Tuesday, May 10, 2022

Guru is a donor

 आत्मज्ञान दानी गुरू की योग्यता। 


दो बात सीखी थी। गुरू शिव तुल्य (जैसा) हो और दानी हो। आत्मज्ञान का दान दे। साक्षात्कार करायें। 


कैसे पहचानें? क्या होगी योग्यता?  


कहाँ है वहः


जिसका अपनी पूर्णावस्था में रहना नित्य व्रत है। 


जो अखंड अजपा हंसः जप में अवस्थित है। 


जो निज शक्ति चक्र पर आरूढ़ है। 


जिसने ज्ञानेंद्रियो और कर्मेन्द्रियों पर विजय पा लिया है। 


ऐसा गुरू दृष्टि, स्पर्श, वाणी या संकल्प से स्व का ज्ञान करायेगा। 


जो हमें नया नेत्र देगा जिससे हमारी भेद दृष्टि अभेद हो जायेगी। 


जो अविपस्थ है। अविप यानी, जो पशु की रक्षा करे।


पशु अर्थात् हम जीव जिन पर पशु मातृका का बंधन है, अशुद्धि जमी है, ज्ञान संकोच हुआ है, पाँच चक्र का संकोच है (वामेश्वरी, खेचरी, गोचरी, दिग्चरी, भूचरी)। खेचरी ने प्रमाता, गोचरी ने अंतःकरण, दिग्चरी ने बहिर्करण और भूचरी ने जगत को संकुचित किये है। हमारी दृष्टि पर संकोचन के चश्मे चढ़े है। जिससे संसार वामाचार यानि विपरीत चल रहा है। 


खे का अर्थ होता है गगन। कितना विशाल है? असीम। पर खेचरी के प्रभाव में हमने उस आकाश को अपने शरीर जितना छोटा संकुचित घटाकाश बना दिया है। संकोचन हमारी पसंद है इसलिए बंधन का दुःख है। 


गो अर्थात् अंतःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार)। गोचरी के प्रभाव में बुद्धि में अभेद के बदले भेद का निश्चय हुआ है। संकुचित अभिमान से अपने परमार्थिक पूर्ण स्वरूप को छिपाकर संकुचित बने है। 


दिक् अर्थात् दिशायें। दिग्चरी के प्रभाव में हम पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ से पाँच विषयों शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध को भेद बुद्धि से ग्रहण करते है। अभेद का संकुचन बना है। 


भू अर्थात् पंच महाभूत से बना बाह्य जगत। भूचरी का प्रभाव हमें वस्तुओं की विविधता से हमें मोहित और भ्रमित कर देता है। मर्यादित आयु में जो चुनना है उसे छोड़ वस्तु पदार्थ की प्राप्ति और माल्कियत के दौड़ में असंतोष और ईर्ष्या से भर गया है।  


वह जिसने उपर दर्शायी पाँचों शक्ति पर नियंत्रण किया है वह जो खे अर्थात् पूर्ण गगन में व्याप्त अखंड चेतना में चिन्मय आत्मरूप से विचरण करता है (खेचरी); जिसके अंतःकरण में अभेद का निश्चय किये हो (गोचरी); जो सभी दिशाओं में अभेद देखता है (दिग्चरी); जो समस्त विश्व को अपना अंग मानता हो (भूचरी) और चारों के मूल वामेश्वरी पर जिसका नियंत्रण हो, जिससे संसार का वामाचार नहीं पर दृश्य विश्व जिसका प्रकाशन है ऐसी एकता नवी है।वही योगी गुरु आत्म दान का अधिकारी है। हमें पशुता के बंधन से मुक्त कर हमारी रक्षा करता है। 


जो भेद दृष्टि को अभेद में बदल स्व की पहचान (प्रत्यभिज्ञा) कराता है। परतंत्र शक्ति से बंधे हमें जो हमसे मिला दे, सच्चे स्वरूप में स्थापित करे, जो पशुता से हमारी रक्षा करें वही ज्ञान देने का, साक्षात्कार कराने का अधिकारी है। 


वो जो खुद है वह हमें बना देता है। स्व प्रकाशन करा देता है। उसकी और हमारी आत्मा एक है इसलिए साक्षात्कार भी एक ही हो जाता है। 


ऐसा शिवतुल्य योगी, जो प्रकाश रूप है, जो यह विश्व को अपनी ही शक्ति की स्फार विस्तार जानकर उस विमर्श बोध में अवस्थित है, जो घनीभूत विश्व को क्रिया शक्ति के स्फूरित हो रहे विकास जानता हो, जिसके पास पूर्ण दृष्टि हो, जो मृत्युंजय भट्टारक है वही गुरू है जो आत्मज्ञान के दान का अधिकारी है। 


पहचानोगे? 


