मृत्यु परिचय (चौपाई छंद)
गांधीनगर की गटर जर्जर,
नई बनी पर विपदा सरसर।
सड़क बनी, पर राह बिगाड़ी,
फुटपाथ में खाई उघाड़ी।
धवल गया जब सौराष्ट्र दूर,
घर की राह सुधारूँ भरपूर।
काम सरल था, मन न डरा,
किसी कीट ने दंश किया।
भोर हुई तो उँगली सूजी,
तर्जनी पीड़ा से थी भूजी।
दिन चढ़ता पीड़ा बढ़ती,
मन की शांति दूर ही रहती।
दवा, पट्टी सब आज़माया,
पर विष भीतर ही रह पाया।
डॉक्टर बोले—कट जरूरी,
मैंने कहा—करो जो पूरी।
तीन सूइयाँ, फिर चीरा गहरा,
निकला भीतर का सारा पहरा।
सुन्नी चाही थी उँगली क्षण,
पर पीड़ा बन गई दहकन।
कराहता घर लौट के आया,
सोफे पर बैठ जल मंगवाया।
गुनगुना जल जैसे ही पिया,
अँधियारा पल में छा लिया।
सुध-बुध टूटी, तन बिन डोर,
इन्द्रिय जैसे टूटी छोर।
नींद नहीं, था शून्य गहन,
जागा तो भी शेष नयन।
फिर भीतर डूबा चेतन क्षण,
सर से पाँव पसीना तन।
हाथ ठंडे, पाँव निष्प्राण,
लक्ष्मी-उज्ज्वल चिंतित जान।
नाड़ी, ऑक्सी, बीपी देखी,
चारपाई पर देह को सेकी।
धीरे-धीरे लौटा होश,
कॉफी से टूटा वह कोष।
सब सामान्य फिर हो गया,
पर भीतर कुछ ठहर गया।
जिस घड़ी चेतना बुझ-सी गई,
मृत्यु की देहरी छू आई।
15 January 2026