Wednesday, September 13, 2023

Bharat is ancient

Bharat is ancient


The name भरत first referred in Rigveda as Bharata (भरता), means one who nurtures. दण्डाइवेन्द्रोअजनास आसन्परिच्छिन्ना भरता अर्भकासः। अभवच्च पुरएता वसिष्ठ आदित्तृत्सूनां विशो अप्रथन्त। (RV.7.33.6). The Bharata (भरता) tribe were inferior and shorn of their possession like the staves for driving cattle; but Vasiṣṭha joined them with his men (tritsu) as priest, with whom their (Bharata) strength increased.


As per the story of Rigveda Indra with the help of the divine power of Sage Vashishtha (and his men Tritsu) saved King Sudas. Sudas fought a battle against ten kings on the bank of river Parushni (probably Ravi) and became victor. It suggests that India was a land of Bharata and other tribes but the kings of Bharata tribe succeeded in establishment of their kingdoms over North India, therefore, the land of Aryavarta got the name Bharata (भरता). 


The son of King Dushyant and Shakuntala in this race was named Bharat (भारत) who became very famous. Kauravas and Pandavas were descendants of this Bharat King/tribe. The word Bharat is used 22 times for the descendants of Bharat in Gita of Mahabharata. Sanjay used it twice for addressing Dhritraashtra and Shre Krishna used it 20 times for Arjuna. Bharat (descendant of Bharat) was used in verses 1.10 and 1.24 for Dhritraashtra and in verses 2.14, 2.17, 2.28, 2.30, 3.25, 4.7, 4.42, 7.27, 11.6, 13.3, 13.34, 14.3, 14.4, 14.8, 14.9, 14.10, 15.19, 15.20, 16.1, 16.3, 16.3, 18.62 for Arjuna. 


Vishnu Purana has described a geographical location as Bharat. It reads, उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥meaning, the country that lies to the north of the ocean and to the south of the snowy mountains is called Bharata as there dwell the descendants of Bharat.


Vedas were composed between 1200 to 1500 BCE. Mahabharata was composed between 3rd century BC to 3rd Century AD. Vishnupuran was estimated to be composed between 1st century to 9th century AD. 


All the three sources are in Sanskrit. Linguistically, Vedas were written in Vedic Sanskrit (invented 12-15 centuries BCE) and Gita and Vishnu Purana were written in Classical Sanskrit (invented 4th century BCE). Therefore, the name of this country as Bharat, as descendants of Bharat or the land between the mountains and ocean/sea is very ancient. 


Punamchand 

13 September 2023

Saturday, September 9, 2023

Sanatana-eternal

 Sanatana-eternal 


There is lot of uproar and debate on Sanatana Dharma in India. In physics and chemistry, the law of conservation of energy states that the total energy of an isolated system remains constant; it is said to be conserved over time. Energy can neither be created nor destroyed; rather, it can only be transformed or transferred from one form to another.


Indian Philosophies (Darshanas) believe in the eternity of the existence as union of Purusha and Prakriti. We believe in the eternity of Universal Soul (Ishwara) and Individual Soul (Jeeva). We believe in rebirth theory by evolution of the life in 8.4 million species excelled from fish to Human on the earth. 


As nothing can be destroyed, we believe that the individual soul travels from one body to another. But to justify the inequality of one’s physical, mental, social and cultural state in present birth, the ancient sages propagated the theory of karma (action) and declared that the difference is as an outcome of our actions in previous births. We have been told to be careful of the actions in present life so that we can improve upon our status of life in next birth. If somebody wants to quit the cycle of birth and rebirth, there is a path of renunciation, to acquire knowledge of true self and merge into the universal soul the Ishwara. The eternity of the soul/energy therefore doesn’t destroyed in Indian Sanatan Dharma. But who can prove that the varnas, castes, social customs, rituals, etc, are eternal? None. 


How great is the creation of the earth with biosphere and an average temperature of 17 degrees Celsius that life exists. We are yet to find traces of life on other planets. But in spirituality, all celestial objects are considered as body of the Supreme and therefore there is life in each one of them. The Universe/s are the limbs and the expansions and contractions of it/them is the play of the Almighty. 


Therefore, what is eternal, it can’t be destroyed. The Indian darshanas believe in this eternality of God and its creation, and it is called the Sanatan Dharma. But those who don’t get out of the beliefs of caste system of unequal by birth as upper and lower can’t be called Sanatani. The Varnas are dynamic and history has recorded many interchanges within the system.