जिसके पास जाते ही मन, प्राण सम हो जायें। विकल्प नष्ट हो जायें। संशय समाप्त हो जायें। जिसमें विश्वास हो जायें। 


पूनमचंद 

६ मई २०२२

Not to remove the world

 जो है उसे हटाना नहीं है। 


अक्सर हम गलती कर बैठते है। जो दिखता है उसके बाहर दूसरा कोई चमत्कार रंग दृश्य देखना चाहते है जो हमारी कल्पना या बार-बार दिये संस्कारों में हो। अब किसी के सामने खाने का थाल परोसा हो और वह उसे खाकर आनंदित होने के बदले दूसरे किसी थाल की प्रतीक्षा करें यह कैसा? शिव और उसका शिवत्व कहीं खोया नहीं है। हमारे आसपास, हम खुद उसकी विमर्श के रूप में देदीप्यमान है। इसलिए यहाँ किसी को हटाकर नया कुछ लाना नहीं है। जो है उसे नई नज़र से देखना है। हटाना कुछ भी नहीं है अपितु समावेश बढ़ाना है। सर्व समावेश तक पहुँचना है। तभी तो जाकर शिव वृत्ति, ब्रह्म वृत्ति बनेगी। जब तक वृत्ति बढ़ी नहीं, आँचल फैला नहीं तब तक कैसे धारण करोगे, अपने शिव स्वरूप को। 


सर्व समावेश ही पूर्णाहंता की चाबी है। सिद्धि चमत्कार सब बाय प्रोडक्ट है, लक्ष्य नहीं। 


पूनमचंद 

६ मई २०२२

५.५० AM

शुद्ध विद्या।

 शुद्ध विद्या सत्व सिद्धि। 


शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः। (शिवसूत्र.२.२१)


शिव से भूमि पर्यंत अवरोह क्रम से बनी यह ३६ तत्वो की शिवलीला का उपर से पाँचवा पड़ाव है शुद्ध विद्या। नीचे सकल, प्रलयकल, विज्ञानाकल को पार कर प्रमाता माया क्षेत्र को लांघकर जब शुद्ध विद्या क्षेत्र में प्रवेश करता है तब उसकी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा का दिव्य प्रारंभ होता है।


छठ्ठा माया तत्व यहाँ मिथ्या या असत्य नहीं है। परंतु जगत योनि के रूप में है, जिसके द्वारा चैतन्य शिव खुद को अनेक रूपों में विभाजित करके भौतिक रूप में प्रकट हुआ है। माया योनि से एक अनेक बन व्यवहार के लिए एक दूसरे में भेद हो खड़ा है।  


सांभवोपाय, शक्ति उपासना से शुद्ध विद्या पड़ाव

पर पहुँचते प्रमाता में ज्ञान संकोच हटता है और अहमेव सर्वम् का ज्ञान होता है जिससे भेद में अभेद का दर्शन होना शुरू हो जाता है।एक ही शक्ति के स्पन्दन में सारा विश्व है, और शिव का यह विमर्श मैं ही हूँ यह अनुभूत होता है। क्रिया शक्ति का अनुभव होता है। मंत्र देवता है इसलिए मंत्र सिद्धि से सिद्धियाँ प्राप्त होती है। समस्त पारमेश्वरी शक्तिओ के चक्र का स्वामी बन जाता है। महामंत्र वीर्य बल आता है। 


शुद्ध विद्या के आगे ईश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिव चार भूमिका है। जिसमें अलग अलग भूमिका में इदम और अहम् की एकता सिद्ध होती है। आख़री में रहता है अहम्, पूर्णाहंता। 


