सावन का महीना आया, तो मुझे अपना बचपन याद आया।
जब काली घटा घिरे, धरती पर वर्षा बरसे और मिट्टी से सोंधी गंध उठे, पूरा भारत गा उठे - सावन को आने दो।
जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, कंठ में विष और कैलास पर समाधिस्थ महादेव। घनघोर रात, मथुरा का कारागार, उमड़ती यमुना और मध्यरात्रि में जन्म लेते कृष्ण।
मौन, तप और समर्पण; और प्रेम, आनंद और लीला का अनोखा संगम।
एक ओर आत्मा का भीतर उतरना, और दूसरी ओर जीवन का नृत्य करना।
अक्रिय और सक्रिय का अजब-ग़ज़ब मेल हे सावन।
मेरे घर।
माँ पूरे महीने उपवास करतीं, श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहतीं और श्रीमद्भागवत का पाठ करतीं। पिताजी मिल से लौटते ही घर में समूह-सा जम जाता। महाभारत का पाठ होता—वैशंपायन की वाणी की गूँज में महाभारत का विराट काव्य हमारे सामने जीवंत हो उठता। उसका वीर, हास्य, वात्सल्य और करुण रस मन को रसों के उतार-चढ़ाव में बहाते और सबसे बढ़कर, श्रीकृष्ण का विराट व्यक्तित्व मन पर छा जाता।
पठन के बीच चाय की चुस्कियों का अपना ही आनंद था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—वह केवल महाभारत का पाठ नहीं था; वह हमारे घर में संस्कार, कथा और भक्ति के उतरने का समय था।
वह सावन ही था, जब गरीबी और दुःख की गर्त में फँसे मेरे माता-पिता को एक साधु के आशीर्वाद ने जैसे उस अंधेरे से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया था।
सावन हमारे लिए केवल एक महीना नहीं था। सावन हमारा जीवन था।
मोहल्ले के चौक में उतरता कृष्ण
सावन आते ही हमारे मोहल्ले का चौक जीवंत हो उठता।
युवा घर-घर जाकर चवन्नी-अठन्नी चंदा जुटाते और मुरलीधर श्रीकृष्ण की एक सुंदर मूर्ति लाकर चौक में स्थापित करते। शाम ढलने के साथ ही मोहल्ले की महिलाएँ समूह में एकत्रित होतीं। गोल घेरा बनता और दो हाथों की तालियों के संगीत पर कृष्ण-भक्ति के गीत शुरू हो जाते। आगे की दो-तीन महिलाएँ गीत उठातीं और पीछे चल रही पूरी टोली उसी धुन को पकड़कर सुर में सुर मिला देती।
न माइक चाहिए था, न कोई वाद्य।
कंठों के मधुर स्वर और तालियों के ताल ही पर्याप्त थे।
धीरे-धीरे पूरा चौक उस सामूहिक गायन से भर उठता। लगता, जैसे भक्ति केवल मंदिर में नहीं, लोगों के कंठ से निकलकर पूरे मोहल्ले में उतर आई हो।
मध्यरात्रि के बाद जब गीत समाप्त होते, तब केले, चिवड़ा, नुक्ती और प्रसाद की थालियाँ सजतीं। ल्हाणी के लिए भी कई लोग बैठ जाते।
और हाँ, कुछ युवक अपनी-अपनी लैला के मजनू बने दूर बैठे रहते—भक्ति से अधिक किसी और दर्शन में मग्न!
कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव पूरी रात चलता।
सुबह होते ही मुरलीधर की मूर्ति को लेकर सब साबरमती की ओर निकल पड़ते। नाचते गाते हम विक्टोरिया गार्डन के पास नदी पहुँचते और मूर्ति के नदी विसर्जन के बाद ही व्रत खुलता और प्रसाद ग्रहण किया जाता।
कुछ लोग तो पूरे महीने एकटाणा रखते और अमावस्या के बाद ही उपवास खोलते।
आज सोचता हूँ—वह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। वह पूरे मोहल्ले को एक साथ बाँधने वाला सामुदायिक उत्सव था। घरों के बीच की दूरी मिट जाती थी और चौक सबका साझा आँगन बन जाता था।
सावन में ॐ नमः शिवाय।
कृष्ण के साथ सावन में शिव भी हमारे जीवन में पूरी तरह उपस्थित रहते।
सोमवार आते ही लोग पानी या दूध से भरे लोटे और बेलपत्र लेकर शिव मंदिर की ओर निकल पड़ते। मंदिरों में कतारें लगतीं।
मैं उन दिनों उस शिवलिंग को देर तक देखता रहता और मन ही मन पूछता—
“भगवान को पानी और दूध की क्या ज़रूरत?”
