Tuesday, May 10, 2022

Elect freedom

 आज चुनाव है। 


चुनाव में दो उम्मीदवार है। एक आपका अति परिचित जिसे आप कईं सालो जन्मों से निर्विरोध चुनते आये हो। लेकिन इस बार एक नया उम्मीदवार जो कि अब तक साक्षी बनकर सिर्फ़ देखता रहता था उसने अपना पर्चा भर दिया है। पुराने उम्मीदवार का बहुत दबाव है कि वह अपना पर्चा वापस लें लेकिन नये उम्मीदवार ने पर्चा वापस करने की तारीख़ बीता दी। इसलिए अब चुनाव होना है और आपको दोनों में से एक को चुनना है। 


दो उम्मीदवार के नाम है १) कर्मात्मा २) मुक्तात्मा। पहले का चुनाव चिह्न है मोह और दूसरे का है चैतन्य।


पहले उम्मीदवार का घोषणा पत्र आप जानते ही है। कोई बदलाव नहीं है। फिर भी चुनाव है इसलिए पुनः बता देते है। 


१) आपके कर्मो का हिसाब बराबर रखा जायेगा। 

२) कर्मानुसार फल मिलेगा। अच्छे का अच्छा, बुरे का बुरा। 

३) वैसे तो कर्म की आज़ादी दिखती है लेकिन प्रारब्ध और संचित कर्मो के हिसाब से फलानुसार आपको निहित कर्म करने होंगे और फल भोगने होंगे। इस तरह आप नियति के हवाले रहेंगे। दिखती स्वतंत्रता में आप परतंत्र है। 

४) आपको मायाकृत भेद देखने में और भेदभाव से जीने की छूट है। 

५) दूसरों को मिल रहे फल में दख़लंदाज़ी नहीं देनी है।  

६) सुख भी मिलेगा। दुःख भी मिलेगा। 

७) आपको काम क्रोध मद मोह मत्सर का साथ हंमेशा रहेगा। 

८) आपका पुर्यष्टक (मन, बुद्धि, अहंकार, पाँच तन्मात्रा) कभी नष्ट नहीं होगा, इसलिए स्थूल शरीर त्यागते हुए भी आप इहलोक और परलोक की यात्रा कर पाओगे और उसके वैविध्य का अनुभव करोगे। आपका संसरण कभी समाप्त नहीं होगा। 

९) आपको पाप पुण्य लगेगा इसलिए नर्क और स्वर्ग कर्मानुसार नसीब होंगे। 

१०) यहाँ क़ानून और हिसाब का राज है इसलिए कृपा करूणा की आशा रखनी नहीं है। 


अगर आप आपके वर्तमान जीवन से संतुष्ट हैं और भविष्य के जीवन के प्रति नियति आधारित जीवन जीने के लिए कटिबद्ध है तो मुक्तात्मा के चक्कर में मत पड़िये जो अभी तक चुपचाप खड़ा था और जिसको यह संसार चलाने का कोई अनुभव नहीं है उसकी बातों में मत आइए। कृपया आपका वोट कर्मात्मा को देकर उसे पुनः विजयी बनायें। 


मुक्तात्मा के प्रवर्तक गुरू थे। उन्होंने भी घोषणापत्र प्रकाशित किया। 


१) आप को मुक्ति चाहिए, स्वातंत्र्य चाहिये तो हमें वोट करे। 

२) आप मोह रूपी अंधकार से मुक्त हो जाएँगे। 

३) आप सुख दुःख, हानि लाभ में सम रहेंगे। 

४) इसी जन्म में आपको जीवन मुक्ति  मिलेगी और देह छूटते ही विदेह मुक्ति। 

५) पुर्यष्टक भी लय होगा और आपका संसरण समाप्त होगा। 

६) काम क्रोध मद लोभ मोह आपसे दूर भागेंगे। 

७) आपके संचित कर्म समाप्त हो जायेंगे और प्रारब्ध इस जीवन तक चलेंगे। 

८) आप कर्मात्मा की ग़ुलामी से आज़ाद होंगे। 

९) आपको शिव की पंच शक्ति प्राप्त होगी। 

१०) आप इस जन्म में खुद का शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और आध्यात्मिक लाभ करोगे और औरों को भी लाभान्वित करोगे। 

११) आप मोह अंधकार से छूटते ही आपका ज्ञान संकोच दूर होगा। आप विश्वमय हो जाओगे। आपके विश्वोर्तीर्ण स्वरूप का आपको ज्ञान रहेगा। 

१२) आपको तीनों अवस्थाओं में तुरीया का स्वाद बना रहेगा और चिदानंद प्राप्त होगा। 

१३) कला वाली सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकल से आप बाहर निकलोगे और शुद्ध विद्या से मंत्र, मंत्रेश, मंत्र महेश्वर की सीढ़ी चढ़ शिव पद प्राप्त करोगे। 