It was believed that education would bring awareness amongst the new generation and would kill the demon of inequality but it seems that the educated new generation may be in need of some more time/decades to come out of the illusionary imprisonment of the orthodoxy. 


Yajurveda Shanti Mantra, ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥states energy conservation law in the most fundamental level. वह पूर्ण है, और यह (ब्रह्मांड) पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की प्राप्ति होती है। पूर्ण से पूर्ण (ब्रह्मांड) की पूर्णता लेते हुए भी वह पूर्ण रूप में रहता है। That is the whole, this is the whole. From wholeness emerges wholeness. Wholeness coming from wholeness, wholeness still remains.


Because, there is only one platform (अद्वैत), one without second, the Brahman. 


There is difference amongst the three: Brahman, Brahmana and Bhramana. Brahman is eternal. Brahmana is orthodox religion and Bramana is illusions around which we wander.😊


Punamchand 

9 September 2023

www.punamchand.com


NB: If Soul is not energy in the scientific sense the law of conservation doesn’t apply to soul.

Wednesday, August 16, 2023

शिव बावड़ी।

 शिव बावड़ी। 


हिमाचल प्रदेश के शिमला के समरहिल इलाक़े में स्थित शिव बावड़ी मंदिर विस्तार में १४ अगस्त २०२३  के दिन सुबह सात बजे से बारिश चल रही थी। पवित्र अधिक माह सावन का सोमवार था। भगवान शिव की पूजा आराधना का दिन। एक परिवार के सात लोग, माँ, पुत्र, पुत्रवधू, तीन पौत्री, स्वजन और पुजारी भगवान शंकर की पूजा आराधना कर आरती उतार रहे थे। तीन भतीजे प्रसाद के लिए मंदिर के रसोईघर में खीर बनाने और लाने गये हुए थे। अचानक मंदिर भूस्खलन की चपेट में आ गया।पुजारी और सात लोगों के परिवार समेत १५-२० लोग मलबे में दब गये और दो बच्चे समेत ११ शब रात तक निकाले गये। प्रकृति आपदा के सामने मनुष्य ने स्थापित किया मंदिर और मंदिर में स्थापित देव लिंग मूर्तियाँ जब खुद ही भूस्खलन की चपेट में आ गये फिर अंदर रहे मनुष्यों को कैसे बचाते? २०१३ के जून माह में जब पहाड़ों में अविरत बारिश हो रही थी फिर भी लोग केदारनाथ जा रहे थे। बादल फटने से उपर रहा गांधी तालाब टूटते ही लोग बह गये। दो बहाव के मध्य भूमि पर स्थित मंदिर तो एक बड़े पत्थर की आड़ में बच गया जिसे हम चमत्कार समझकर महिमा मंडन करते है; लेकिन बाढ़ के बहाव में 6054 लोगों की मौत को कोई रोक नहीं पाया।ऐसी हज़ारों आपदाएँ- घटनाएँ हमारे सामने बनती रहती है।


आराध्यदेव की पूजा को कोई नहीं नकारता लेकिन उसने दी हुई बुद्धि को किनारे रख हादसे के शिकार बनते रहना क्या बुद्धिमानी होगी? अगर सलामती चाहिए तो प्रकृति के क़ानून को मानना पड़ेगा और उसका पालन करना ही पड़ेगा। 


इस पृथ्वी पर हमारे उपलक्ष्य में पाँच देव है। एक पृथ्वी माता जो हमारा आशियाना है। दूसरा आकाश जो सबको घूमने फिरने की जगह दे रहा है। लेकिन अंतरिक्ष के तीन देव हमारी बड़ी सहायता करते है। तीनों के संकलन से हमारी जीवन डोर टिकीं रहती है।अग्नि देव सूर्य के रूप में हमें उष्मा देता है, बर्फ़ को जलमय रखता है, समुद्र के जल की भाँप बनाकर वर्षा के बादल तैयार कर वरूण देव को अंतरिक्ष में स्थापित करता है। वरूण देव पृथ्वी पर भी और आसमान में। फिर आते हैं पवन देव।पृथ्वी को घनी चादर बन कर घेर रखा है। जीव सृष्टि को प्राणवायु देता है। वायुमंडल पाँच परतों में विभाजित होकर सूर्य की हानिकारक किरणों से हमें बचाता है। सूर्य की गर्मी से भाँप बने जल कणों को उठाकर आसमान में ले जाने सहायक बनता है। फिर वरूण देव की सवारी को दरिया पार पृथ्वी के खंड खंड पर लेकर भूमि को नव पल्लवित कर जीव सृष्टि को भोजन और पानी की व्यवस्था में सहायक बन जाता है। इसलिए वेदों में अग्नि (सूर्य, सविता),वरूण (इन्द्र, मित्र) और मरूत (रूद्र) की पूजा और प्रार्थना की गई है। चंद्र देव भी सूर्य की दाहक ऊर्जा को शीतल रूप में प्रतिबिंबित कर वनस्पति का पोषण कर सोमदेव के रूप में पूजनीय स्थान पाये है। धावा पृथ्वी भी मातृ स्थान पर पूजनीय है। 


