुभावन प्राकृतिक छटाओं से भरा था। उस क्षेत्र में दौड़ते हिरणों, नाचते मयूरों और बरसते बादलों को देखने की कल्पना तन-मन में रोमांच भर देती है। इस क्षेत्र में श्रीराम को पिता-माता, राज्य वियोग का दुःख रहा होगा लेकिन ११ साल तपस्वी जीवन जीने में अनुकूलता रही होगी। सीता वियोग का दुःख और रावण से युद्ध का कष्ट तो पंचवटी पहुँचने के बाद ही शुरू हुआ। वह भी कहानी कुछ और होती अगर लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक-कान नहीं काटे होते। महाभारत के कुंती पुत्र भीम ने हिडिंबा से शादी कर रामायण की गलती दोहराई नहीं थी। 

दो पहाड़ी क्षेत्रों के बीच के हरे भरे मैदानी प्रदेश को चिरती हुई हमारी बस चली जा रही थी। दायीं तरफ़ एक छोटा पानी का झरना, पेड़ पौधों से भरी पहाड़ी और वाल्मिकी आश्रम का क्षेत्र गुज़रा तब नीचे उतरने की ललक हुई लेकिन लक्ष्य प्रयागराज था इसलिए बस चलती रही। चित्रकूट जिला मथक ख़ास कुछ आकर्षक नहीं लगा। प्रयागराज महाकुंभ की वजह से यह क्षेत्र लक्ज़री और सादी बसों की पार्किंग भीड़ से भरा था। जगह जगह पर लोग छोटे छोटे जूथ बनाकर ज़मीन पर बैठे थे। कोई खाना पका रहे था, कोई परोस रहे थे और कोई खा रहे थे। शायद यहाँ उतरकर चित्रकूट धाम जाकर मंदाकिनी नदी का मंद मंद प्रवाह देखते, राम घाट पर नहाते, जानकी कुंड जाते, स्फटिक शीला निहारते और कोई कौआ आ जाता, हनुमान धारा देखते सीता रसोई का स्वाद लेते और त्याग की स्पर्धा में लगे दो भाई भरत और राम के मिलन के भरत कूप को देख पाते तो अधिक ऊर्जावान हो जाते। 

अगर चित्रकूट जाते तो तुलसीदास कैसे भूल जाते?
चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर;
तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुवीर। 
तुलसीदास जी ने संस्कृत कीं रामायण को लोकभाषा अवधी में जनमानस में चल रही राम कहानियाँ और किंवदंतियों को जोड़कर रामचरितमानस का संस्करण किया। जैसा समाज और समाज का दृष्टिकोण इसे प्रतिबिंबित किया। 

अगली बार चित्रकूट धाम। 

जय श्रीराम। 

पूनमचंद 
३ फ़रवरी २०२५

Sunday, February 2, 2025

प्रयागराज यात्रा का आखरी दिन।

 प्रयागराज यात्रा का आखरी दिन। 


आज का दिन आसान रहा। प्रवास का आखरी दिन था और सबको धरती का आखरी छोर घर और गृहस्थी नजर आ रही थी। मेवाड़ रेसॉर्ट के मेनेजर को शायद अनायास योग बैठा होगा की पिनाकीनभाई की पत्नी के नाम की डीस सुबह के नास्ते में रख देता था। आज भी उपमा के साथ पोहा और प्याज़ के पकौड़े थे। परसों नास्ते में सेब और कीनू सबूत रखें थे इसलिए सबने एक एक उठाये थे यह देखकर आज उसने दोनों काट रखे थे। चाय कॉफ़ी के साथ हमारे सहप्रवासी की भारत ब्लेक कॉफ़ी का स्वाद भी मिल गया। सबने भरपेट नास्ता किया और हम सुबह के ७.३० बजे घर की ओर वापस चल दिए।

आज फिर अंताक्षरी हुई। राजकोट की युवतियों को परसों हुए हार का बदला लेना था। उनके साथ में न्यूक्लियर से ऊर्जा पैदा करनेवाले तीन पुरुष यात्री और दो बुजुर्ग थे इसलिए उनका जोश ज्यादा था। पीछे आज थकान थी और आवाज़ में नमी आ रही थी। पलड़ा बराबर था लेकिन आज फ्रन्टवालों ने फिनिश किया। 

दोपहर १२.३० बजे शाँवरिया किला गाँव के शिवकृपा रेस्टोरेंट में लंच के लिए हमने पड़ाव किया। गाँव के सरपंच का रेस्टोरेंट था जो एक ब्राह्मण युवक मासिक ₹३०००० के किराए पर लीज़ रखा था। खाना-पीना मुफ्त और मासिक ₹१०००० से २०००० कीं तनख़्वाह पर सेफ़ से लेकर सफ़ाई के १५ कर्मी रखे थे। मालसामान रसोई वगैरह सब मिलाकर मासिक रुपया तीन लाख से ज़्यादा खर्च लग रहा था। आजकल कुंभ मेले की वजह से धंधा ठीक चल रहा था लेकिन उसे आनेवाले दिनों की फ़िक्र थी। 