आज सुबह के सत्र में एक मंत्र मिला; हं-सः, हं-सः। शक्ति मंत्र है। माया क्षेत्र लांघकर शुद्ध विद्या क्षेत्र में प्रवेश करा सकता है। चढ़ाई है इसलिए जो चलता रहेगा वह पहुँचेगा। मंत्र को चलाना पड़ता है। जो मंत्र चलायेगा, सिद्धि उसके कदम चूमेगी। हालाँकि सिद्धि उपादेय नहीं। लक्ष्य तो है समदर्शन, शिवत्व, पूर्णाहंता। 


चरैवेति चरैवेति। 


पूनमचंद 

६ मई २०२२

Third Eye

 एक आँख जो कभी बंद नहीं। 


स्वशक्तिप्रचयोડस्य विश्वम्। (३०)

स्थितिलयौ। (३१)

ततप्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात्। (३२)

सुखासुखोबहिर्मननम्। (३३)

तद्विमुक्तस्तु केवली।  (३४)

(शिवसूत्र ३.३०-३४)


अपना निरीक्षण करें। 


आप कौन हैं? 


एक तो जो नाम दिया है वह शरीर। दूसरा उस शरीर की चेतना। एक सीमित, दूसरा असीम। असीम के आँचल में सीमित प्रकाशित हो रहा है। एक कैनवास स्क्रीन और दूसरा उस पर चित्र। जीवन व्यवहार सीमित में पर उसका बैकग्राउंड प्राण चेतना। 


आपमें कौन है जो मुक्त है क्योंकि अपने विस्तार का अनुभव करता है? जिसमें कभी कमी नहीं होती? 


जो नित्योदित है। जिसमें सृष्टि स्थिति लय, जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति, भूत वर्तमान भविष्य हो रहा है। जिस के पर्दे पर यह सब चित्र प्रकाशित, उदित-स्थित-लय हो रहे है पर वह चेतन पर्दा अंचल है, स्थिर है, सतत है, अखंड है। अविद्या का प्रपंच जिसमें उदित और अस्त हो रहे है पर वह नित्योदित है।जिसका कभी अभाव नहीं। 


आप पूर्ण हो। तीनों स्थिति का प्राण चौथा तुरीय आनंद हो। स्थिति बदलेगी पर आप बिना कटे निश्चल, प्रशांत, अटल और पूर्ण  एक हो। तृप्त हो। उत्साह, ऊर्जा, उच्छलता हो। कर्ता-कार्य, ज्ञाता-ज्ञेय, प्रमाता-प्रमेय, उपाय-उपेय अवस्थाओं का युगपद् आप एक ही हो। 


अखंड चेतना हो। 


वो बोध हो जो सब को जानता है। उस जानने वाले को जानो। 


प्रमेय भी आप हो और प्रमाता भी आप। आप की रोशनी में तो सब कुछ प्रकाशित हो रहा है। आप ही object or subject दोनों बन प्रकाशित हो रहे हो। एक ही अनेक बन प्रवृत्त हो। 


आप स्वयं हो। 


उस आप में जीएँ। उस अखंड में जीएँ। उसके लिए जीएँ। कार्य होने से या नहीं होने से, कुछ मिलने से या नहीं मिलने से, क्या आप चले गये? क्या आप नष्ट हुई? आप हमेशा हो। 


मैं हूँ यह बोध कभी गया नहीं।


प्रार्थना करें कि यह ज्ञान ठहर जायेः 


“मैं अनुत्तर का अमृत कुल हूँ, अमृत से लबालब भरा हृदय हूँ। मेरा हृदय सतत विकसित हो, विस्फारित हो, जिससे सतत अमृत टपकता रहे।” 


उस अखंड चेतना समुद्र का अंतर्मुख होकर अभ्यास करें। उस चेतन पर्दे पर प्रकाशित हो रहे सृष्टि-स्थिति-लय, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति के चित्रों में अखंड तुरीया जोड़कर उसका आनंद लें। 


उस चेतना से सतत जुड़े रहने का अभ्यास करें। स्वाध्याय करें। अखंड ध्यान बनाये रखें। 