१४) आप अनेक सिद्धियों के स्वामी बनोगे। 

१५) आप ज्ञानी, दानी और मुक्त बनोगे। 

१६) कितना बताये, आप जो चाहे वह करोगे क्योंकि शक्ति चक्र आपके आधिक्य में है। आप आपकी नई सृष्टि बना सकते हो। 


क्या आप मेरा मुक्तात्मा का चयन करोगे? कैसे ना कह सकते हो? मैं हूँ आप खुद, स्वयं, अहं। आपका अपना स्वरूप। जिसके प्रकाश से यह सारा विश्व प्रकाशित है। जिस के अंदर श्वास प्रश्वास, सृष्टि-स्थिति-लय, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति, सुख-दुःख भाव  इत्यादि उदित और लय हो रहे है। पर मैं मध्य, स्वयं प्रकाश, चिन्मात्र, नित्योदित, सदा सर्वदा वर्तमान में मौजूद हूँ। मेरे से कैसे हटोगे। मुक्तात्मा को वोट दे। 


अब की बार मुक्त सरकार।  😁😜


पूनमचंद 

९ मई २०२२

Siphon Joy

 सायफनींग। (दाबलंघिका) 


बचपन में दाबलंघिका सिद्धांत सब ने पढ़ा होगा। एक नली के द्वारा तरल पदार्थ एक पात्र से दूसरे पात्र में बहाया जाता था। दोनों पात्रों में तरल पदार्थ समान स्तर पर आकर बहाव रूक जाता था। पर ऐसा करने से पहले सायफन की नली को स्थानांतरित करनेवाले तरल पदार्थ से भरना पड़ता था और एक छोर को अंगुली से बंद कर दूसरे छोर को तरल पदार्थ में डूबा देते थे। फिर जैसे ही बाहर के छोर के छिद्र से अंगुली हटाई तरल पदार्थ बाहर प्रवाहित होना शुरू हो जाता था। 


कुछ ऐसी ही प्रक्रिया है। 


हमारा चित्त (मन, बुद्धि, अहंकार) जो कि चिति (चैतन्य) का ही संकुचित स्वरूप है, वह अपनी ज्ञानेंद्रियों (ज्ञान शक्ति) और कर्मेन्द्रियों (क्रिया शक्ति) के द्वारा बाह्य जगत के पदार्थों से पंच विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) का भोग करता है और उस भोग से क्षणिक क्षणिक आनंद का आस्वादन लेता है। आनंद अपने भीतर है पर उसको प्रकट करने उसे बाह्य विषयों और अवलंबन की ज़रूरत रहती है क्योंकि वह अतृप्त है। वास्तव में बाह्य पदार्थों में आनंद नहीं है पर उनके संपर्क से, भोग के पल बह अपने भीतर के आनंदसर से उस क्षण जुड़ जाता है। 


अब इसी बात को युक्ति बना लो। बाह्य पदार्थ के भोग से जैसे ही आनंद का स्फार हुआ, एक बिजली चमकी उस को पकड़ लो और उस को अंदर के आनंदसर में जोड़ दो, अंतर्मुख हो जाओ। 


बाह्य पदार्थ के संपर्क से द्रवित आनंद को चित्त रूपी नली में भरा, मध्य को पकड़ा और उसे भीतर के आनंद सागर से जोड़ दिया। और फिर बाहर का द्वार भी खोल दिया जिससे आनंद सागर का वह आनंद बाह्य जगत के सभी पदार्थ जो की मेरा ही शरीर हो उसमें व्याप्त हो जाए, उसको सिंचित कर दे। भीतर की चैतन्य रोशनी से मेरे जगत का विस्तार हो जायें और मैं भीतर बाहर एकरूप होकर आत्मा के सर्वरूप का दर्शन करूँ। सभी आकारों में रहे मुझ शिव निराकार का दर्शन करूँ। 


तीन कदम चलना है। 


१) बाहर के भोग से जो आनंद क्षण प्रकट हुई उसे पकड़ो और लेकर भीतर आ जाओ। 


२) उस आनंद से चित्त (मन, बुद्धि, अहंकार) को झंकृत कर मध्य (तुरीया-आनंद) का विकास करो। चित्त को आनंद से एकमय करो। 


३) उस आनंद से लबालब भरे/रंगे मन (आँख) से बाह्य जगत को आनंद दृष्टि से भर दो। 


भीतर attached हो और बाहर involve. आनंद का केन्द्र अंदर और उसका फैलाव पूरा विश्व। मेरा ही शरीर, मेरे से प्रकाशित, मुझ रूप से प्रकाशित। दृश्यम शरीरम्। आनंद से भरी भैरवी स्थिति। भैरव हो गया। 


आनंद है ही। बस जल भरना है और सायफन करना है। 


पूनमचंद 

१० मई २०२२

Crescent Star and Lingam

 Crescent, Star and Lingam


Crescent and a Star is a mysterical symbol of many religions throughout the world. In varna the r and m makes the mantra रं ram, the seed mantra of Manipur chakra of Kundalini. It is the  ँ of 🕉. 