खाना किफ़ायती था। एक सब्ज़ी, दाल, चावल, चार बटर रोटी और सलाद के ₹१३०। एक सब्ज़ी और जोड़ी तो हुए १५०, साथ में ₹१० का पापड़ और ₹२० की छाछ। ₹१८० में पूरी थाली तैयार। ताज़ा ही बना रहा था इसलिए ४०-४५ मिनिट रुकना पड़ा। मैंने वक़्त देखकर बगल की दुकान के दादूसिंह बार्बर के हाथ अपने बाल बनवा लिए। हमने कहा ठीक से काटना तो कहें सर आप राजस्थान में बाल कटवा रहे हो। कमजोर कटेंगे तो हमारी इज़्ज़त आपके यहाँ कम हो जाएगी इसलिए निश्चिंत रहिए। हमलोग सिर, बाल, उम्र को देखकर समझ जाते हैं कि कैसे काटना है। ₹५० में उसने शहर के ₹१००-२०० ले रहे बार्बर से अच्छी कटिंग की। 

अब गरमा गरम खाना आ रहा था। २५-३० थाली खानेवाले थे और कुछ ख़ास लोग पुलाव, सब्ज़ी रोटीवाले भी थे। चार जैन थाली थी। पहले नॉर्मल थाली आई और समूह खाने लगा यह देखकर ख़ास पसंद के अपनी डीस के इंतज़ार से विह्वल हो उठे। किसी ने अपने पड़िके खोले तो कोई किचन की ओर ताक रहा था। कुछ ही देर में उनका खाना भी आ गया। सबने दबाकर खाया। उपमाबेन जो थाली में मटर-पनीर की सब्ज़ी जोड़ने के खिलाफ थी उन्होंने उसी को पहले स्वाहा किया। लंच निपटा के हम सब दोपहर पोने दो बजे वहाँ से चल दिए। 

अब गुजरात की हद तक चलना था और शामलाजी टी ब्रेक लेना था लेकिन विठ्ठल टीडी की तीन पत्ती देखकर सिर दर्द हो रहा था इसलिए साडे पाँच को चाय के लिए रूक गए। चाय पी। राजकोट की लड़कियां जहाँ उतरती आईसक्रीम का ही पूछती। उन्होंने आईसक्रीम यहाँ भी नहीं छोड़ा। सबने ग्रुप फ़ोटो ली। एक कुत्ता उपमाबेन के पारले ग्लुकोज़ बिस्किट का कर्ज चुकाने ग्रुप फ़ोटो में खड़ा हो गया। यहाँ गुजरात एस टी के तीन स्टाफ़ का सबने आदर और आभार व्यक्त किया और शाम के साडे छह बजे वहाँ से चल दिए। बस अब अपने अपने घर सबको उतरना था पहुँचना था। 

हमारा मुक़ाम रात ९.२८ को आया और हम उतर पड़े। राजकोट ट्रेन से जानेवाले चार महिला यात्री भी उतरकर गांधीनगर रेलवे स्टेशन चल दिए। कुछ ही देर में अहमदाबाद का आखरी स्टेशन आते सब उतर गए और अपने अपने घर पहुँचने में लग गए। अहमदाबादवाले रात्रि ग्यारह-बारह बजे, वडोदरा और सुरेन्द्रनगरवाले रात्रि सवा देढ बजे, भावनगरवाले ब्राह्म मुहूर्त ३.३०, राजकोट सुप्रभात के इंतज़ार में ५.३०, काकरापार टाउनशिपवाले सुबह ७.३० और कच्छ आदिपुरवाले ८.०० बजे अपने घर पहुँच गए। 

सबने २५०० किलोमीटर की वॉल्वो बस सफ़र की थी। कुछ किलोमीटर स्कूटर-रीक्षा-स्थानिक बस में कटे थे। लेकिन सबसे कठिन तो दो दिन मिलाकर २०-२५ किलोमीटर पैदल जो चलाना पड़ा वही रहा। कुछ लोगों की चाल बदल गई थी। धर्म श्रद्धा के सामने शरीर कष्ट को इसलिए तप माना गया है। सब तपस्वी थे इसलिए पूरी सफ़र का आनंद लेते हुए ख़ुशहाल अपने विश्राम स्थान पहुँच चूके है। अब कोई संगम की मिट्टी बाँटेगा और कोई गंगा जल। कोई कोई अपनी अपनी कहानी कुछ तड़का देकर या मसालें मिलाकर सुनाएगा। 

बोलो गंगा-यमुना-सरस्वती प्रयागराज संगम यात्रा की जय। 

हर हर गंगे। 🙏💐🇮🇳

पूनमचंद 
गांधीनगर 
२ फ़रवरी २०२५

Saturday, February 1, 2025

महाकुंभ २०२५

 महाकुंभ २०२५


कुंभ मेला नाम पड़ते ही सामूहिक स्नान का पर्व सब भारतीय के सामने आ जाता है। कुंभ का स्नान हर हिंदू दिल की ख्वाहिश होती है। बहती नदी का जल ही तो है, कभी भी स्नान कर सकते है लेकिन ग्रह नक्षत्रों के योग से जुड़ा यह पर्व अप्रतिम लोकप्रियता हासिल किए है। 

कुंभ कहते ही गागर में समूह का योग बनता है। आकाश में कुंभ राशि के समूह में ४५ तारें को गिनकर हमारे पूर्वजों ने मकर संक्रांति से सूर्य के साथ चलते उसके कुंभ राशि में प्रवेश को जोड़कर ४५ दिन के उत्सव का एक ऐतिहासिक पर्व बनाया है। देव दानवों के समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए हलाहल और रत्नों के आख़िर आये अमृत कुंभ का ढक्कन खुला रह गया और जहाँ बूँद गिरी वह कुंभ मेले का स्थान बन गई।भारत देश में हिंदू धर्म को सनातन बनाने शंकराचार्य के चार पीठ, सती के ५१ शक्तिपीठ और कुंभ मेले जैसे पर्व अद्भुत व्यूह रचना है। 

