चित् और चित्त — एक छोटा-सा ध्वनि परिवर्तन, पर अर्थ में गहरा अन्तर।
चित् प्रकाश है, चित्त उसका दर्पण।
चित् जल है, चित्त उसकी तरंग।
चित् पर्दा है, चित्त उस पर चलती हुई बदलती फिल्म।
चित् अपरिवर्तनशील है, चित्त परिवर्तनशील।
चित् आत्मा क्षेत्र है, चित्त मन क्षेत्र।
चित् निराकार है; चित्त में विकार और वृत्तियाँ हैं — जिनके निरोध का नाम योग है।
चित् ही चिति है — परमशिव की स्वातन्त्र्यशक्ति।
चिति का संकोच ही चित्त है।
प्रत्यभिज्ञा का यह पाठ स्मरण है?
चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसङ्कोचिनी चित्तम्।
अवरोह में चिति ही चित्त बनी है; आरोह में शुद्धविद्या के द्वारा चित्त से चिति का साक्षात्कार करना है।
प्रत्यभिज्ञा करनी है — अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
सीमित के पार असीम का बोध।
वही बुद्धत्व - निर्वाण, वही शिवत्व - मोक्ष।
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