इसलिए दृश्य जगत के प्राकृतिक देवता पूजनीय है। साथ साथ उनके क़ानून है उसका पालन करना भी इतना ही आवश्यक है। 


बिजली हमें AC बनकर शीतलता देती है और हीटर बनकर गर्मी लेकिन बिजली के तार को हम मित्र समजकर हाथ में पकड़ नहीं सकते। मौत को न्योता हो जाएगा। यह पूरा अस्तित्व शक्तिरूपा है। बड़ी शक्ति के सामने छोटी शक्ति की हार या नाश स्वाभाविक चल रहा है। शक्ति के पीछे रहा अव्यक्त इस लीला का साक्षी है। शक्ति रूप भी वही है और शिवरूप भी वही। 


सलामती, सुख और समृद्धि के लिए प्रकृति से तालमेल करना इस जगत का क़ानून है। इसलिए उनकी पूजा आराधना ज़रूर करें साथ साथ उनके नियम क़ानून का पालन करें। 


विज्ञान और विश्वास को साथ साथ चलने दें। 


सलामत रहें स्वस्थ रहें। 

 

पूनमचंद 

१६ अगस्त २०२३

Monday, July 24, 2023

अवधूत।

 अवधूत। 


जडं पश्यति नो वस्तु जगत् पश्यति चिन्मयम्। जो जगत को जड़ नहीं अपितु चिन्मय-चैतन्य रूप देखता है। 


मूर्ति पूजा का यही तो रहस्य है। है तो पत्थर लेकिन उसके पूजक के लिए प्राण प्यारा बन जाता है। लेकिन सिर्फ़ मूर्ति ही क्यूँ, सिर्फ़ अपने काम की वस्तु ही क्यूँ, जब जगत पूरा लबालब एक ही चैतन्य आत्म तत्व से ही भरा पड़ा है, एक ही अनेक रूप में लीला कर रहा है फिर किसका भेद करेंगे?


योगवासिष्ठ में सुषुप्ति के प्रकार बतायें है। घन सुषुप्ति, क्षीण सुषुप्ति और स्वप्न सुषुप्ति। यह पृथ्वी तत्व, पत्थर, पहाड़ सब घन सुषुप्ति में है। चेतना है लेकिन घन सुषुप्त है। यह पेड़, पौधे, वनस्पति क्षीण सुषुप्ति में है। चेतना घन से ज़्यादा सक्रिय है। यह पशु पक्षी मनुष्य इत्यादि जीव स्वप्न सुषुप्ति में है। चेतना का जागरण बढ़ा है लेकिन स्वरूप अज्ञान से स्वप्न सुषुप्ति अवस्था में है। अभी मनचले है। दो ही तो जाग्रत में आएँगे, गुरू और गोविंद। 


जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। देखना ही तो है। चिन्मय रूप से, सब में चिन्मय के दर्शन करने है। एक मूर्ति पर ही नहीं ठहर जाना है। वह तो प्राथमिक शिक्षा है। एक घन सुषुप्त पत्थर को पूजे और क्षीण और स्वप्न सुषुप्त चैतन्य रूपों को भूल जाए, यह कैसे हो सकता है। लेकिन हुआ। अभेद की शिक्षा को भूल हम भेद में चले गए और विषमताओं के पालने लगे। 