१९८७ में मसूरी अकादमी ने आयोजन अभ्यास हेतु हम सबको हरिद्वार कुंभ मेला भेजा था। तब हमारा पूरा ध्यान प्रशासनिक व्यवस्था पर था। इतनी बड़ी संख्या में आ रहे यात्रियों के आवागमन, स्नान, निवास, भोजन, जल, सफ़ाई, सुरक्षा, ट्रेफ़िक, इत्यादि कई सारे पहलुओं पर ध्यान रखकर पूरी प्रशासनिक व्यवस्था काम पर लग जाती है। यश कम मिलेगा लेकिन एक छोटी लापरवाही बड़ी बदनामी ले आती है। ३८ साल बाद इस साल प्रयागराज महाकुंभ में स्नान का योग अचानक बन गया। इस बार भी नज़र तो थी अभ्यासी की लेकिन प्रशासन से हटकर पैदल चल रहे लाखों जन, बूढ़े, युवा, महिलाओं और बच्चों पर ज़्यादा टिकी रहीं। 

वैसे तो कुंभ मेला का पर्व सदियों से मनाया जा रहा है लेकिन आज़ाद भारत में और ख़ास कर के २१वी सदी के भारत में टेक्नोलॉजी और सोश्यल मीडिया के चलते इसका प्रचार और प्रसार बढ़ रहा है। वर्तमान भारत खर्च कर सकता है इसलिए श्रद्धालुओं की संख्या अत्यधिक बढ़ रही है। सरकारी प्रशासन पिछले अनुभव से शिक्षा लेकर उत्तरोत्तर सफल आयोजन और संचालन कर लेता है। अब इतने बड़े आयोजन का अचरज नहीं रहता लेकिन कुछ हादसा होते ही उस पर सब टूट पड़ते है। 

इस साल के प्रयागराज महाकुंभ में इतनी बड़ी संख्या में लोग आएँगे ऐसा अंदाज़ा शायद न रहा हो लेकिन प्रचार इतना असरदार था कि संख्या बढ़ती ही गई। मैं भी अख़बार और सोश्यल मीडिया के ज़रिए कुंभ मेला की हर ख़बर पढ़ता रहता था। मेरे बेटे ने प्रस्ताव रखा तब एयर फ़ेयर सस्ते थे लेकिन मैं मेला क्षेत्र के विस्तार को देखकर पीछे हट रहा था। फिर प्लेन का किराया पाँच गुना बढ़ गया तब अचानक गुजरात सरकार की वॉल्वो सवारी की ख़बर पढ़ते ही जो भीतर जा रहा था उसने उबाल ले लिया। १२५० किमी जाने के और १२५० आने के, तीन रात्रि और चार दिन का पैकेज जिसमें हर दिन औसतन १० से १२ घंटे की बस सफ़र डराती थी। लेकिन ₹८२०० में इतना लंबा प्रवास, निवास कौन दे सकता था? लक्ष्मी को पूछा और उसने हामी भर दी। एक फ़ोन मिलाया और दूसरे दिन ख़बर आई कि दो सीट रद होने से खुल गई और हमारा काम हो गया। २७ को विचार किया, २८ को टिकट हुई और २९ की सुबह चल दिए। सामान में दो जोड़ी कपड़े, कुछ वुलन्स और कुछ ज़रूरी चीज़ें। दो सोल्डर बेग लेकर दो हमसफ़र चल दिए। 

वोल्वो में २६ पुरुष और २० महिला मिलाकर ४६ प्रवासी थे। सब उत्साहित थे। युवा थे और बुजुर्ग भी। यात्रा में जीवन फूँकने का काम लड़कियों ने किया। पहले बस के फर्श पर बैठकर कर पत्ते खेलें फिर अंताक्षरी शुरू कर दी। पीछे बैठा महिला दल को पावरहाउस निकला। अंताक्षरी के हिंदी गानों में भजन और फटाणा मिलाकर जमावड़ा कर दिया। सुबह का नास्ता शामलाजी और दोपहर का लंच उदयपुर हाईवे कृष्णराज हॉटल पर हुआ। लंच में दाल बाटी चुरमा, सब्ज़ी रोटी का स्वाद आ गया। शाम के बाद रेसोर्ट पर डिनर का पूछा तो प्रति व्यक्ति ₹६०० बताया और देर भी हो जाती इसलिए समराणीया रंधावा ढाबे पर रूके जहां ₹२०० की थाली मिल गई। गरमागरम आलू मटर की सब्ज़ी, दाल, चावल और बटरवाली चार-चार रोटी। जिसने खाया मज़ा आ गया। रात पड़ते ही विश्राम स्थान के सुंदर रेसोर्ट को देखकर दिन भर की थकान मिट गई। गुजरात सरकार ने ₹७००० प्ल्स जीएसटी किराएवाले कमरों में चार-चार को रहने की सुविधा करी थी। रेसोर्ट फोर स्टार से कम नहीं था। रात हो चुकी थी, थकान थी इसलिए हम सबने चाबी ली और निद्रा देवी के हवाले हो गये। दूसरे दिन रेसोर्ट के फ़्री ब्रेक फ़ास्ट सबके मन भाया। सुबह साडे सात बजे बस चली और झाँसी के रास्ते दोपहर चित्रकूट पार किया। चित्रकूट बसों की पार्किंग से भरा पड़ा था। लोग अपना अपना खाना पकाकर अथवा डिब्बे खोलकर बस के अग़ल बग़ल नीचे बैठकर पीकनीक मना रहे थे। हमें आगे का पता नहीं था और ट्राफिक की वजह से चित्रकूट नहीं रुके इसलिए आगे फिर खाना नसीब नहीं हुआ। ढाबे की खोज आख़िर एक चाय की लारी पर पूरी हुई। समोसे, मठरी, चाय, पकौड़ी और पडीकों से सबने कुछ ईंधन भरा और प्रयागराज की और आगे बढ़े। 