मोह लोभ, सुख दुःख, विकल्पों का खेल सब खंडित में हो रहा है। आप उस निश्चल, प्रशांत, अखंड से जुड़े रहो। प्रशांति जाती नहीं। यह दृश्यमान विश्व आपकी शक्ति का ही विस्तार है।


सृष्टि-स्थिति-लय तीनों एक साथ चेतना में घटित हो रहे है उसका अवलोकन करें। एक चित्र बनता है, कुछ स्थिति बनती है, फिर दूसरा चित्र सामने आते ही प्रथम का लय हो जाता है। वैसे ही साँस आता है, ठहरता है, जाता है, ठहरता है। जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति में भी अवस्था बदलेगी पर एक अखंड संविद बना रहेगा। वैसे ही विचारों का है। वैसे ही व्याख्यान के दौरान हमारे ध्यान का है। प्रवचन के बीच चिंतन में चले गये तो प्रवचन का प्रवाह छूट जाता है। यह आवन जावन ठहरन निज संविद में ही तो हो रहा है। उस चेतना की सतह को पहचाने। यह सब खंड खंड हो रहे चित्रों-घटनाओं-अवस्था-स्थिति के मध्य पर ध्यान दे। तैल वत उस तुरीय पर अनुसंधान रखे। वही मध्य समाधि है। वह तुरीय खंडों को जोड़ रख अखंड का आस्वादन करायेगा। साक्षात्कार होगा, अखंड चेतना का। अपने सच्चे स्वरूप का। अमृत का।शरीर जायेगा पर मैं नित्योदित की कभी मृत्यु नहीं, वही मृत्युंजय का मिलन होगा। अपना खुद का खुद से मिलन। 


सत्संग चेतना पर लिखें। बीज बनकर रहेगा तो एक दिन फल बनकर प्रकट होगा। अपनी चित्त ज़मीन की जाँच करो। उसे उपजाऊ बनाओ। उसमें से अविद्या के खर पतवार निकाल, अखंड चेतना के बीज को धारण कर अपने भीतर अवस्थित हो जायें। 


अपने होने की नित्य अनुभूति आप को है। 


आप के होने का आपको क्या सबूत चाहिए? 


आप वो संविद शक्ति हो जो सतत विद्यमान है। अपना होना कभी नहीं बदला। मैं हूँ यह बोध कभी नहीं गया। जो होने या न होने को जानता है, जो अच्छा लगा बुरा लगा दोनों को जानता है, जो कुछ समझ में आया कुछ समझ में नहीं आया का जानता है, जो मुझे हिन्दी आती है पर रशियन नहीं आती को जानता है, वह जो सब जानता है वही अखंड चेतना मेरा सत्य स्वरूप है। वही मेरी प्रत्यभिज्ञा है। 


मैं शरीर और मैं चेतना, एक पर्दा एक चित्र, दोनों को एक कर देखो। शोधन करते जाये। विचार, विकार, भाव उठे बैठे उसको देखते रहिए और अपने “सर्वम् शुद्धम् निरालंबन ज्ञानम् स्वप्रत्ययात्मकम” आत्मा को देखकर पहचानें। संशय रहित होकर देखें। reveal and perceive. 


साक्षात्कार अभी इसी क्षण। 

आप आपसे (चेतना) दूर कहाँ? 

आप ही हो अमृतसर। 


उस आँख को पहचानो जो कभी बंद नहीं हुई। 

उस दृष्टि को पा लो जिसके बाद और कोई नज़र की ज़रूरत न हो।


जीवन पूर्णता से जीएँ। 

वर्तमान में जीएँ। 

अखंड आत्मरूप से जीएँ। 


उस आदर्श योगी, अंजन शलाका, आत्मज्ञान के दानी, नई दृष्टि-नज़र-आँख-विद्या देनेवाले गुरू को नमन हो। उसके चरण कमल में मेरा आश्रय हो। 


जिसने प्राप्य को प्राप्त कराया; मेरे “अखंड चैतन्य“ स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा (पहचान) कराई; वह गुरू, वह शक्ति, वह शास्त्र, वह अंतर्गुरू को नमन हो। 


उनको नमन हो जिसने चेतना के ज्ञान संकोच को दूर कर अखंड बोधरूप चेतन पर्दा दिखा दिया।