In Shaivism the trik Shiva Shakti and Bidu are the base of the entire existence. Shiva and Shakti are the Light and manifestation (प्रकाश-विमर्श), the dot is a jada in asylum of Chiti (Shakti) get connected with Shiva. 


Crescent 🌙 and star ⭐️ might be an astronomical union of moon and venus or some day when the world had seen some important event. But in spiritual world 🌙 and ⭐️ together makes story of creation as both are the materials of the creation of this world. The crescent is the causal cause Chiti and the dot star is the material cause, and the presiding lord of both is Shiva, invisible. 


The Maya is not an illusion but a mother from whose womb the world is created. In that meaning the crescent is Maya and the star-dot is the first sound Nada from which all the elements and the visible world is created. 


The Shivlinga in a temple is a symbolic presentation of the cosmos as Jyotirlinga and the bottom base (yoni) represents the Chiti-Shakti that holds the universe. It’s also seen as a union of Purusha (masculine) and Prakriti (feminine). In Shankhya, it represents the subtle body the linga sharira of the creation. The Shiva-linga had origins in the idea of Yupa-Stambha or Skambha of the Vedic rituals, where the term meant the sacrificial post which was then idealized as the eternal Brahman. The Linga may be symbolising the flow of vital energy upward. It’s a cosmic pillar. The creation is a play of Shiva and Shakti, therefore, it has been symbolised as idol to worship. In Jainism the crescent represents the Shiddha Shila the abode of the souls and in Shaivism Lord Shiva adorns crescent moon on his forehead. Moon and Venus together represents the love the true form of the mother of creation. 


It is interesting to note here that Rub in Arabic means quarter (1/4) and hizb means group. It means that the existence is 1/4 of the one whole whose 3/4 part is invisible or unmanifested. Shaivism considers the visible world as 1/4  (विश्वमय) of the One whole Shiva whose 3/4 (विश्वोर्तीर्ण) is invisible. 


The creation begins with the desire-vibration of Param Shiva from which the first element Shiva (first vibration) descents. Shiva with second element Shakti (his vimarsha) variance as Sadashiva (first sprout) that further descents as Ishvara, Shuddh Vidhya and so on upto the earth as the 36th element. The universe of अहम् इदम् is made of 36 elements which is nothing but a manifestation of Param Shiva. 


As Shiva is absolute and Shakti his manifestation, the Shakti has two forms cool (सोम-moon) and hot (अग्नि-Sun). When the fire enters into the Soma, the Nada begins, the vibration generated which are the building blocks of the cosmos. It is shabda brahma, the Sadashiva. 


In geometry the dots form a line, similarly the original dot (मूल बिंदु) of creation Sadashiva is called Ambika (Shanta), the परावाक्, the Nada 🕉.  The Nada forms a triangle of Vama, Jayeshtha and Raurdri; the power of इच्छा, ज्ञान, क्रिया and the पश्यन्ति, मध्यमा and वैखरी respectively. It further moves on to form polygon (8 sides), tetradecagon (14 sides), polygon, hexadecagon (16 sides), three circles and a square. It is called the Sri Chakra. They represent the 8 Agni-chakras of Kundalini (mooladhar, swadhishthan, manipur, anahat, shakini, agya, guru, sahasrar). It generates Matrika-varnas (letters) of eights groups: one of vowels and seven of consonants. Each petal of the lotus of each chakra represents each varna. Param Shiva thus manifest into 36 elements of the cosmos from Shiva to earth. 


With this introduction, when you visit a Lord Shiva Temple or a Shakti temple and see its sanctum sanctorum in polygon or other shapes, 🕉, or sri yantra worshipping or mantra chanting, or see signs 🌙, ⭐️ and Rub el Hizb of other religions, observe them carefully. They are telling you the story of creation, symbols of worshiping, connect you with the divine power of the Almighty who has a power to bless you, protect you and make your good fortune.


Knowledge destroys all ignorance. Knower-the Self is the final destination. Thou art That.