अमावस्या की रात ३० लोगों की कुचलकर हुई मौत के हादसे ने प्रशासन को ज्यादा सख़्त कर दिया। बसों की पार्किंग दूर दूर कर दी। वाहनों के आवागमन पर नियंत्रण आ गए। शाम ६.३० बजे हमारी बस जसरा अन्डर पास पर रूक गई जहाँ से हमारा मुकाम लगभग २०-२४ किमी दूर था। स्कूटरवाले युवा ₹३००-५०० प्रति व्यक्ति सवारी देने तैयार थे लेकिन कुछ बार्गेनिंग करें तब तक एक पुलिसकर्मी आया और सबको भगाया। पहला दिन था, सबको स्नान का उमंग था इसलिए सब पैदल चल पडे। देहात से आए कई हज़ार लोग जूथ बनाकर चल रहे थे। महिलाओं के सर पर सामान और पुरुष के कंधों पर, छोटे-छोटे समूह में बने लोगों का एक पूरा प्रवाह नदी के प्रवाह को मिलने चल रहा था। एक तरफ़ नदी का प्रवाह और दूसरी तरफ़ मनुष्यों की श्रद्धा का प्रवाह। कुदरत और कुंभ का संगम हो रहा था। अचानक युपी रोडवेज़ की बस पर चढ़ते लोगों पर ध्यान गया, पूछा और कुछ चढ़ गये। लेकिन कुछ आगे जाकर ट्राफिक जाम था। बस में बैठे रहने से चलना तेज था इसलिए हम जो ८-१० बैठे थे उतर गये। हमारे साथियों के सेक्टर-६ जाना था। वे सब पैदल ही चलते रहे और जैसे तैसे क़रीब रात के ग्यारह बजे पहुँचे। गुजरात सरकार की निवास व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी। ओन पेमेंट पाऊँ भाजी की व्यवस्था थी। कुछ ने खाया। कुछ थक गए थे इसलिए डॉरमेटरी में एक के उपर एक वाले पलंग को पकड़कर कंबल ओढ़कर सो गए। पलंग चौड़े थे इसलिए उपर से गिरने की संभावना नहीं थी। सुबह उठते ही वह सेक्टर-६ से संगम की और चल पड़े। यह वॉक भी लंबा था लेकिन मन में संगम स्नान की चाह में थकान का विचार दूर रहता था। 

इस तरफ़ बस से उतरते ही मेरा भाग्य जागा। अचानक एक फ़ोन आया औरकुछ सहाय मिल गई जो हमें सेक्टर-२४ में अपने टेन्ट तक छोड़ गई। जब पहुँचे तब घड़ी में नौ बजे थे।हमारा लायझन कर्मी भला इन्सान था। उसने लोकेशन भेजा था और डिनर के लिए पूछ लिया था। नेकी और पूछ पूछ। हमनें हामी भर दी थी। टेन्ट साफ़ सुथरा था। तीन पलंग गद्दे और रज़ाई के साथ तैयार थे। रूम हीटर भी था। पहले मोबाइल चार्जिंग में रखा और फ़्रेश हो लिए। तब तक भोजन तैयार था। आलू गोभी और मटर की गरमागरम सब्ज़ी, फूलका रोटी, दाल और चावल ने मन और तन ख़ुशबूदार कर दिया। भरपेट खाया और एक छोटे से वॉक के लिए चल पड़े। रात के १०.३० बजे थे  बाहर भीड़ जैसा कुछ नहीं था।कुछ कदम पीछे सामने छोर पर जाने का पुल था। पूछो तो कहा कि २४ नंबर ड्यूटी स्टाफ़ के लिए है। जनता के लिए कुछ और कदम दूर दूसरा पुल नं २६ है। फिर हम यमुना के किनारे संगम की ओर चलें। युपी सरकार ने मेला क्षेत्र के सभी रोड को लोहे के १२x३ की सीटों से जड़ रखा था। सफ़ाई कर्मी उस पर जम रही बालू को साफ़ करने में लगे थे। हर १०० फूट पर पीने के पानी का स्टेन्ड पोस्ट और कुछ कुछ अंतर पर जनता टॉयलेट की सुविधा थी। सफ़ाई ए१ कक्षा की थी। चारों और रोशनी का उजाला और कोई कोई स्थान से भजनों और मंत्रोच्चार के केसट के शोर था। खोया पाया कार्यालय किसी का बच्चा या किसी की बीबी की खोज के एनाउन्समेन्ट में लगा था। ज़्यादातर पुकार करवानेवाले बिहार, झारखंड, पूर्वी युपी, बंगाल के ही सुनाई दे रहे थे। धीरे-धीरे वह भी शांत हुआ। हम भी सुबह स्नान करना था इसलिए कुछ चलकर वापस आ गये और रज़ाई में छिपकर सो गए। 