🕉गुरूभ्यो नमः। 


पूनमचंद 

७ मई २०२२

Character of a Siddha

 प्रश्न.१ सिद्धयोगी के लक्षणों की सूचि बनाये। 


शिवतुल्यो जायते। (२५)

शरीरवृत्तिर्व्रतम्। (२६)

कथाजप। (२७)

दानमात्मज्ञानम्। (२८)

योડविपस्थ ज्ञाहेतुश्च। (२९)

स्वशक्तिप्रचयोડस्य विश्वम्। (३०)

स्थितिलयौ। (३१)

ततप्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात्। (३२)

सुखासुखोबहिर्मननम्। (३३)

तद्विमुक्तस्तु केवली।  (३४)


सिद्व शिवयोगी के लक्षण इस प्रकार है। 


१) शिव की पंच शक्ति से युक्त वह शिव तुल्य है।

२) उनकी शरीर संबंधी क्रियायें (स्नान, पान, भोजन, आराम इत्यादि) व्रत है। 

३) वह जो भी बोलते है, जप है।

४) वह आत्मज्ञान का दान करता है।

५) शक्ति चक्र पर शासन से खेचरी आदि शक्तियाँ उसके अधिनियम में होने का अनुभव रखता है। 

६) विश्व को स्व शक्ति के आधिक्य में मानता है। 

७) संसार की स्थिति और लय अपने आधिक्य में देखता है। 

८) विश्वमय रहते हुए अपने विश्वोर्तीर्ण स्वरूप से च्युत नहीं होता। 

९) बाह्य पदार्थों की तरह अंदर के सुख दुख इत्यादि भावो पर तटस्थ रहता है।

१०) केवल चिन्मात्र प्रकाशरूप में अवस्थित रहता है। 


प्रश्न.२ 


सूचि में किसी एक बिंदु पर ध्यान रखते हुए अभ्यास करें। 


पूर्णाहंता का स्वरूप ज्ञान करना है इसलिए बुद्धि को चैतन्य आत्मा स्वरूप का ठोस निश्चय कराना है। बार बार उसका जागरूकता से अमल करना है। बाह्य पदार्थों की तरह अंदर के सुख दुःख काम क्रोध इत्यादि के प्रति तटस्थ भाव बनाये रखना है। हंसः हंसः अजपा जाप के प्रति जागरूक रहना है। चेतना के पर्दे पर पिक्चर में भी पिक्चर के खेल को तटस्थ भाव से देख एक चैतन्य में सबको समावेश करना है।


हम जड़ शरीर और चेतना की जोड़ है। दोनों के परस्पर तादात्म्य और तीन पाश (मल) से जीव-पशु-अल्प-बद्ध शिव बने है। इसलिए पूर्ण अहंता में स्थित नहीं होते तब तक पूर्ण मुक्त जागरण से चलते रहना है। 


प्रश्न ३. सहजानंद में निमग्न रहने किस बात का ध्यान रखेंगे। 


मैं चैतन्य हूँ यह बात कभी नहीं भूलना है। विशेषण हटाकर सामान्य स्थिति में रहना है। बाह्य की तरह आंतर-तरंगों के प्रति तटस्थ रहना है।जागरूक  रहकर चैतन्य समुद्र छोड़ना नहीं है। विश्व मेरा ही शरीर है, मेरा ही विस्तार है ऐसे देखना है। अनुभूत करना है। 


बड़ा कठिन है विश्व को मैं स्वरूप देखना। जिसको देखे, एक व्याख्या पूर्वाग्रह बना हुआ है। इस दिवार को तोड़े बिना चेतना का विस्तार हो नहीं सकता। सबको स्वीकार ना है और वह मैं हूँ यह अभ्यास दृढ़ करना है। अन्जान के लिए सरल है। कसौटी जानने वालों की है। क्योंकि वही तो हमारा जगत है, जो बनाया है हमने ज्ञान संकोच से। 


पूनमचंद 

८ मई २०२२

Sahajananda

 सहजानंद। (शिवयोगी लक्षण)


