Monday, June 5, 2023

Is an ant smarter than man?

 Is an ant smarter than man? 


Black garden ant known as common ant are wiser than humans as they predict the rain faster than humans. June July are their mating season and therefore they are on flight. They generally live in the nests build under the earth, stone, woods, holes, etc, and live in colonies with a Queen and her workers. 


I am a keen observer of their movements in the month of May-June as they move in thousands from the garden to our house. Whenever, they are appeared in our room, the next day is a rainy day. The intensity of rain in the season also been observed with their movements. In a good rainy season they move out in big numbers but in a drought year one can hardly find a black ant in the house. In low rainfall year, their movement from garden to house is less compared to the good rainfall year as if they know that whether their colony is safe or unsafe in that rainy season. 


The Earth is a living habitat of millions of creatures and therefore any threat to their life, there is inbuilt knowledge system in their mind - DNA system that gives them warning signals to recognise the threat earlier so that they could rescue themselves. The ethologists studied their behaviour and natural habitats. 


Human brain volume is 1.1 to 1.2 litre while the brain volume of an ant is 1 microlitre, a million times smaller but it is more intelligent than humans in terms of predicting rains and has more strength to carry load 10-50 times their body weight. 


Who is there on earth without knowledge? 

सर्वं शिवं। 


Punamchand 

4 June 2023

Saturday, June 3, 2023

ज्ञानं बन्धः। ज्ञानं जाग्रत।

 ज्ञानं बन्धः। 

ज्ञानं जाग्रत। 


शिवसूत्र के दो सूत्र है। 


पहले बंधन का सूत्र फिर जागरण का। ज्ञान (स्वरूप) बन्ध का अर्थ हुआ संकोच का ज्ञान, सीमा- बंधन का अनुभव, स्वातंत्र्य का अज्ञान है। जैसे कोई अपने ही स्वरूप को अपने ही संकल्प से भूल गया। असीम है परंतु सीमा में बंध गया। 


जंगल में एक शेर का बच्चा बकरियों के झुंड में रहकर अपने को बकरी मानने लगा था। एक दिन एक शेर आ गया। उसने दहाड़ लगाते ही सारी बकरियाँ भाग चली। वह शेर का बच्चा जो अब युवा हो गया था वह भी भागने लगा। शेर ने बकरियों को तो जाने दिया लेकिन उस शेर को पकड़ लिया। कहा बरखुरदार, आप कहाँ भाग रहे हो? वह युवा शेर तो डर के मारे काँपने लगा। अब मेरा क्या होगा? मेरी बकरियों के पास अब कैसे जा पाऊँगा? वैसा सोचकर वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। शेर उसे पकड़कर एक तालाब के पास ले गया। फिर उसे दिखाया अपना चेहरा और उसका भी और बताया कि तुम भी शेर हो मेरी तरह। परंतु वह मानने को तैयार नहीं। फिर कहा, अब दहाड़ो मेरी तरह। वह पहले तो तैयार नहीं हुआ लेकिन उसके बार बार कहने से थोड़ी ताक़त इकट्ठी की और दहाड़ा। पहले तो थोड़ी सी आवाज़ निकली परंतु जैसे ही उसने दहाड़ ने का अभ्यास किया आवाज़ बुलंद होती गई। दूर किनारे उसके साथी देख रहे थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने साथी के मुँह से शेर के दहाड़ ने की आवाज़ सुनी सब भाग गये। वह शेर मस्त होकर अपनी सच्ची पहचान को पाकर जंगल में चल पड़ा, एक शेर की तरह। शेर ही था। अपने शेर स्वरूप को पहचान लिया, स्वातंत्र्य पा लिया और सिंहत्व को प्राप्त हुआ। जाग गया। ज्ञानं जाग्रत्। 


हम कब दहाड़ेंगे? कौन रोक रहा है? पहचान ले, अमृत कुंभ भीतर है। बस स्वातंत्र्य का ढक्कन खोलना ही बाक़ी है। इंतज़ार मत करें। शरीर रथ काल चक्र में बंधा है। विदेह होने से पहले जीवन मुक्त हो जाए। 


“You can say to this mountain, ‘May you be lifted up and thrown into the sea,’ and it will happen. But you must really believe it will happen and have no doubt in your heart.“ -Jesus