सुबह चार बजे नींद खुल गई। सुबह की तन सफ़ाई कर कुछ देर ध्यान किया। तब तक हमारा कर्मी तैयार हो गया। बॉट ७.०० बजे के बाद लगती थी इसलिए हम ६.३० होते ही यमुना के तट पर चल दिए। रास्ते में परमार्थ निकेतन की बहुत बड़ी जगह में लोगों के रहने और खान-पान की व्यवस्था सँभालती देखी। आगे ज्यूडीशरी के लिए एक्सलूजीव टेन्ट के बने क्षेत्र  को देखकर नजर ठहर गई। अब संगम जाने का यमुनाजी का घाट आ गया था। वीआईपी और सामान्य स्टेन्ड पर लोग थे लेकिन बॉट नहीं थी। हम कुछ आगे चले और एक सरकारी व्यवस्था पर पहुँच गए। नसीब का साथ था। हाईकोर्ट के एक जज साहब और उनके परिवार के लिए बॉट लग रही थी। पहले तो खुली दो बॉट में जाने का आयोजन था लेकिन कवर्ड बॉट का चालक आया और बड़ी बॉट चालू कर दी। उनके बैठने के बाद हमारे कर्मीने बिनती की और हम तीनों का समावेश हो गया। बॉट संगम ले चली। सूरज पूरब से निकला था, वातावरण में हल्की धुंध थी और सायबिरियन गल और अन्य कई पक्षी बॉट के बहाव से उड़ उड़ कर हमारा स्वागत कर रहे थे। हम सबने संगम स्थान उतरकर डुबकी लगाई, स्नान किया और सूर्य को अर्घ्य दिया। कुछ देर पानी में रहे और फिर कपड़े पहन लिए। अचानक मेरे सहकर्मी ने कहा कि सर जूते बैग में रखो और जीन्स उतारो। मैं कुछ समझा नहीं। उसने बताया कि हमें स्नान के बाद अखाड़ों की ओर जाना है इसलिए नदी की उस पार जाना है। संगम स्थान पर पानी गहरा नहीं था इसलिए उपर के कपड़े पहन रखें और जीन्स उतारकर फिर पानी में कदम बढ़ा दिए। मेरी पत्नी अपने पेन्ट के साथ चल पड़ी। कंधे पर सोल्डर बेग उपर से शर्ट जेकेट का पहनावा और नीचे नंगा जंघा, मेरा हुलिया देखने जैसा हो गया। हम लोग पानी के मार्ग से सामने की ओर घाट पर स्नान कर रहे लोगों का वीडियो लेते हुए संगम पार कर गंगा की ओर आ गए। मुझे तो इतना मज़ा आया कि कुछ देर इसी लिबास में तट पर चलता रहा। फिर जीन्स चढ़ाई और पीपा पुल पार करने चल पड़े। पीपा पुल वन वे थे इसलिए तीन नंबर से नदी पार  कर अखाड़ों के सेक्टर में प्रवेश किया। चतुष्कोणीय सेक्टरों से बने क्षेत्र में रास्तों की दोनों तरफ़ भगवे रंग के प्रवेशद्वार, बड़े बड़े फ़ोटो और हॉर्डीग्स लगे थे। हर शिविर पर धजा पताकाएँ लहरा रही थी। सब साधुगण अपने अपने शिविर में बंद थे। शंकराचार्य, अग्नि, निरंजनी, नागा, अघोरी, जूना, पंचायती, उदासीन, निंगली, हरिहर, योगदा, कालीकमलीवाला इत्यादि संतों की फौज अपने अपने देश बनाकर बिराजे थे और उनसे जुड़े भक्तगण अपने अपने पूजनीय के क्षेत्र के आसपास नज़र आ रहे थे। सुबह का वक्त था। भूख लगी थी। एक अमरूदवाला मिल गया। प्रयागराज के लाल अमरूद बहुत मशहूर है लेकिन मेरी पत्नी ने बड़ा देखकर पसंद किया अमरूद सफेद निकला। स्वादिष्ट था। १०० रूपये किलो का भाव सुनकर एक पुलिस कर्मी अमरूदवाले पर भड़क गया और उस पर बरस पड़ा। ३० रूपये किलो के अमरूद के १०० लेते हो? उसे भगाया लेकिन तब तक हमारे हाथ ₹२० का एक अमरूद आ गया था। मन भर स्वाद लिया और सुबह को मीठी बना ली। कुछ चले होंगे कि सहसा एक शिविर के आगे से किसी ने खिचड़ी का प्रसाद आगे धर दिया। हमने हरिओम कर दिया और कुछ आगे जाकर उपर अदरक की चाय पी। फिर हम अपने परिचित संत को मिलने सेक्टर १९ पहुँच गए। डॉल-अमरकंटकवाले बाबाजी कल्याणदास जी शिविर में मौजूद थे। दर्शन मुलाक़ात हुए। उन्होंने आज्ञा की कि भोजन लेकर जाना। हमें जाने की जल्दी थी फिर भी उन्होंने आग्रह किया कि जलपान तो ज़रूर करें इसलिए हम मना नहीं कर पाए। भण्डारा टेन्ट में गए तो हलवा, कचौरी, मटर उसल, रसगुल्ला की थाली परोस दी गई।  उसमें इतना स्वाद था की हलवा तो दो बार लिया। कचौरी का स्वाद तो अद्भुत था। ऐसी स्वादिष्ट कचौरी जीवन में पहलीबार खाई। पेट भर तृप्त हुए हम वापस चल पड़े। जाना था जसरा जिसे कोई नही् जानता था। नैनी बस अड्डे का पूछे तो कोई दाएँ बताए तो कोई बायाँ। हम कभी आगे चले कभी पीछे और रोड में उलझ पड़े। स्कूटर वाले हमें फँसा समझकर सवारी के भाव बढ़ाने लगे। पैर चल रहे थे इसलिए हमने आख़िर पीपा पुल १४ से नदी को पार कर आम लोगों के क्षेत्र में कदम रख दिए और चुंगी नाके को लक्ष्य बनाकर चल दिए। चलना जैसे ख़त्म नहीं हो रहा था। एकाध जगह विश्राम किया, प्रसाद में मिले थे वह फल खाये और कदम आगे बढ़ाए। चलते चलते एक लारी में बच्चोंवाली सुगर ओरेन्ज गोली देखकर मेरा बच्चा मन ललचाया। गोली ख़रीदी और मुँह मीठा कर लिया। हम दो जैसे तैसे कर चुंगी नाका पहुँचे। वहाँ से ₹४० में एक स्कूटर मिल गया जो युपी रोडवेज़ की बस के चौराहे पर छोड़ गया। वहाँ से बस मिली जिसने ₹३५ के किराए में गजरौला ब्रिज के पास उतारा। वहाँ से कुछ कदम चले तब तक एक ओटोबाले ने फ्री लिफ्ट दी और हमें पार्किंग में पड़ी बस के दरवाज़े पहुँचा दिया। दोपहर का १ बजा था। सब पहुँच रहे थे। बाक़ी लोग आते ही हमारी बस ने दोपहर के २.३० वजे जसरा छोड़ा। आज न कोई गानेवाला था न बजानेवाला। सब चल चल कर थके थे इसलिए सो गए। जब जागे तब चित्रकूट पार हो गया था। एक चाय ब्रेक लिया। कुछ लोग गुजराती फ़िल्म देखने लगे। रात बढ़ने से पहले जो मिला वह खाया ऐसे इरादे से एक फेमीली रेस्टोरेंट पर रुके। ओर्डर लेनेवाले भारी शरीर के थे इसलिए एक एक कर माँगनेवाली गुजराती आदत से गर्म हो रहे थे और खाना ठंडा परोस रहे थे। कुछ को ठीक लगा कुछ को बेकार। महंगा नहीं था इसलिए खाने से फ़रियाद कम थी। फिर फ़िल्मवालो ने अपनी फ़िल्म देख ली। मुझे पता नहीं चला कि दादाजी ने चुराया हार मिला की नहीं। रात के सवा बजे बस मेवार रेसोर्ट पहुंची। सबने अपनी अपनी चाबी ली और नींदे की आग़ोश में खो गए। सुबह होते ही सब के चेहरे पर स्मित लौट आया। गर्म पानी का स्नान, ताजे कपड़े और पकोड़े, उपमा, पोहा, फल, चाय, कॉफ़ी का नास्ता, सब तृप्त थे।