चिन्मय आत्म स्वरूप में स्थित शिवयोगी की 

ब्रह्ममयी स्थिति लक्षण से पहचानी जाती है।सभी सूत्रों को जोड़कर पढ़ने से ल़क्षणो का बोध होता है। आज शिवसूत्र २५-३४ का समूह लेते है।


दस सूत्र दस लक्षण। 


शिवतुल्यो जायते। (२५)

शरीरवृत्तिर्व्रतम्। (२६)

कथाजप। (२७)

दानमात्मज्ञानम्। (२८)

योડविपस्थ ज्ञाहेतुश्च। (२९)

स्वशक्तिप्रचयोડस्य विश्वम्। (३०)

स्थितिलयौ। (३१)

ततप्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात्। (३२)

सुखासुखोबहिर्मननम्। (३३)

तद्विमुक्तस्तु केवली।  (३४)

(शिवसूत्र ३.२५-३४)


शिवयोगी के लक्षण इस प्रकार है। 


१) सहज विद्या के उदय से शिव की पंच शक्ति से युक्त वह शिव तुल्य है। जिससे वह अन्य जीवों को पाश (मल) से मुक्ति देने में समर्थ है।


२) जीवन मुक्ति की दशा में उसके शरीर संबंधी क्रियायें (स्नान, पान, भोजन, आराम इत्यादि) व्रत बन जाते है। 


३) वह जो भी बोलते है, जप बन जाते है। अहं विमर्श का शाक्त जाप, सोहम् अजपा जाप, हंसः हंसः नित्य जाप या सदैव प्रणव तत्व विमर्शन का निष्कल जप। 


४) योग्य साधक को वह आत्मज्ञान का दान करते है। बंधनों क्लेशों से उसकी रक्षा करते है। 


५) सहज विद्या उदय से शक्ति चक्र पर शासन करता हुआ खेचरी आदि का स्वामी बन, सब शक्तियाँ उसके अधिनियम है ऐसा अनुभव करता है, और पशु मातृका शक्तिचक्र बंधन से साधक की रक्षा करता है। 


६) विश्व को स्व शक्ति का विस्तार या बहिर्मुख परिस्पन्द मानकर सृष्टि-संहार कर सकता है। 


७) संचार और लय दोनों स्थितियों को अपनी स्व शक्ति के प्रचय (आधिक्य) के रूप में देखता है।


८) अपनी इच्छा से विश्वमय (सृष्टि स्थिति लय) होते रहने पर भी अपने विश्वोर्तीर्ण, शुद्ध-स्वतंत्र-प्रमातृभाव से च्युत नहीं होता। 


९) बाह्य नील घट आदि पदार्थों की तरह अंदर के सुख दुख इत्यादि को खुद चैतन्य से अलग कर तटस्थ भाव रखता है। उसे अपने पर आरोपित कर विशेषता नहीं बनाता। सामान्य चेतना भाव बनाये रखता है। द्वैत ख़त्म कर पूर्ण स्थिति में रहता है। 


१०) जो केवल चिन्मात्र प्रकाशरूप में अवस्थित रहता है और जीवन मुक्त है।


घृत्वा द्वैत महामोहम् घृत्वा ब्रह्ममयी स्थिति। 

लौकिके व्यवहारेડपि मुनिः नित्यम् समाविशेतः। 


द्वैत महामोह को काटा?

एकत्व (ब्रह्ममयी स्थिति) बना? 

मनन कर मुनि बने?

नित्य समावेश हुआ?


पिक्चर के भीतर पिक्चर का भेद खुला? 

अभेद अनुभव किया? 


अगर शुद्ध चेतना में तैरना शुरू किया तो सहजानंद है। लक्षण प्रकट होंगे। 


पहचाने, कुछ बना क्या? 

पता लगा लें, कहाँ क्या कमी है। 


आप हो चैतन्य अखंड अमृत, फिर भी चेतन के पर्दे पर शरीर के अंदर और शरीर के बाहर का जगत खड़ा कर ज्ञान संकोच से बंधन का अनुभव कर रहे हो।


क्या वह बंधन कटा? 

चैतन्य समुद्र में अपने आपको फेंका क्या? 

क्या उस अखंड चेतना में खुद को बैठाया? 

पूर्णता का अनुभव हुआ? 