Punamchand 

10 May 2022

Saturday, April 23, 2022

Satva Siddhi

 सत्व सिद्धि। 


प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि। 

धीवशात् सत्वसिद्धि। 


घट के भीतर नाद गुंजता, अंतर ज्योत जगी; सो सूरज के उजियारे में, मैंने मुझको पाया। 

धन्य भाग्य, सेवा का अवसर पाया, 

चरण रज की धूल बन, मैं मोक्ष द्वार आया।


यह जगत शिव नाटक है, जहां शिव ही थियेटर और शिव ही नर्तक। रसमय नाटक है, प्राणमय है। शिव थियेटर में विगलित हो रहे रस को ग्रहण करने विकल्पों को संस्कारित कर सबसे पहले राग द्वेष की गंदगी को हटाना है। गिलोय को खूब कूटे बिना, मटके के पानी में कईं दिनों भीगोये बिना, कैसे सत्व बाहर आयेगा गिलोय का? इस शिव थियेटर में प्रेक्षक बन देखना है, सुनना है, सूंघना है, चखना है, तबज जाके शिव रहस्य समझ पायेंगे।जब तक इस थियेटर से प्रमाता रस नहीं ले आया, ‘मैं ही मैं’ अनुभूत नहीं किया, तो फिर क्या किया? कोरा का कोरा ही रह गया? सत्व नहीं पाया। 


रामलीला ही ऐसी है कि बार बार सुनने पर रसास्वाद आता रहता है। हर कोई उत्सुक रहता था उस रामलीला के एक्टर बनने। राम नहीं, हनुमान नहीं तो राम सेना के सिपाही का रोल ही दे दो, यह तड़प रहती थी। पर जिस को राम का पात्र अभिनय करना है, हनुमान का पात्र करना है उसे ख़ास व्रतों से अपने आपको तैयार करना पड़ता है। शोधन करना पड़ता है ताकि स्टेज पर राम प्रकटे, हनुमान प्रकटे, न कि अपना राग द्वेष। 


धीर बनना होगा। पंजाबी में बेटी को धी कहते है, जो ध्यान रखती है और हम उसका ध्यान रखते है। वह संवेदना, जो धारण करना जानती है। धीरता पात्रता लायेंगी। शिवलीला को समझने वाला पात्र। धारणात्मिका और ग्रहणात्मिका बुद्धि से सत्व सिद्धि करनी है। becoming से being में लौटना है। निर्मलता लानी है। जैसे सालों-साल नदी के पानी के बहाव से धुलीं रेत पुलिन होती है, उसका सत्व प्रकट होता है, वैसे ही अपने भीतर के काम क्रोध लोभ मद मोह मात्सर्य को बाहर निकाल फेंक शिवत्व की सत्व सिद्धि धारण करनी है। वह धी, मति, बुद्धि, प्रज्ञा, प्रतिभा को उजागर करना है। 


Unconditioned हुए बिना जिस भाव से यह नाटक रचा गया है, उसके भाव को कैसे ग्रहण करेंगे? दृष्टि गलित कर वह watchfulness लानी है जहाँ अपने पराये की दिवारें ध्वस्त हो जाती है और आत्म अमृत रूपी सत्व प्रेम प्रकट हो जाता है। विकल्प में फँसा रसानुभूति नहीं कर सकता। जैसे वह राजा जिसने शर्त रखी थी कि जो ऐसी कहानी सुनाये जो कभी ख़त्म न हो उसे इनाम देगा। राजा का ध्यान कहानी के ख़त्म होने पर और कहानीकार का ध्यान उसको खींचते रहने में। विकल्पों में रस ग़ायब था। लेकिन एक आदमी राजा का गुरू निकला। कहानी शुरू की। एक किसान था। उस के खेत में अनाज का ढेर लगा था। बग़ल में एक बड़ा पेड़ था जिस पर अनेक चिड़ियाँ बैठी थी। फिर एक चिड़िया पेड़ से नीचे उतरी, ढेर से एक दाना लिया और फुर्र कर उड़ गई। फिर दूसरी चिड़िया उतरी, दाना लिया और फुर्र।बस चिड़िया एक के बाद उतरती गई और फुर्र। राजा थक गया उस फुर्र से और अपनी हार मान ली। रस माधुर्य नहीं रहा। हमारा जीवन भी ऐसे फुर्र हो जायेगा अगर जागृति नहीं आई। 


कहानी में कुतूहल होता है और काव्य में रस। रस और कुतूहल मिलाकर बनता है वह है नाटक। यह जगत शिवजी का नाटक है, रस और कौतुक से भरपूर। इसकी नाट्य सिद्धि को अनुभूत करना है। महर्षि अरविंद का वह trans of bliss, आनंद का अतिक्रमण कर उसे क़ायम रखना है।यह जगत शिवशक्ति के trans of bliss का परिणाम है। चमत्कार रस है। इसलिए कोई धीर ही उस चमत्कार, flash को, नाटक के पीछे छीपी शिवता को देख लेता है। बाहर देखनेवाला कुछ नहीं देखता, अंदर देखनेवाला अमृत पाता है। वही योगी है जो सही देखता है, सहज विद्या का लाभान्वित है। उनकी अंतर्मुखी इन्द्रियां ही वह देवतागण है, प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि, जिसके सामने शिव आविर्भूत (releal) हो जाते है।शिव नाटक का दीदावर होता है। वह समझता है और उसका रसपान करता है। 