क्या नामुमकिन होगा जिसने शिव साक्षात्कार किया? स्वस्थता स्वातंत्र्य है। 


पूनमचंद 

३ जून २०२३

Friday, June 2, 2023

तुरिया।

 तुरिया  


ज्ञानं जाग्रत। 

स्वप्नो विकल्पाः।

अविवेको मायासौषुप्तम्। 


हमारे मन की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं से हम भलीभाँति परिचित है। हर दिन जागते है, सोते है और फिर उठ जाग दैनिक काम में लग जाते है।  हमारे मन संसार के विषयों में लिप्त रहना जाग्रत है। नींद में कल्पना और भय के चित्रों में खेलना स्वप्न है और अचेत होकर सो जाना सुषुप्ति। 


दार्शनिकों ने हम जिसे जाग्रत कहते है उसे भी जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीन दशाओं में बाँटा है। हम प्रकृति के पुंज है इसलिए सत्व, रजस और तमस् गुण से बने है। सत्व ज्ञान का, रजस क्रिया का और तमस् मोह का प्रतीक है। इसलिए जिस गुण की प्रधानता होगी हम वैसे ही चलते भागते नज़र आएँगे। सत्वगुण शांति लाएगा, रजस दुःख और तमस् मूढ़ता। इसलिए तीनों गुण की जितनी मात्रा हम रखेंगे उतनी ही शांति, दुःख और मूढ़ता में हमारा जीवन व्यतीत होगा। 


सत्व गुण ज्ञान देता है। जब मन मस्तिष्क रूपी तालाब में क्षोभ के तरंग नहीं उठते तब वह सत्य को पहचान लेता है और उसमें स्थित हो जाता है। अमृतसर में अवस्थित मन फिर सुख दुःख और राग द्वेष से प्रभावित नहीं होता और हमेशा आत्मस्थ होकर शांत और स्थिर रहता है। आत्मलीन हो जाता है।पशु प्रमाता अपने ज्ञान संकोच से परतंत्रता के दुःख से दुखी रहता है और पति प्रमाता की स्थिति में ज्ञान विस्तार से स्वतंत्रता के आनंद में रत रहता है। प्रत्यभिज्ञा जाग्रत अवस्था है। स्वस्थ अवस्था। अहंविमर्श। ज्ञानं जाग्रत। 


रजस क्रिया का प्रतीक है। माया नगरी में भेद दर्शन करने से विकल्पों के प्रति दौड़ने लगता है। मैं यह पा लूं वह पा लूं की मानसिक दौड़ चलती रहती है। शरीर मन के दौड़ाये दौड़ते दौड़ते थक जाता है और मर जाता है। मन जो माँगे वह मिल जाए तो उसे छोड़कर फिर एक नई चाह में उसकी दौड़ चलती रहती है। और जब कामना पूरी नहीं होती मन दुःखी हो जाता है। जो है उसका सुख भोग नहीं सकता और जो नहीं है उसके दुःख से दुखी रहता है। भाव का सुख नहीं और अभाव का दुःख। असत्य के पीछे की यह दौड़ स्वप्न अवस्था है। पशु प्रमाता के स्वप्न की सृष्टि अस्थिर क्षणभंगुर होती है। स्वप्नो विकल्पाः। 


एक सत्य (शाश्वत) का उपासक दूसरा असत्य (नश्वर) का। एक तीसरा वर्ग है जिसे न तो सत्य की पड़ी है न असत्य की। वह निद्राग्रस्त है। जो है, जहां है, बेफ़िक्र अपनी नींद में है। न उसे इहलोक से मतलब न परलोक से। बचपनी जवानी बुढ़ापा इसके लिए आता है और चला जाता है। विवेक शून्य अवस्था। माया आवरण इतना ढँका हैं कि ज्ञानप्रकाश कि किरण नहीं निकलती। सुषुप्ति ही उसका सुख है। अविवेको मायासौषुप्तम्। 


लेकिन इन तीनों में आशा की एक किरण मौजूद है। शिव संकोच है पर शिव अदृष्ट नहीं। तुरिया का धागा पिरोया हुआ है। जब गुरू मशाल की ज्योत का उसे स्पर्श हो जाता है, वह ज्योति भी प्रज्वलित हो उठती है। वह जाग जाता है तुरीय में।  जाग्रत स्वप्न सुषुप्त भेदे तुर्याभोगसंवित्। फिर चौबीसो घंटे शिव समाधि। तुरिया ..तु (अहं विमर्श) रिया… मैं (अहंकार) गया। 😊