क्या निज स्वरूप पहचाना? 


परीक्षा लीजिए खुद की। 

लक्षण परीक्षण करें। 


जैसे बाह्य जगत की चीज वस्तुओं पदार्थ को अलग मानकर उसे जाननेवाले आप उससे भिन्न है वैसे ही आंतरिक जगत जिसमें सुख, दुःख, काम, क्रोध, मंद, लोभ, मोह, राग, द्वैष इत्यादि अनुभव हो रहा है क्या उसको भी बाह्य जगत की तरह अलग कर देख नहीं सकते? जैसे ही अलग किया उसकी असर से, उसके बंधन से आप मुक्त हो गये। आप अपने समत्व स्वभाव में क़ायम रहेंगे। पूर्ण हो, पूर्ण बने रहोगे। सामान्य हो, जैसे विमुक्त हुए, विशेषण का पीछा छुड़ाया, अखंड में अवस्थित हो गये। शरीर से मुक्त आत्मस्थ। 


सहजानंद का स्पर्श हुआ तो छूटेगा नहीं। 


दूर दीपक के जलने से बार नहीं बनेगी, अनुभूत करो। 


नर्तक आत्मा कैसे खेल रहा है, निहारों। पूर्ण जागरूकता से देखो। 


शरीर चैतन्य का जो फेविकोल जोड़ बना है उसमें से चतुराई से, बुद्धि की सूक्ष्मता से पृथक कर असली भाग चैतन्य में आसन ज़माना है। 


वहाँ न सुख है न दुःख। ग्राह्य-ग्राहक, वेद्य-वेदक, ज्ञेय-ज्ञाता, उपाय-उपेय, सबको अपनी चेतना में देखो। प्रमेय-प्रमाता की भूमिका से उपर उठ subjective consciousness से बाहर आकर objective consciousness (सर्वात्मक), प्रमातृ दशा में ‘मैं चेतनरूप हूँ’, और सुख दुःख इत्यादि चलचित्र है जो आते जाते रहते हैं, पर मैं अटल अखंड सहजानंद में स्थित हूँ, ऐसे बोध में स्थित हो जाए। 


सहज विद्या पाये। 

सहजानंद बने। 


हो ही.. पता बताया है, पहुँचना है।  


पूनमचंद 

८ मई २०२२


NB: सिर्फ़ दूसरे लक्षण पर ही ठहर मत जाना। 😜


सन्तो, सहज समाधि भली।

साँईते मिलन भयो जा दिन तें, सुरत न अन्त चली।।

आँख न मूँदूँ काम न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।

खुले नैन मैं हँस हँस देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।।

कहूँ सो नाम सुनूँ सो सुमिरन, जो कछु करूँ सो पूजा।

गिरह-उद्यान एकसम देखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।।

जहँ जहँ जाऊँ सोई परिकरमा, जो कछु करूँ सो सेवा।

जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, पूजूँ और न देवा।।

शब्द निरन्तर मनुआ राता, मलिन बचन का त्यागी।

ऊठत-बैठत कबहुँ न बिसरै, ऐसी तारी लागी।।

कहैं कबीर यह उन्मुनि रहनी, सो परगट कर गाई।

सुख-दुख के इक परे परम सुख, तेहि में रहा समाई।।

कौलिक सिद्धि।

 कौलिक सिद्धि। 


अनुत्तरं कथं देव सद्यः कौलिकसिद्धिदं |

येन विज्ञातमात्रेण खेचरी समतां व्रजेत्||


वो अनुत्तरं क्या है जिसके जानने मात्र से कुल की शक्ति प्राप्त होती है? संपूर्ण अस्तित्व का साक्षात्कार होता है। अहं का साक्षात्कार होता है। 


अहं कहते ही साक्षात्कार। 

एकत्व। समत्व। ब्रह्मभाव। पूर्णभाव।  


दृष्टि बदल गई?


आचरण बदल गया? 