रसास्वादन कब होगा? बर्तन सही होंगे, आँच सही होगी, बीच-बीच में उसको देखा जायेगा तब जाकर भोजन से रस प्रकट होगा और आप भोजन की रसानुभूति कर पायेंगे। कूकर के भोजन में वह रस कहाँ? अनाज के स्थूल भाग से मल, सूक्ष्म भाग से सप्त धातुएँ और अणुस्थ से मन बनता है। इसलिए भारत में बड़े धैर्य और भक्ति भाव से रसोई बनती थी।देखा नहीं, सूरदास की गोपी ने श्रीकृष्ण के लिए कैसे दहीं मथी? बर्तन स्वच्छ किया, सुगंधित किया, दूध को सही ताव दिया, धीर रही और वोचफूल भी और अपनी चेतना से उसे सुवासित की; तब जाके गोपी की दहीं कान्हा के लिए तैयार हुई। हमें भी हमारा पात्र स्वच्छ और सुवासित बनाना है जिसमें शिवता प्रकट हो जायें। 


अंतरात्मा मंच है। नाटक शिवानंद है। दुख पीड़ा जन्म मृत्यु नाटक के ही भाग है। पुर्यष्टक के भीतर बना रंगमंच शिवत्व के स्वातंत्र्य बोध को पाये बिना नहीं टूटता। स्वातंत्र्य बोध मिलने तक अनेक योनियों में गमन कर नर्तन करता रहता है जैसे इन्द्र बना था सुकर। बच्चे भी पैदा कर लिए और अपनी इन्द्र पहचान भूल गया। जब उसे सुकर के शरीर से छुड़ाया तब जाके इन्द्र के ऐश्वर्य में वापस लौटा। हम कब लौटेंगे? 


इन्द्रियाँ ही प्रेक्षक है जिसे अंदर से संस्कारित करनी है। विधाता ने इन्द्रियों की रचना ही कुछ ऐसी की है कि उसे बाहर की ओर कर पीछे से बोल्ट कर दिया है। इसलिए वह पीछे देख नहीं पाती। आँख बाहर सबकुछ देखेगी पर खुद को नहीं देख पाती। यह इन्द्रियां देवताओं के द्वार है। जैसे जैसे भीतर देख पाती है, audience में आती है, नर्तक शिव का उत्साह बढ़ाती है। वह जब स्तुति गाती है तो नर्तक शिव अपना प्रदर्शन और भी प्रकट करता है। शिव कृपा से इन इन्द्रियों के बोल्ट जब खुलते है, इन्द्रियाँ वापस लौटती है, वही है प्रत्याहार। बिना अग्नि जल रहे इस संविद अग्नि से अंधकार चला जाता है। ३६ तत्वों को पिंड बनाकर सिद्ध उस अग्नि में आहुति देता है। काल भी शिव के तीसरे नेत्र के खुलने की प्रतीक्षा में बैठा है। मुकुल की तरह जैसे ही शिव का तीसरा नेत्र खुलता है, वह विश्व को पिंड बनाकर अपनी आहुति दे देता है। नृत्य समाधि स्मशान समाधि बन जाती है। यह शिव नाटक कोई एक रस का नहीं है। नौ रस उसमें समाये है।वीभत्स, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, शृंगार और अद्भुत रसों का आश्चर्य है। घोर रूप में अघोरी अभिनय है।सारी पृथ्वी को मंच बनाकर योगस्थ शिव रूई के भार वजन बनाकर अपनी बाँहें उठाकर उसे मुद्राओं में सिकुड़कर, अग्निघर नेत्रों को चंचल रख, खुद को दुःखमय बनाकर थियेटर की कन्डीशनींग न टूट जाये उसका ध्यान रखते हुए नृत्य कर रहा है। यह नृत्य को वही इन्द्रियां प्रेक्षक बन देख सकती है जो अंतर्मुख है, स्वच्छ है, निर्मल है। 