तीन दिन पहले सुबह सात बजे अहमदाबाद से चले थे और महाकुंभ के सफल संगम स्नान के बाद आज सुबह सात बजे अपने घर की ओर लौट रहे हम सब ख़ूब ख़ुश और गुजरात सरकार और उसकी एसटी और टुरीजम की टीम के आभारी थे। 

पूनमचंद 
NH-27
१ फ़रवरी २०२५

Sunday, January 12, 2025

આદરણીય શ્રી પ્રવીણભાઈ લહેરી

આદરણીય શ્રી પ્રવિણભાઈ લહેરી 

કુશળ પ્રશાસક, અભ્યાસુ લેખક, તેજ સ્મરણ શક્તિ, મિલનસાર સ્વભાવ, માંગનારને મદદ માટે હરહંમેશ તૈયાર, અનુભવોની વાતોનો ખજાનો ધરાવતા આદરણીય શ્રી પ્રવીણભાઈ લહેરી સાથે બેસો તો સમય ખૂટી કે થાકી જાય પણ તેઓ ન થાકે. વાતમાંથી વાત એક કેરડાંનો કાંટો અઢાર હાથ, ગાંધીયુગના આઝાદીના લડવૈયાઓ, દેશી રજવાડાંઓ, જમીનદારો, અઢાર વરણનાં સામાજિક જીવન, આઝાદી પછીની સરકારોના રાજકીય દાવપેચો, ટાંટિયા ખેંચ કે પછી અહંકારોની અથડામણ, ક્યાંથી બગડ્યું અને કોણે સુધાર્યું તેની રજે રજની માહિતી મળી જાય. તેમના પરિચયમાં આવેલાં સાથી અમલદારોની લાક્ષણિકતાનું વર્ણન આબેહૂબ કરી આપે. સૌરાષ્ટ્ર રાજનાં પ્રગતિશીલ જમીન સુધારા હોય કે પછી મુંબઈ દ્વિભાષી રાજ્યની રાજકીય ખટપટો હોય કે પછી નવા બનેલાં ગુજરાતમાં સૌરાષ્ટ્ર અને ગુજરાત લોબીઓની ખેંચાખેંચ હોય; ગુજરાતના પહેલાં મુખ્ય મંત્રી ડો. જીવરાજભાઈ મહેતાથી લઈ આજસુધીના મુખ્ય મંત્રીઓના રાજકીય ઉદય અને અસ્તના કારણોનાં મૂળ જાણવા હોય તો પ્રવીણભાઈને સાંભળવા પડે. એક પ્રશાસક તરીકે તેમની કામગીરીની યાદી તો ખૂબ લાંબી રહેવાની. વહીવટી જટિલ પ્રશ્નોને હલ કરવાની વાતો લખવાં બેસીએ તો પુસ્તક બની જાય. અટપટાં કોયડાનો ઉકેલ લાવવામાં તેમને મહારથ તેથી તેમની સેવાઓને બધા જ મુખ્યમંત્રીઓએ બિરદાવેલ. નિવૃત્તિ પછી તેઓ સરકારી અને બિનસરકારી સેવાઓમાં કાર્યરત રહ્યાં અને છેલ્લાં એક-બે દશકથી અમદાવાદ સેટેલાઈટ રોડ પર આવેલ સદવિચાર પરિવારમાં સ્વૈચ્છિક સેવાઓ આપી તેના ખાલી કેમ્પસને તેમણે ચેતનવંતુ બનાવી દીધેલ છે. નાત જાત અને ધર્મના ભેદભાવ વિના અહીં રચનાત્મક પ્રવૃત્તિઓ અને સેવાકાર્યનો યજ્ઞ ચાલુ છે. સદા સફળ રહેતાં પ્રવીણભાઈ એક નિષ્ફળતા ટાંકવાનું ન ભૂલતાં. એક સાથી પરંતુ હઠી સ્વભાવના અધિકારીના લગ્ન કરાવવાના પ્રોજેક્ટમાં તેઓ પૂરાં પ્રયાસો છતાં નિષ્ફળ ગયેલાં. તે નિષ્ફળતામાં તેમનો ઓછો પરંતુ લાડાનો વાંક વધુ હશે તેવું માનવું રહ્યું. 