मैं और मेरा अनुभव, मैं और बाह्य जगत, मैं और आंतरिक जगत, मैं जोड़कर अनुभव हो रहा है? यह तो भेद दर्शन है। 


सुख दुःख की अनुभूति कैसे कर रहे हो। मैं सुखी, मैं दुःखी ऐसे, या मेरा सुख, मेरा दुःख। जैसे बाह्य जगत को मेरे से अलग करके देखते हो, अनुभूत करते हो वैसे ही अंतर्जगत को भी अलग करके देखो। 


व्यक्ति चेतना विशेष भाव है। वैश्विक चेतना सामान्य भाव है। विशेष भाव में काटकर अनुभव होता है, सामान्य भाव में काटना नहीं है। चेतना अखंड पट पर बनी रहेगी। और उस कैनवास पर सुख, दुःख, अच्छा विचार, बुरा विचार, उठते रहेंगे और लीन होते रहेंगे। 


बस यहीं पर बुद्धि का री-प्रोग्रामिंग करना है। बुद्धि को संस्कारित करना है। क्योंकि निश्चय बल बुद्धि में है। एक बरा बुद्धि ने निश्चय कर लिया के मैं चेतना हूँ, शरीर नहीं बस काम हो गया। मैं यह सुख दुःख अनुभव कर रहा हूँ ऐसा सोचते ही चेतना और दृश्यमान object अलग हुआ। उसकी असर कम हो जायेगी। जैसे बाह्य के नील (वस्तु इत्यादि) को देख रहे हो वैसे ही भीतर के पीत (सुख दुःख इत्यादि) देखो। अलिप्त हो कर, अखंड चेतना में अवस्थित होकर देखना है। सम्यक् वेदन करें। मेरे में सुख दुःख, काम क्रोध इत्यादि लहरें उठ रही हैं और बैठ रही है। मैं चैतन्य हूँ, चिन्मय हूँ। 


परम दृष्टि पानी है। सीमित अहंता से बाहर निकलना है। मैं आज सुखी और कल दुःखी कैसे हो सकता हूँ। मेरी चेतना में मेरा शरीर प्रकाशित है। वैसे ही शरीर में उठनेवाले भाव विकार प्रकाशित हो रहे है। एक पिक्चर शरीर और उसमें दूसरा पिक्चर विकार। बस इस पिक्चर में चिपक के व्यवहार हो रहा है या अलग होकर यही कसौटी है। 


क्या चयन है? 

विशेष का या सामान्य का? 

परतंत्र का या स्वातंत्र्य का? 

संकुचन का या विस्तार का? 


चेतना स्वातंत्र्य है, असीम है, मुक्त है, एक है। 


एक है उससे एक होने में देर किस बात की?


प्रतिबंध खोजिए, पहचानिए और दूर कीजिए। 


हम जड़ शरीर और चेतना का जोड़ है। दोनों के परस्पर तादात्म्य और तीन पाश (मल) से जीव-पशु-अल्प-बद्ध शिव बने है। अपने स्वभावरूप पूर्ण अहंता में स्थित नहीं होते तब तक पूर्ण मुक्त नहीं कहा जाता। यह अवस्था है और उसके प्राप्ति क्रम है। 


बस एक ही काम करना है। 


मुक्ताभ्यास करना है। 

चलना है। 

चैतन्य जागरण से चलना है। 

जागरण गुरू देगा, या मंत्र देगा, या अंतर्गुरू, या शिव अनुग्रह। 

शिवत्व लाभ की ओर चलना है। 


अपूर्ण से पूर्ण की ओर। 

अविद्या से विद्या की ओर। 

परतंत्रता से स्वातंत्र्य की ओर। 

अनेक से एक की ओर। 

मृत्यु से अमृत की ओर। 

अंधकार से प्रकाश की ओर। 

लघुता से गुरूता की ओर। 

संकोचन से विस्तरण की ओर। 


कौलिक सिद्धि पानी है, जहां पूरे कुल समूह को एक अखंड चेतना में समाहित कर समदर्शन करना है। 


नेत्र बदलना है। तीसर नेत्र पास है। बस खोलना है। 


नज़र का धोखा हुआ है। बुद्धि की नज़र बदलनी है। 


यथा मति तथा गति। 


नज़रें बदली तो नज़ारे बदल जायेंगे। 

किस्ती ने बदला रूख तो किनारे बदल जायेंगे। 


पूनमचंद 

८ मई २०२२

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