शब्द ही से बंधन और शब्द से ही मुक्ति। शब्द को रगड़ना है और उसके अर्थ को उजागर करना है। स्वच्छता कैसी? निर्मलता कैसी? जैसे कादंबरी का नायक का सरोवर दर्शन। इदंता (दृश्यमान जगत) को गुरू बनाकर देखो। जो बाहर दिख रहा है वह आपका भीतर का प्रतिबिंब है। प्रतिबिंब बाहर नहीं है। अंदर का दर्पण अपना प्रकाश बाहर फेंक रहा है। बाहर की स्वच्छता देखने या अनुभूत करने भीतर की स्वच्छता ज़रूरी है। जो अंदर है वही बाहर दिखेगा। बाह्य जीवन आंतर जीवन का ही प्रतिबिंब है। अगर बाहर गंदगी दिख रही है तो भीतर की सफ़ाई करो। रागादि दोष हटाओगे, भीतर स्वच्छता आयेगी, निर्मलता आयेगी तब जा के पंचेन्द्रिय के प्रेक्षक शिवानंद से तृप्त होंगे। तब जा के इस शिव संगीत में छीपी हँसो की ध्वनि कर्मेन्द्रिय को तृप्त करेगी। उसकी कमल गंध को सूंघेंगी, उसकी ठंडक और शांति का स्पर्श करेगी। खुली आँखों से वह शिव रहस्य जान जायेगी। स्वयं शिव नर्तक अंतरात्मा के रंगमंच पर नृत्य कर रहा है। चैतन्य ही स्वतः आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि बन उदित हो रहा है। जल से स्वतः मछली जन्म ले रही है। यह सारा ब्रह्मांड शिव का त्रिलोकी नाटक है जिसमें त्रिलोकीनाथ स्वयं भूमिका लेकर सकल से अकल रूप में प्रकट है। 


स्वच्छता, निर्मलता और धीरता से उस सत्व (शिव) को सिद्ध करें। 


घट के भीतर नाद गुंजता, अंतर ज्योत जगी; सो सूरज के उजियारे में, मैंने मुझको पाया। 

धन्य भाग्य, सेवा का अवसर पाया, 

चरण रज की धूल बन, मैं मोक्ष द्वार आया।


पूनमचंद 

२० अप्रैल २०२२

Be in consciousness

 होश में रहो। 


अब रहा न आना जाना, जिधर देखता हूँ सनम रूबरू है। गुलिस्ताँ में जाके हर गुल को देखा, तेरी ही रंगत तेरी ही बू है। रही न कुछ असर न कुछ आरज़ू है, जिधर देखता हूँ सनम रूबरू है। 


यह कश्मीर शैव दर्शन है, जहां प्रेम ही प्रमुख है।यह जगत शिवलीला है, शिव शक्ति का मिलन, प्रेमालय। यहाँ शक्ति विश्व बनी है और शिव उसका धारक। जैसे आग और आग की लपटें। 


सकल से अकल की यात्रा में मायावरण पार कर आध्यात्मिक यात्रा शुद्ध बुद्धि से आगे बढ़ती है। अहम अहम, इदम इदम मंत्र है। I am, I am; this is this. एकरूपता है भेदभाव नहीं। फिर ईश्वर पड़ाव आता है जहां जो देख रहा हूँ वह मैं हूँ यह दृष्टि आती है। The whole is in I. ग्राहक ही ग्राह्य, भोक्ता ही भोग्य बन गया। शिव ही पार्वती। इदम अहम मंत्र है इस पड़ाव का। फिर आता है सदाशिव पद। अहम इदम। मैं ही इदम (विश्व)। एक हो गया। शिव शक्ति का मिलन हो गया। प्रेम हो गया। In love you rise but this is rising in love. 


कैसे पहुँचें? आण्वोपाय, शाक्तोपाय और सांभवोपाय से। कुछ साधन समझे। 


प्राण सेतु है पहुँचने का। अंदर आ रहा है वह शीतल चंद्र और बाहर जा रहा उष्ण सूर्य की द्वादश अंगुल पर हो रही संधि पर ठहरो। वही गुरू चरण है, गुरू पादुका है। उसकी पूजा करो। उस मध्य में अवस्थित रहो। उसके भूमध्य कंठ और ह्रदय का ध्यान रखो।स्वस्थ (स्व में स्थित) बनो। वहाँ परमानंद है। 


नींद भी साधन बन सकती है। जाग्रत के अंत पर नींद शुरू होती है। एक बाल जितना पतला एक संधि बिंदु है। उस मध्य पर ठहरो उस पर जागरण रखो। परमानंद पाओगे। 


यहाँ Yoga in action है। न संन्यास लेना है न भिख्खु बनना है। पलायन नहीं है। यहाँ सिर्फ़ चक्षु आवृत करना नहीं है, अपितु खुली आँखों से भी देखना है। thoughtless seeing. seeing without conditioning, seeing without justification, seeing without identification. शिव ही शिव नज़र न आये तब तक। one pointed ध्यान।  बैठते जागते सोते काम करते.. एक ही निदिध्यासन। शिव नहीं तो जीव कहाँ? उसके संगीत ताल और लय को पहचानना है। जैसे राजस्थानी नर्तकी शिर पर कुंभ लिये ताल और लयबद्ध संगीत के साथ नृत्य करती है, अंग प्रदर्शन करती है, आसपास गड्ढे और आग भी है फिर भी नृत्य में रत उसकी बुद्धि उस कुंभ की रक्षा में लगी रहती है, कुंभ को गिरने नहीं देती। वैसे ही संसार में रहते, स्व (God) में ध्यान रखने वाला योगी है।योगी बनो। बस ब्रह्म-शिव के अवलोकन का चस्का लगा दो। शिव को देखने का, जानने के नशे को छोड़ो मत। यह नशा होश में लाता है। शिवत्व देता है। प्रेमालय में प्रवेश है। 