पूनमचंद 

२ जून २०२३

Thursday, June 1, 2023

भोर भई उठ जाग रे मनवा ।

 भोर भई उठ जाग रे मनवा।


बाहर अंधेरा है और अभी भोर होने को है। सुबह के ३.३० हुए है। मेरा सुषुप्त शरीर जाग गया है। ब्रश और हाजत कर मैं अपने ऑफिस कक्ष में बैठा हूँ। बग़ल में एक तालाब है। मेंढक बिना रूके टररर.. की आवाज़ लगाये हुए है। बीच बीच में टिटिहरी और दूसरे पक्षीओ की आवाज़ आ रही है। दूर के गाँव में कुत्तो ने अपनी सरहदी सुरक्षा के लिए भोंकना शुरू कर दिया है। चिड़ियों की चहचहाहट बढ़ रही है। बीच बीच में रोड पर ट्रक चलने की आवाज़ आ रही है। हवा को चिरता एक हवाई जहाज़ भी गुजर गया। और इन सबके बीच मेरी घड़ी की टकटक चालु है और मैं  मेरे कर्ण को लगाकर इस खेल का साक्षी चैतन्य बन बैठा हूँ। 


कहाँ हो रहा है यह सब? अभी थोड़ी देर पहले जब मैं सोया था तब तो सब शांत था क्योंकि मैं सुषुप्त था। मेरे कान होते हुए भी अचेत थे इसलिए यह सब आवाज़ होते हुए भी मैं उससे वाक़िफ़ नहीं था। 


जागा और आवाज़ सुनाई दे रही है उसका पता चला। सोया था तब आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी यह भी पता चला। यह कौन महाशय है जिसे दोनों का पता लग गया? बीच रात में एक सपना भी चला था उसकी भी खबर है। है कोई चेतना जिस के पर्दे पर यह सब अंकित होता रहता है। वह न बड़ी होती है न छोटी। न आगे चलती है न पीछे। जब से मैंने होश सँभाला ज्यों की त्यों उदीयमान स्थिति में मौजूद है। निश्चल नित्य। अगर वह नहीं तो मेरा कोई वजूद ही नहीं। यह मेरा शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार किसी काम के नहीं रहते। यह मेरी पंच ज्ञानेंद्रियाँ और पंच कर्मेन्द्रियाँ क्या करती? 


कौन जागा? कौन सोया? किसने सपने देखें। किसने यह तीनों की खबर रखीं? जाग्रतस्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगसंभवः। वह तुरीया है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के मनके की बीच तार की तरह पिरोयी हुई है। चलित मन की क्रिया में वह अचल नित्योदित और अखंड है। एक पुर्यष्टक है और दूसरा उसको चेतना देने वाला चैतन्य। एक को हम आत्मा/जीव कहे और दूसरे को परमात्मा। एक चलती है, दूसरा चलाता है। एक बनती बिगड़ती है दूसरा उसको रीपेर करता रहता है। जैसे वह कमजोर हुई नया शरीर दे देता है। जब तक उसका मन भरा नहीं तब तक सैर सपाटे करने देता है। वह जैसा चाहे उस ओर चलने की ऊर्जा देता रहता है। 


कोई विरला जब मन की यह यात्रा से थक जाता है, पुनरपि पुनरपि से ऊब जाता है तब वह मुड़ता है भीतर की और। चेतना की ओर। और उसे दर्शन हो जाते है। स्वयं के। स्वगुरू के। प्रकाश के। पहचान के। बस स्थित हो जाता है। फिर तेरह की चाल तो होगी लेकिन न कोई भय होगा न बंधन। कलह सब समाप्त। अमर को मरने का भय कैसा? सामान्य को विशेष की परवा कैसी? अखंडता में फिर किसे अपना कहेगा किसे पराया? सब मैं और मेरे ही रूप। सृष्टि लीला के लिए कार्यरत। जो जो संसार खेल से बाहर होगा (बाहर मतलब सब छोडछाड भाग नहीं जाना है), वह अनंता और अमरता में विलीन होगा। नष्ट नहीं होगा। बिंदु भान से सिंधु भान में परिवर्तित हो जाएगा। शरीर चलता रहेगा और एक दिन सूखे पत्ते की तरह शरीर बिखर जाएगा लेकिन चैतन्य अमर है, अमर रहेगा। 