अवधूत दशा को पाना है तो अभेद दुर्ग में दाखिल होना पड़ेगा। संतुलन की स्थिति बनानी है। बेकार सब ग़ायब करना और चैतन्य क़ायम करना है। वधू मतलब दूसरा। जिसे एक के सिवा दूसरा कोई दिखता नहीं वही अवधूत है। धूत का मतलब छोड़ना। जिसने भेद की दुनिया छोड़ी और अभेद में सबको एक कर दिया वह है अवधूत। वही संन्यास है। सब कुछ छोड़ना और बस एक ही चैतन्य पकड़े रखना है। स्वप्न सुषुप्ति हटेगी और जाग्रत हो जाएगा। स्वस्थ हो जाएगा।


पूनमचंद 

२४ जुलाई २०२३

Wednesday, July 19, 2023

आत्मदर्शन।

 आत्मदर्शन। 


भगवान बुद्ध अपने भिक्खूओं के साथ वनीय विस्तार से गुजर रहे थे। एक जगह ठहर गए। बुद्धको प्यास लगी थी। एक भिक्खू जल लेने चला गया। एक तालाब खोज निकाला। लेकिन उसमें से एक बैलगाड़ी गुजरी थी इसलिए जल मैला था। वह बिना जल लिए वापस लौट आया। कुछ देर बाद बुद्ध ने उसे वही तालाब से जल लाने को कहा। भिक्खू गया, तालाब शांत था, जल निर्मल और उसने झुककर एक लौटा पानी भर लिया। बुद्ध ने शिक्षा दी कि हमारा मन भी उस तालाब के पानी की तरह है। सामान्य रूप से तो है शांत और स्थिर, लेकिन परिस्थितियों से वह विचलित और मैला हो जाता है। इसलिए मन को निर्मल करने कोई विशेष प्रयास नहीं करने है परंतु जिससे विक्षेप पैदा हुआ है उस स्थिति को गुजर जाने देना है। 


मन का उपादान सत्व गुण है इसलिए उसको निर्मल होने में कोई कठनाई नहीं होनी है। बस हमनें अपने संस्कारों के भण्डार गृह में जो जानकारी भर रखी है, जिसकी वजह से हमारा अहंकार विक्षेप पैदा कर रहा है, उसको ख़ाली करना है। शांत मन निर्मल दर्पण बन जाएगा, अपने आत्मरूप का दर्शन कर लेगा। 


शांत, स्थिर बैठे रहने की शिक्षा दी जाती है। रात में सोते समय सुषुप्ति में हम शांत और स्थिर हो जाते है। न पदार्थ है, न मन, न यह संसार। सुषुप्ति के आनंद से कौन नहीं है परिचित? सुषुप्ति ही हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर की बैटरी को चार्ज कर देती है। लेकिन जागते ही संसार लग जाता है इसलिए तुरीया और तुरीयातीत; शुद्ध विद्या, ईश्वर, सदाशिव का हमें पता नहीं चलता। समाधि इसी में दाखिल होने की साधना है। 


जब हम जागते है, तब जीव चेतना स्थूल शरीर में, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर में और सुषुप्ति में कारण शरीर में बनी रहती है। जाग्रति में हम शरीर, इन्द्रियाँ, मन से पदार्थ जगत का उपभोग करते है। स्वप्न में स्थूल शरीर विश्रांति में है लेकिन मन अपने बनाये पदार्थों को भोगता है। सुषुप्ति में शरीर शांत, इन्द्रियाँ शांत, मन भी शांत इसलिए जीव कारण में विलीन होकर पदार्थ विहीन सुखरूपता का अनुभव कर लेता है। लेकिन उठते ही वह संसार की जाल जंजाल में फँसकर सुख दुःख का भोगी बन जाता है। 


कहते हैं कि जागा हुआ पुरूष अपलक हो जाता है, पलक नहीं झपकती। वैसे तो यह स्वचालित क्रिया है। तबीबी हिसाब से पलक न झपकना दिमाग की एकाग्र होने की क्षमता कम होने की निशानी है। लेकिन आध्यात्मिक क्षेत्र में मन को स्थिर करने का उपाय। 


एक प्रयास करें। सुखासन। आँखे बंद करें। अब दोनों आँखों को स्थिर रखनें का प्रयास करें। देखें उसके हल्के वायब्रेशन कैसे शांत होते जा रहे हैं और साथ साथ आपका मन भी शांत होता चला जा रहा है। 


दूसरा प्रयोग करें। सुखासन, आँख बंद, ओठ आधे खुले और जिह्वा को मुँह के मध्य में स्थिर करें। न उपर जाने देना है, न नीचे। बच मध्य में स्थिर। देखते ही देखते, आँखों की पुतलीयां शांत हो जाएगी और मन भी। 


यह तो हुई क्रिया, मन को शांत और स्थिर करने की। परंतु बिना ज्ञान उस मन दर्पण का करोगे क्या? 