शिवदर्शन का नशा इतना करो कि फिर गा उठो। 


अब रहा न आना जाना, जिधर देखता हूँ सनम रूबरू है। गुलिस्ताँ में जाके हर गुल को देखा, तेरी ही रंगत तेरी ही बू है। रही न कुछ असर न कुछ आरज़ू है, जिधर देखता हूँ सनम रूबरू है। 


पूनमचंद 

२१ अप्रैल २०२२

Bharatiya Sanskriti

 भारतीय संस्कृति। 

जल उठो फिर सिंचने को। 


भारत की सनातन जीवन शैली का आधार आध्यात्म है। यहाँ अलग अलग  दर्शन, धर्म और जातियों का संमिश्रण होने से आधुनिकता की दौड़ होते हुए भी सनातन भारतीय जीवन शैली आज भी जीवित है। हमारे पूर्वज मानते थे वसुधैव कुटुंबकम। उनका लक्ष्य था शांति, प्रेम और अहिंसा। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।सबके सुख और स्वास्थ्य की कामना।


यहाँ जीवन एक उत्सव है जहां नाट्य कला और नृत्य कला से आध्यात्म की व्याख्या होती है। हमारा सारा ज्ञान कलाओं के द्वारा परोसा जाता है। धर्म, अर्थ, काम और पुरुषार्थ यहाँ आध्यात्म से संप्रेषित है। रसोई, हस्त-पाद प्रक्षालन से लेकर ब्रह्मांनंद तक एक ही दृष्टि है, तृप्ति की। भूतशुद्धि और मन शुद्धि के प्रयोजन में कला एक मार्ग है। सौंदर्य दृष्टि वाले का आध्यात्मिक प्रवेश इसलिए सरल है। 


नाट्य प्रवर्तक पहले रस को संवारता है, फिर श्रोताओं और दर्शकों के ह्रदय में उस रस को संचारित कर उस सौंदर्य में तृप्त करता है। सौंदर्य का परिष्कार जितना हो उतना निखरता है। नाटक की त्रिवर्गात्मिका संचालन में प्रवृति है और धर्म विपरीत से निवृत्ति है। नाटक का परिणाम शांत रस है। यह शांति स्मशान शांति या मंदता नहीं लेकिन तरलित होकर स्वस्थ्य होना है। शांति बाक़ी के आठ रसों की योनि है। गांधीजी के सत्त्याग्रह में टोल्सटोय से ज़्यादा राजा हरिश्चंद्र नाटक की अवधारणा थी।नाटक की शुरुआत में डुगडुगी बजती है और प्रस्तुति होती थी। “चंद्र टले चंदा टले, टले जगत व्यवहार। पर राजा हरिश्चंद्र, न टले सत्य विचार”। पीड़ा के बाद की शांति का अनुभव। 


नाटक का रस मन का मैल धो कर शांति पैदा करता है। स्वस्वरूप का प्रथनन होता है और ज्ञान यानि चेतना का विस्तार होता है। अभिनेता जितना बुद्धि कुशल हो उतना सात्विक अभिनय कर पायेगा। उमा या शिव का अभिनय करने से पहले अपने में रही स्त्री - पुरुष को बाहर निकालना पड़ता है। अभिनय हाथ पैर हिलाना नहीं पर अपने inner being की उपलब्धि से स्फुरित करना है। 


भरत नाट्यशास्त्र पर अभिनव भारती की व्याख्या स्वीकृति पाईं है। रूद्र शिव ने अपने अंगों के विभाजन से जो स्वात्मप्रच्छादन पटु क्रीड़ा रूप त्रिगुणात्मक प्रकृति स्वरूप लिया है, वह तीन गुण नाटक थियेटर का विषय वस्तु बन जायेगा। संकीर्णता का यहाँ स्थान नहीं। यहाँ कमंडल लेकर पलायन नहीं करना है अपितु जीना सीखना है और आनंद से जीना है। 


कनिष्क के वक्त हुए नागार्जुन ने जिसने अकाट्य तर्क से कश्मीर में शून्यवाद की स्थापना की थी। सर्वम् शून्यम्… सर्वम् शून्यम्। तब प्रश्न उठा कि बुद्धस्य वचनम् अपि शून्यम्? शिव उपासक दुनियाँ से भागता नही। नकारे होकर बैठा नहीं रहता। नर्तक आत्मा, अंतरात्मा के रंगमंच पर भीतर चेतना में नाटक का मंचन हो रहा है जहां देवों प्रेक्षक इन्द्रियां है; नर्तक से प्रेक्षक तक रस का संचार हो रहा है; उस नाटक में अपना दर्शन करना है। 