शिव है। शक्ति है। संसार खेल है। तीनों ही एक रूप। सर्वं शिवं। 


पूनमचंद 

१ जून २०२३

Tuesday, May 30, 2023

शुद्ध विद्या।

 शुद्ध विद्या ।


कश्मीर शैव दर्शन अद्वैत वेदांत से थोड़ा हटकर है। केराला और कश्मीर दर्शन एक ही शिव की दो भिन्न व्याख्या करते है। एक का शिव अकर्ता है जबकि दूसरे का ज्ञाता भी और कर्ता भी। पंचशक्ति से पंचकृत्यकारी, रंगमंच बनकर खुद ही नर्तक बन खेल खेल रहा है। 


यह अस्तित्व शिव से लेकर पृथ्वी तत्व तक ३६ तत्वों में परम शिव का प्राकट्य-संकोच है। आरोह क्रम के ३१ वें पायदान पर और अवरोह क्रम के पाँचवें पायदान पर एक तत्व है जिसका नाम है शुद्ध विद्या। सीडी का यह पड़ाव अवरोह में वास्तविक आध्यात्म की शुरुआत है। उसके नीचे माया मंडल में सब भेद ग्रस्त है और भेदमयी प्रमाता अपने अभेद रूप का साक्षात्कार नहीं कर सकता। इसलिए KSD में शुद्ध विद्या के उदय को अधिक महत्व दिया जाता है। 


क्या है यह शुद्ध विद्या? कहाँ रहती है? कौन देता है? शुद्ध विद्या प्राप्त होने से क्या होता है? इत्यादि प्रश्न हर साधक के मन में उठेंगे। 


दिमाग़ का दहीं हम अलग अर्थ में समझते है लेकिन दहीं के शोधन से जो मक्खन निकलता है उसके मूल्य और महत्व से हम भलीभाँति परिचित है। ठीक इसी प्रकार जब हमारी बुद्धि का शोधन होता है तब उसमें से शुद्ध विद्या प्रकट होती है। इसका मतलब जैसे दूध में मक्खन रहता हैं वैसे शुद्ध विद्या हमारी बुद्धि के भीतर रहती है। 


हमारी बुद्धि खंडित है और जगत को खंड खंड कर देखती है, मेरे तुम्हारे में बाँटती है। व्यक्ति धर्म, पक्ष, जाति, लिंग, पद, प्रतिष्ठा के संकोचन से ग्रसित होकर छोटा बन जाता है। अहंता (मैं और मेरा) और इदंता (तुम, तुम्हारा) भेद बना रहता है।  बुद्धि के इस संकोच की वजह से वह अपनी अभेद पहचान में न दाखिल हो सकता है न स्थित हो सकता है।  


वास्तव में अहंता और इदंता दो अलग-अलग नहीं अपितु एक है। दोनों ही चित् प्रकाश है। अहं भी चित् प्रकाश और इदं भी चित् प्रकाश। बुद्धि जब अहंता और इदंता में ऐक्य मति साधेगी तब अखंड होगी, अखंड दर्शन को प्राप्त करेगी तब जाकर उसकी व्याप्ति होगी जिससे प्रमाता अपने स्वरूप की पहचान में अग्रसर होगा। यह शुद्ध विद्या का उदय है। जिससे हम परम शिव तत्व में अवस्थित हो जाएँगे। ज्ञात्री ज्ञान और ज्ञेय त्रिपुटी निर्विकल्प हो जाएगी। तीनों एक ही चिन्मय प्रकाशित हो उठेंगे। आत्मा का प्रकाश ही तीन रूप धरकर यह जगत क्रीड़ा में प्रवृत है, यह प्रमाणित हो जाएगा। आत्म प्रकाश की व्याप्ति। 


बुद्धि निर्मल होगी तभी तो सब जगह आत्म प्रकाश को देखेगी। आत्म प्रकाश के शरीर दर्शन से यह संसार सुंदर बन जाएगा। खायेगा शिव। पिएगा शिव। चलेगा शिव। शिव के शिवा और कोई नज़र नहीं आएगा। पर शिव समावेश में सब भेद मिट जाएँगे और अभेद को प्राप्त होगा। 


विशेष मिटकर जब वह सामान्य होगा तब यह घटित होगा। अत्यंत स्थिरता में गति और अत्यंत गति में स्थिरता को प्राप्त होगा। शिवरूप शक्ति और शक्तिरूप शिव, प्रकाशरूप विमर्श और विमर्शरूप प्रकाश की प्रत्यभिज्ञा करेगा। गंगा जल (ज्ञान) में डूबकी लगायेगा और ग़म-आगम पाकर खुद ही ज्ञान बन जाएगा। 