बस  इसलिए ही एक दर्शन अभ्यास चाहिए। जिसका श्रवण, मनन, निदिध्यासन करने से, जो देखना चाहते हो वही दिखाई देने लगता है। सगुण चाहो तो सगुण और निर्गुण चाहो तो निर्गुण। 


आज बस इतना ही। 


पूनमचंद 

१९ जुलाई २०२३

Wednesday, July 5, 2023

बिहारी।

बिहारी। 


बिहार का नाम बुद्ध विहारों से पड़ा है ऐसी प्रचलित मान्यता है। बिहार सांख्य, बौद्ध, जैन, नाथ, इत्यादि दर्शनों का गढ़ रहा है। इसलिए क्या बौद्ध भिख्खुओ के रहने के कुछ मकान अकेले उसे बिहार नाम दे सकते है?  


बिहार नाम बिहारी से आया है। कौन हे बिहारी? आत्मा राम। स्थिति ऐसी थी की पूरा प्रांत आत्माराम में रमण करता था, विहार करता था, तत्व चिंतन करता था। परम शांति में रहता था। 


हिन्दू दर्शन यह सृष्टि को खेल या लीला के रूप में पहचानता है। एक ही परम सत्ता का लीलारूप वैभव।एक ही अनुत्तर ने प्राण-अपान की भूमिका पर यह खेल रचाया है। अपनी शक्ति को प्रकट कर यह संसार व्यापार चला रहा है। वह यह निखिल विमर्श में प्रतिबिंबित रहता है। लेकिन जब कोई बिहारी इसी विमर्श शक्ति के सहारे अपने अंतः स्थित प्रकाश में प्रविष्ट हो जाता है तब आत्माराम में रमण करने लगता है। हंस से परमहंस पद आगे बढ़ता है। आज्ञा चक्र से सहस्रार का रास्ता टेडा मेडा है इसलिए बाँके बिहारी बनना पड़ता है, लेकिन जो पहुँच गया वही सच्चा बिहारी है। 😊


पूनमचंद 

५ जूलाई २०२३

मन।

 मन। 


जैसे समग्र अस्तित्व शक्ति है, शिव की; विमर्श है प्रकाश का; वैसे ही मन भी शक्ति है, जीवात्मा की। 


प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम)  में मन सत्व का प्रतीक है। इसलिए उसे दर्पण भी कहा जाता है। 


इसी दर्पण पर जीवन के रसास्वादन के लिए भाव (स्वभाव) खेल चलता रहता है। 


मन  को वैसे तो इस खेल में रहना है साक्षी, दृष्टा, लेकिन वह इन्द्रियों के साथ लिप्त हो जाता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व की जंजाल में फँसकर सुख दुःख का भोगी और जन्म मरण के चक्कर काटनेवाला पुर्यष्टक बन जाता है। 


यही अशुद्धि है, मल है, अशुद्ध मन है। सारे प्रश्नों का यही मूल कारण है। 


यह मन जब दृष्टा बनकर तटस्थ भाव धारण कर लेता है, खेल और रंगमंच का साक्ष्य हो जाता है, तब वह शुद्ध मन बन जाता है। उस शुद्ध मन के दर्पण से जो उभर आती है वह आत्मा है। 


शुद्ध मन तटस्थ साक्षी होते ही भावातीत होता है, प्राण के खेल का तटस्थ साक्षी रहता है। फिर जब मन भी दृश्य बनता है तब दृष्टा आत्मा उभर आती है। 


फिर आगे मन भी नहीं रहता, शिवशक्ति के मिलन में हंस परमहंस हो जाता है। 


अद्भुत है। 


पहले मन (शक्ति-विमर्श) के दर्पण में आत्मा का प्रतिबिंबन और फिर आत्मा में मन का। 


तेरी लीला का नहीं पार। 


आत्मा अद्वय है। अद्वैत है। बाक़ी सब खेल है। राम।


पूनमचंद 

५ जून २०२३

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