मलिन सत्व से अपना दर्शन नहीं होता, निर्मल बुद्धि चाहिए जिसे धीषणा कहा गया है। जिसमें सत्व का स्फुरण होता है। जिस तत्व की हमें खोज है वह स्फुरणशील है और अत्यंत सूक्ष्म, फूल की सुगंध से भी पतला है, अतीन्द्रिय है, आंतर परिस्पनदस्य (inner being) है। साधना का हेतु है सत्व शुद्धि और निर्मल बुद्धि।बाहर के और अंदर के साधन (भूत, इन्द्रियां, मन, बुद्धि) को दर्पण की तरह तैयार करना है। निदिध्यासन करना है जिससे सत्व का प्रकाशन हो। विशारद कहा जाता है ऐसी निर्मल बुद्धि वाले को जो अपने शिव स्वरूप का विमर्श करने निपुण है। विशारद शब्द शरद से बना है। शरद का सौंदर्य। वर्षा ऋतु के बादलों द्वारा पृथ्वी को धोये जाने के बाद आती है शरद। मैले जल को छोड़ नदी स्वच्छ निर्मल जल को धारण कर बहती है। इसी शरद के अमावस्या की रात में दीवाली का उत्सव और नये साल का उदय होता है। शरद का संबंध देवी शारदा सरस्वती से है। शुक्ल ही शुक्ल, निर्मल ही निर्मल। शरद में श्वेत पुष्पों से सुशोभित पृथ्वी पर हिमाचल में पार्वती विवाह रचाया जाता है। इसी शरद बुद्धि में सत्व का प्रकाशन करना है। 


भारतीय संस्कृति निर्माण में समर्थ है जिस पर सारे भारत का, विश्व का,  मानवता का अधिकार है। अपने स्वरूप में जाग गये फिर हिंसा नहीं होगी। जो सच है वह पाओगे। न मेरा है न तेरा है। जो है तत स्वरूप वह सब का  है। प्राणायाम की बाह्य क्रिया से समाधि तक की सफ़र में शिवता का स्फुरण और शिवभाव के साक्षात्कार की अभिव्यक्ति होती है। यही मोक्ष है। इस मोक्ष की कामना करते हुए जीवन की हर मुश्किल परिस्थितियों का सामना करें और होश खोये बिना आगे बढ़े। समापन करें कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की इस काव्य पंक्तियों के साथ। 


गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को। 


चोट खाकर राह चलते, होश के भी होश छूटे; हाथ जो पाथेय थे, ठाकुरों ने रात लूटे; कंठ रूकता जा रहा है, आ रहा है काल देखो। 


भर गया है ज़हर से, संसार जैसे हार खाकर; देखते है लोग लोगों को, सही परिचय न पाकर; बुझ गई है लौ पृथा की, जल उठो फिर सींचने को। 


पूनमचंद 

२१ अप्रैल २०२२

Fruit of Banian tree

 बरोंदा। 


बरगद (वटवृक्ष) के पेड़ के फल को वटफल या बरोंदा कहते है। सामवेदीय छांदोग्य उपनिषद् में एक सुंदर संवाद है। पिता उद्दालक गुरू है और पुत्र श्वेतकेतु शिष्य। 


श्वेतकेतु प्रश्न करते है।आत्मा (self) है तो दिखती क्यूँ नहीं? अदृश्य वह भौतिक विश्व कैसे बनी? 


गुरू उद्दालक शिष्य श्वेतकेतु को बरोंदा लाने को कहते है। शिष्य ले आता है। फिर कहते है तोड़ो उसको। अंदर अनेक बीज होते है। उसमें से एक बीज लेकर तुड़वाते है और पूछते है, अंदर क्या है? शिष्य जवाब देता है कुछ नहीं। 


गुरू बताते हैं कि यह कुछ नहीं में जो अदृश्य है वही तो वटवृक्ष बनता है। वही सत्य है। वही आत्मा है। तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि। 


वही self है, वही शिव है, वही ब्रह्म है जो हमारी तुम्हारी आत्मा बन विचरण कर रही है। आप के पास ही है, आप ही हो, खोजेंगे कहाँ? 


हमारे वर्तमान शरीर से उसका कनेक्शन हमारा जन्म माना गया। उसकी संगत जीवन माना गया और जब डीस्कनेक्शन हो जायेगा तो मौत मानी जायेगी।वास्तव में अजन्मा हम न जन्मे, न मरे। अस्तित्त्व कैसे मर सकता है? ज्ञान शाश्वत शिव है। वही हमारा आपका अदृश्य स्वरूप है। वही वटवृक्ष बना है। सदा मौजूद फिर भी अदृश्य। उस स्व में स्वस्थ होने की कामना करें। 


स्वस्थता हि सिद्धि है। 😊


पूनमचंद 

२३ अप्रैल २०२२

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