बचपन में पढ़ी एक कहानी भी याद आती है। स्कूल में कहीं बालक मूलशंकर—जो आगे चलकर स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए—की महाशिवरात्रि की घटना पढ़ी थी।
आधी रात के बाद मंदिर में अधिकांश लोग, जिनमें उनके पिता भी शामिल थे, सो गए, तभी मूलशंकर ने देखा कि कुछ चूहे शिवलिंग पर चढ़ रहे हैं और वहाँ चढ़ाए गए नैवेद्य को खा रहे हैं। वे शिवलिंग के ऊपर और आसपास निर्भय होकर घूम रहे थे। बालक मूलशंकर के मन में प्रश्न उठा—जिस शिव को सर्वशक्तिमान माना जा रहा है, जिनकी पूजा के लिए मैंने उपवास किया है और पूरी रात जाग रहा हूँ, वे स्वयं इन चूहों को क्यों नहीं रोकते?
मेरे बालमन में भी कुछ ऐसा ही प्रश्न उठता था। वह केवल बालसुलभ जिज्ञासा थी।
आज लगता है, शायद वही प्रश्न आगे चलकर धर्म को समझने की मेरी पहली सीढ़ियों में से एक था।
सावन—दो देव, दो रूप और एक रहस्य
आज जब सावन को पीछे मुड़कर देखता हूँ तो एक अद्भुत सांस्कृतिक चित्र सामने आता है।
एक ही वर्षा-ऋतु।
एक ओर शिव।
दूसरी ओर कृष्ण।
एक ओर शिवलिंग—अक्सर काले पत्थर का।
दूसरी ओर श्यामसुंदर कृष्ण की साँवली मूर्ति।
ऊपर आकाश में घनघोर काले बादल।
चारों ओर वर्षा।
कहीं शिवलिंग पर जलाभिषेक हो रहा है।
कहीं कृष्ण-जन्म की प्रतीक्षा में भजन गूँज रहे हैं।
कहीं “हर हर महादेव” है।
कहीं “नंद के घर आनंद भयो”, “जय रणछोड़ माखन चोर”,
एक ओर मौन और तप।
दूसरी ओर संगीत और उत्सव।
एक ओर कैलास का योगी।
दूसरी ओर वृंदावन का मुरलीधर।
और इन दोनों के ऊपर—वर्षा का वही श्याम आकाश।
तब लगता है, हम केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं जी रहे थे। हम अनजाने में हजारों वर्षों से चली आ रही उस भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा थे, जिसमें शिव का मौन और कृष्ण की बाँसुरी, तप और प्रेम, विरक्ति और अनुरक्ति—एक ही वर्षा-ऋतु में साथ-साथ साँस लेते हैं।
शायद इसी को संस्कृति कहते हैं—
जो केवल पुस्तकों में नहीं रहती,
घर में जी जाती है, चौक में गाई जाती है, मंदिर में चढ़ाई जाती है, और स्मृतियों में जीवन भर महकती रहती है।
सावन का महीना आया, तो मुझे अपना बचपन याद आया।
और लगा—
सावन सचमुच हमारा जीवन था।
१२ अगस्त २०२६
NB: पश्चिम भारत की अमांत परंपरा में महीना अमावस्या के बाद और उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा में पूर्णिमा के बाद शुरू होता है; इसलिए वही सावन के पर्व पश्चिम में सावन और उत्तर में सावन-भादों के क्रम में दिखाई देते हैं।
Excellent Sir
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