पर्युषण
पर्युषण जैन धर्म को केवल एक अपेक्षाकृत छोटे समुदाय के पर्व के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता को आकार देने वाली गहनतम दार्शनिक धाराओं में से एक के स्मरण का अवसर है।
महावीर स्वामी ईसा पूर्व छठी शताब्दी में हुए और जैन परंपरा के 24वें तीर्थंकर माने जाते हैं। उनसे पूर्व 23 तीर्थंकरों की परंपरा इस दर्शन की प्राचीनता और उसकी दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति का संकेत देती है।
जैन धर्म प्रत्येक आत्मा को उसकी आध्यात्मिक क्षमता में मूलतः समान मानता है। शुद्ध आत्मा को अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत सुख से युक्त बताया गया है, जिसकी वैचारिक प्रतिध्वनि बाद के भारतीय चिंतन में व्यक्त सत्–चित्–आनंद की अवधारणा में भी दिखाई देती है। वहीं जन्म और सांसारिक असमानताओं की व्याख्या पूर्वकर्मों के आधार पर की जाती है।
जैन दर्शन में भगवान कोई सृष्टिकर्ता नहीं, बल्कि मनुष्य को भगवान - सिद्ध पद तक पहुँचना है। मनुष्य योनि से तप, संयम, संवर और निर्जरा के माध्यम से वीतरागी बन कर्म बंधन के पुद्गलो से छूटकारा पाना है। केवल ज्ञान - सर्व ज्ञान, सर्व दर्शन और सर्व सुख - के सिद्ध पद पर पहुँचाता है। सिद्ध का जन्म–मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है। इसलिए यहाँ “संभवामि युगे युगे” जैसी पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के लिए सिद्ध बनने की अनंत संभावना है।
जैन जीवन, जीव के सिद्ध पद मुक्त आत्मा बनने की यात्रा है। प्रतिक्रमण है - आत्मा को गुणों की और लौटाना है।
जैन दृष्टि में अहिंसा, द्रव्य रूप अनंत जीव-आत्मा, प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, शाकाहार, आत्मसंयम, कर्म सिद्धांत, पुनर्जन्म, पाप–पुण्य, स्वर्ग–नरक, जीवों की 84 लाख योनियां और हर योनि के अनंत जीव, जैसे विचार शामिल हैं। ये सिद्धांत जैन समुदाय की सीमाओं से बहुत आगे बढ़कर भारतीय जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग बन गए हैं।
इसलिए पर्युषण केवल प्रतिक्रमण, क्षमा और आत्मसंयम का पर्व नहीं, बल्कि जैन चिंतन के भारतीय सभ्यता को दिए गए विराट दार्शनिक और नैतिक योगदान को स्वीकार करने का भी अवसर है।
मिच्छामि दुक्कडम्।👏
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