बुद्धि की सामान्यता, निर्मलता और शोधन ही उपाय है शुद्ध विद्या पाने का। और शुद्ध विद्या के बिना साक्षात्कार (self realisation) नहीं। 


अजब ग़ज़ब का खेल है। प्रत्यभिज्ञा होगी नहीं तब तक मानेंगे नहीं और प्रत्यभिज्ञा करने मानना ज़रूरी है। 😊


पूनमचंद 

३० मई २०२३

रसो वै सः।

 रसो वै सः। 

रस ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। 


वह रस रूप है। जो इस रस को पा लेता है वह आनंदमय बन जाता है। 


रस आनंद है। जिसका आस्वादन किया जाता है, स्वाद लिया जाता है और जो प्रवाहित है। 


चैतन्य घन कूटस्थ है। है बस। एक सुंदर पुरूष टुकुर-टुकुर देखता रहता है और करने के लिए ललिता सुंदरी रूप में प्रवाहित हो उठा है। स्पन्दायमान है।  


जैसे एक काव्य में रस है और गन्ने भी रस है। दोनों के रस ग्रहण की इन्द्रियां अलग-अलग लेकिन ग्राहक एक है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध की तन्मात्रा और उसके पदार्थों में जो रस द्रवित हो रहा है उस रस पर और रस के पान के आनंद पर हमारा ध्यान होना है। ऐसी कौनसी क्षण होगी जब हम पंचेन्द्रियों से इस रस का भोग नहीं करते? हर क्षण वह जोड़ी ललिता और शिव मौजूद रहते है। अगर उसकी मौजूदगी में डूब गये और खुद को खो दिये तो बिंदु को सिंधु बनने में देर नहीं लगती। परंतु अहंकार से भोग को ही योग मानकर पंचेन्द्रियों के विषय के प्रति भागना शुरू करके शरीर, मन, बुद्धि, प्राण के ह्रास में लग जाना बेईमानी होगी। 


रस के आस्वादन को पकड़ते पकड़ते उस रसकेन्द्र को पकड़ लेना है जहां शिव और सुंदरी बैठे है। अपनी ही मुलाक़ात करनी है और फिर उसमें खो कर मस्त रहना है। फ़क़ीरी मस्ती भी रस रूप है। फ़क़ीर का अर्थ गरीब है लेकिन उसमें रस की अमीरी है। 


जब मैं रस लेता हूँ तब शिव और सुंदरी आएँगे ऐसा नहीं। जब दूसरे भी रसास्वादन करते हो, वह मौजूद होते है। जब गाय और भैंस जुगाली करते हो तब उस रसानंद का अवलोकन कर उसका स्पर्श कर लेना। 


रस सिर्फ़ हमारे अपने खाने से ही नहीं आता। शिवघेरा बड़ा करना है। हम तो सिसकी ले ले पर और वैश्वानरों पर से भी ध्यान नहीं हटाना है। रस को खोजो। यह संसार रस से भरा है। मदिरालय है। 


सब जानते हैं कि खाने के बदले खिलाने का आनंद अधिक होता है। त्याग से भोगना अप्रतिम है। तेन त्यक्तेन भुंजीथा। यहाँ कौन है, जो ईश नहीं? ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगतियां जगत्।


पूनमचंद 

३० मई २०२३

Monday, May 29, 2023

स्पन्दकारिका रेस्टोरेन्ट।

 स्पन्दकारिका रेस्टोरेन्ट। 


जैसे अगर सूरज की रोशनी नहीं होती तो यह पूरा विश्व हमारे लिए एक घोर अंधकार होता। लेकिन अघोर सूरज की रोशनी आते ही यह विश्व रंगोत्सव बन गया। पंच विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) सक्रिय हो उठे और हम इस अस्तित्व को अन्न बनाकर उसके भोग में लग गये। लेकिन ऐसा करते करते भूल ही गये कि वह कौन सी रोशनी है जो इस अन्न को प्रकट कर रही है और उसका भोग लगा रही है। 