તેમના પિતાશ્રી કનુભાઇ લહેરી ગાંધી યુગના સ્વાતંત્ર્ય સેનાની. દેશી રજવાડાઓ અને ફોજદારોના રાજમાં રહેતાં સામાન્ય માણસને આઝાદીની શી સમજ પડે? ખાદીનું ધોતિયું, ઝભ્ભો અને માથે ગાંધી ટોપી પહેરતાં કનુભાઇ લહેરી ગાંધી યુગના આઝાદીના લડવૈયા તરીકે તેમનાં સૌરાષ્ટ્ર પંથકમાં જાણીતા. ઘોડી રાખતાં અને ગામેગામ જઈ લોકોને રચનાત્મક પ્રવૃત્તિઓ અને આઝાદીની ચળવળ માટે જાગૃત કરતાં. ઉના જેવા અંતરિયાળ વિસ્તારના લોકોને કોઈએ પૂછ્યું કે તમને આઝાદીની ખબર ક્યારે અને કેવી રીતે પડી? તેઓ જણાવતાં કે ૧૯૪૬માં કનુભાઈ લહેરી આવીને લોકોને ભેળાં કરી કહેતાં કે “ગાંધી નામનો સોનાનો સૂરજ ઉગ્યો છે અને જય હિંદ થવાનું છે”. ૨૫-૫૦-૧૦૦-૨૦૦ ગામનાં રજવાડાંઓના લોકોને આઝાદીની શી સમજ કે શી ખપ? રજવાડાંનાં રાજમાં રહેવાનું અને તે જેમ રાખે તેમ રહેવાનું. બાબરીયાવાડ વિષે પ્રવીણભાઈની કલમેં સુંદર આલેખન થયું જ છે પરંતુ ટૂંકાણમાં તેમણે કહેલી વાત મુજબ જૂનાગઢના નવાબે બાબરીયાવાડ જૂનાગઢમાં ભેળવી લઈ, ૧૫ ઓગસ્ટ ૧૯૪૭ના દિવસે જૂનાગઢના પાકિસ્તાન સાથે જોડાણના કરારમાં સહી કરી પઠાણો અને સિંધીઓએ મોકલી બાબરીયાવાડ દરબારગઢનો કબજો કરી લીધો હતો. રજવાડાના કુટુંબોએ ઉચાળા ભરવાં પડ્યાં અને દૂર ભાયાતો અને સગાંવહાલાંઓને ત્યાં આશરો લેવો પડેલ. પરંતુ કનુભાઇ લહેરીની તત્પરતાને કારણે સરદાર પટેલ દ્રારા બાબરીયાવાડની અંગ્રેજ સરકાર સાથેની સમજૂતીનો આધાર લઈ જૂનાગઢની હકૂમત નકારી તેના હાકેમોની ઇન્સ્ટ્રુમેન્ટ ઓફ એક્સેશનમાં સહીઓ લઈ પોલીસ એક્શનથી જૂનાગઢ રાજના પઠાણો સિંધીઓને હાંકી કાઢી રજવાડી કુટુંબોને પુનઃ ઘેર લાવી આપેલાં. 

એ વખતની ગાંધીફોજના લડવૈયાઓની વાત જ શી થાય? ગાંધીજીએ તેમને નિર્ભય કરી દીધેલ તેથી જે રાજવી સામે આંખ ઊંચી કરી જોઈ ન શકાતું તેની સાથેની બેઠકોમાં બેધડક પ્રજારાજની વાતો કરતાં. બાકી સાફાવાળા કહેતાં કે સમયની બલિહારી છે કે સાંભળવું પડે છે અને માંગો તે આપવું પડે છે, નહિતર તમે જે બોલો અને અમે સાંભળીએ તે અમારી આદત નહીં. 

