अन्नं ब्रह्म ।
अन्न केवल भोजन नहीं है—भारतीय दर्शन में यह स्वयं जीवन का आधार है।
तैत्तिरीय उपनिषद् की भृगुवल्ली अन्न के प्रति हमारे दृष्टिकोण को एक व्रत के रूप में प्रस्तुत करती है—
“अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्।” (3.7)
अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिए—यही व्रत है।
“अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्।” (3.8)
अन्न को अस्वीकार नहीं करना चाहिए—यही व्रत है।
और फिर अन्न के स्वरूप को इससे भी गहरे अर्थ में समझाया गया है—
“अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।
अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।
अन्नेन जातानि जीवन्ति।
अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति।” (3.2)
“अन्न ही ब्रह्म है”—ऐसा जानना चाहिए।
क्योंकि समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न से ही जीवित रहते हैं और अन्ततः अन्न में ही समा जाते हैं।
हजारों वर्ष पहले उपनिषद् ने जो बात कही, उसका सार आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
अन्न का अपमान केवल भोजन का अपमान नहीं; वह जीवन के आधार का अपमान है।
इसलिए अन्न का सम्मान करो, अन्न को व्यर्थ मत जाने दो और किसी को अन्न से वंचित मत करो।
अन्नं ब्रह्म।
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