अगर कमरें में पड़े सोफ़ा, टेबल, कुर्सी, कालीन, इत्यादि में सूरज को पहचान लिया तब तो चेतना ही चेतना नज़र आएगी। रोशनी पहले और वस्तु बाद में नज़र आएगी। अमेरिकन चित्रकार ऐन्ड्रु वेथ के चित्र में दरिया की समीर (breeze) पहले दिखेगी और खिड़की का पर्दा बाद में। मूर्त में अमूर्त प्रकट है। शास्त्रीय और सार समझना होगा तब प्रज्ञा का विस्फोट घटेगा। सबकुछ खुल जाएगा। फिर तो उसमें में ही चलना, उससे ही बोलना, उसको ही खाना, उसको ही खिलाना। कैसे उसे न पहचानूँ, जब सर्वत्र वही है। 


अरूप में निश्चल चेतना और चलायमान रूप में यह पूरा विश्व। शिव शक्ति सामरस्य। यह विश्व उसकी ही अभिव्यक्ति है। पुरूष शक्ति बनकर प्रकट है। इसलिए हम सब तेरह से जो भी करते है, भोगते हैं उसका भोक्ता, भोज्य और भोजन भगवान ही है। वही सुवर्ण ज्योति की प्रत्यभिज्ञा करनी है। स्वयं की प्रत्यभिज्ञा करनी है। स्पन्दकारिका रेस्टोरेन्ट सुविधा करेगी लेकिन ‘जय दुर्गे’ बोलकर निवाला हमें रखना है। वह दोनों जो हमारे माता पिता है, बुलाते ही प्रकट हो जाएँगे। पिता चुप है लेकिन माता उसकी खबरी बनी खड़ी है। अगर पिता ग़ायब हुए तो माता भी ग़ायब हो जाएगी। दोनों एक ही है लेकिन कर्ता और कर्म में विभाजित होकर दो दिखते है। अन्यथा अन्न भी वही अन्न भोक्ता भी वही। पहचान लो। स्पन्दकारिका रेस्टोरेन्ट अभी खुली है। 😊


अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो२ऽहमन्नादो२आहमन्नादः। अहं श्लोककृदहं श्लोककृदहं श्लोककृत्। अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य।पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि।यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्‌।सुवर्न ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत्‌॥(तैत्तिरीय.५)


मैं अन्न हूँ! मैं अन्न हूँ! मैं अन्न अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ! मैं अन्नभोक्ता हूँ! मैं 'श्लोककृत्' (श्रुतिकार हूँ! मैं श्लोककृत् हूँ! मैं श्लोककृत हूँ! मैं 'ऋत' से प्रथमजात हूँ; देवो के भी पूर्व अमृत के हृदय (केन्द्र) में मैं हूँ। जो मुझे देता है, वस्तुतः वही मेरी रक्षा करता है क्योंकि मैं ही अन्न हूँ, अतः जो मेरा भक्षण करता है मैं उसी का भक्षण करता हूँ। मैंने इस सम्पूर्ण विश्व को विजित कर लिया है तथा इसे अपने अधीन कर लिया है, सूर्य के ज्योतिर्मय रूप के समान है मेरा प्रकाश।" जो यह जानता है वह इसी प्रकार गान करता है। वस्तुतः यही है उपनिषद् यही है वेद का रहस्य।


रसो वै सः। वह रसरूप है। God is the essence of all we experience. रसं ह्येवायं लथ्यानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् व्य प्राण्यात्।

यदव आकाश आनन्दो न स्यात्। एव ह्येवानन्दयाति। भगवान रस—रूप है। उसी रस को पाकर प्राणी—मात्र आनंद का अनुभव करता है। यदि वह आकाश की भांति सर्व—व्यापक आनंदमय तत्त्व न होता, तो कोन जीवित रहता और कोन प्राणों की चेष्टा करता? वास्तव में वही तत्त्व सबके आनंद का मूलस्रोत है।


आनंद ही स्वातंत्र्य है। स्वातंत्र्य ही आनंद है। उसे खोजने की स्पन्दकारिका रेस्टोरेन्ट स्वयं है। स्वात्मा के प्रकाश को पहचानें और सर्वात्मा का दर्शन कीजिए जो सबके ह्रदय के भीतर बैठा है। चुप है लेकिन अंधा नहीं। सब की खबर रखता है। माँ की चोकी है। 


ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।भगी.4.24।।


{अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है;  ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है,  वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है।।}



जय दुर्गे। 

हर शिव।  


पूनमचंद 

२९ मई २०२३

Powered by Blogger.