પૂનમચંદ
૧૨ જાન્યુઆરી ૨૦૨૫

Saturday, January 4, 2025

Make Your Time Worth Your Time

यह सिद्ध योग पीठ की गुरुमाई चिद्विलासानंद का २०२५ के साल का संदेश हैः Make Your Time Worth Your Time : अपने समय को अपने लिए लाभप्रद बनाओ। 

मनुष्य जीवन कर्म आधारित है। इसलिए महाकाल के इस चक्र में कर्म करते रहना है। लेकिन कौनसा कर्म करना, अपना अपना चयन है। कर्म दो प्रकार से होते है। एक स्वार्थ के लिए और दूसरा परमार्थ के लिए। अपने और हमें जिसमें चाहना होती है वह परिवार के लिए किए गये कर्म, जिसमें ९९% लोगों के कर्म का घेरा सिमट जाता है। लेकिन कुछ कुछ लोग इस घेरे को तोड़ समूह, जाति, वर्ण, राज्य, देश, देशांतर तक बढ़ाते बढ़ाते वैश्विक हो जाते है। लेकिन यह तो लौकिक कर्म हुए। अलौकिक का पता नहीं रहा तो कैसे चलेगा? 

बौद्ध धर्म के फैलाव में यही बात प्रमुख थी। एक यान था हीनयान और दूसरा था महायान। हीनयान व्यक्तिगत उत्थान पर लक्ष्य रखता था जबकि महायान समूहगत। लेकिन व्यक्तिगत उत्थान के बिना समूहभान नहीं आता इसलिए व्यक्तिगत जीवन में सत्व और सत्य का प्रभाव बढ़ाने सम्यक जीवन जीना ज़रूरी है। इससे ह्रदय में पवित्रता बढ़ती है और पवित्र ह्रदय ही ईश्वर रूप होकर औरों को अनुग्रहित करता है। इसलिए अपने समय को अपने लिए लाभप्रद बनाना है। 

लेकिन लाभ कौनसा? बड़ा प्रश्न है। शिवोहम् का अथवा सांसारिक सुखों का? जिसके लिए प्रयास करेंगे वह मिलेगा। 

“कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती, करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्।”

पूनमचंद 

२ जनवरी २०२५

सनातन - कैवल्य

सनातन - कैवल्य 

पहले ह्रदय खोजो, 

फिर उसकी गुहा में उतरो, 

ज्ञानाग्नि से द्वैत मिटाओ,

आत्म स्वरूप में स्थित होकर,

कैवल्य पद - सनातन को प्राप्त हो। 

यही लक्ष्य है। 

तन-मन-बुद्धि साधन है। 

सबको भीतर उतार प्रपंच भेद मिटाओ।

आत्मा बिना आँख देखता है, 

बिना कान सुनता है।

उस प्रकाश - बोध को पहचानो। 

वह हम है। 

हमारे सिवा और कुछ भी नहीं। 


क़बूल हो। 

अनुभूत कर क़बूल हो। 

क़बूल हो।


पूनमचंद 

४ जनवरी २०२५

Friday, January 3, 2025

Hearsay Administration

Hearsay Administration 

तुम्हारा ख़ून ख़ून और हमारा पानी, a famous dialogue of Hindi film somehow applied to Indian bureaucracy. It has major three layers of hierarchy: permanent, semi permanent and temporary. The permanent staff is the lower bureaucracy recruited for the department, serve and retire mostly from the same department. The semi permanent are the top executive officers come and go with an average tenure of 2-3 years. The temporary are the elected representatives, the ministers who stay for the term of office. 

Lord Cornwallis the Governor General of Bengal is called the father of Indian bureaucracy as he introduced bureaucracy in India through Cornwallis Code. It took a new shape of governance with the Chartered Act of 1833 through which the Governor General of Bengal became Governor General of India and the government run by him referred as Government of India. Lord William Bentinck became the first Governor General of India in the end of 1833. The "Governor-General in Council" were given exclusive legislative powers. The act introduced a system of open competitions for the selection of civil servants. The East India Company rule was replaced by the British Crown in 1858 following the First War of Independence 1857. The British run the administration for 190 years till India became independence on 15th August 1947. With few changes in the names and jobs charts, the model of British bureaucracy continued in India post independence. It’s a constitutional bureaucracy of a welfare state is loyal to the Constitution of India. But the bureaucracy is made of humans does carry cultural burden of Indian heritage of castes and creed, though objective in principle turns subjective sometimes. 

It’s a hierarchical set up where officers are inducted at certain level grow higher up based on their performance reports and hearsay images. The Reporting Officer and Reviewing Officer have the right to evaluate their subordinate as the previous knows more from the first hand information and the later mostly dependent on the previous does keep check over subjectivity if any by the reporting officer. But other than these two, the rest are the lot of opinion builders through hearsay material sales fakelore of the market, make or mar the career of an officer. In a cadre of 300-400 officers, there are seniors, peers and subordinates. There are sub groups made of batches, regions or like minded individuals. Few of them may turn into कूथली केन्द्र, talk loose about other colleagues and spread false narratives of hearsay. One may argue that there is no smoke without fire, but true or false, an image builds of an officer other than his/her performance becomes a burden he/she carries in service and post retirement. 

The bureaucrats that way are more a bundle of colleagues rather than a group of friends. It is good to become colleagues so to become objective but its subjectivity through hearsay sometimes promote a rogue and discard aboveboard. One of the CMs used to say that PR works more than the performance in public administration. 


Punamchand 

3 January 2025

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