Monday, June 27, 2022

श्रद्धावानम् लभते ज्ञानं (गीता ४.३९)

श्रद्धावानम् लभते ज्ञानं, संशयात्मा विनश्यति। 


श्रीमदभगवद्गीता के चौथे अध्याय ‘ज्ञानकर्मसंन्यासयोग’ के श्लोक ३९ और ४० में से एक एक वाक्य उठाकर बना बोध वाक्य बड़ा प्रचलित है। 


जवाब चल रहा है अर्जुन के तीसरे अध्याय के प्रश्न का कि मानुष न चाहते हुए भी मजबूरन किसकी प्रेरणा से पाप करता है? 


भगवान उसका जवाब देते हुए रजोगुण से उत्पन्न काम को कारण बताते है। जैसे धुम्रअग्नि का मैल दर्पण को ढक देता है वैसे ही काम ज्ञान को ढक देता है।उस कामरूपी शत्रु को मारने की सलाह देते हुए भगवान आगे चौथे अध्याय में अविनाशी योग की बात करते है, जो उन्होंने पहले सूर्य को, सूर्य ने वैवस्वत मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु राजा को कहा था। 


अर्जुन पूछता है आप तो अभी जन्मे है फिर सूर्य को कैसे कहा? 


भगवान बताते हैं कि मेरे और तुम्हारे कईं जन्म हुए हैं, तुम नहीं जानते पर मैं जानता हूँ। अजन्मा अविनाशी और सब के ईश्वर होते हुए भी मैं प्रकृति के अधीन योगमाया से साधुपुरूषो के उद्धार, पापकर्म करनेवाले का विनाश और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होता हूँ। 


जो मनुष्य मेरा जन्म और कर्म दिव्य है ऐसे तत्व रूप से जान लेता है वह पुनर्जन्म नहीं, मुझे पाता है। राग, भय और क्रोध से मुक्त, मेरे में अनन्य प्रेम और मेरे आश्रित साधकों ने ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को पाया है। 


आगे गुण कर्म भेद से चातुर्वर्ण्य, कर्म अकर्म, कर्मबंधन से मुक्ति की बात करते हुए भगवान कहते हैं कि कामना और संकल्प के बिना किये कर्म ज्ञानाग्नि में भस्म हो जाते है। इसलिए कर्मफल की आसक्ति त्याग कर, नित्य तृप्त, आश्रय रहित, शरीर धर्म के कर्म करें तो भी पाप नहीं करता। 


ब्रह्माग्नि में अभेद दर्शन करते हुए विषयों को संयमरूपी अग्नि में आहुत करके हुए आत्मसंयम योगी; अष्टांग योगवाले, अहिंसा आदि व्रतवाले, प्राणायाम करनेवाले, यह सब यज्ञों से कर्मबंधन मुक्त होकर सनातन ब्रह्म को पाते है। 


लेकिन द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ उत्तम है। इसलिए निष्कपट होकर ज्ञानी महात्मा से तत्वज्ञान का उपदेश ले। “उस ज्ञान से तुम सब भूतों को पहले अपने में, और फिर सब को मेरे (परमात्मा) में देखेगा”। 


सब से बड़ा पापी भी इस ज्ञानरूपी नौका से पापसागर को तर जाता है। जैसे अग्नि काष्ठ को भस्मीभूत करता है वैसे ज्ञानाग्नि समग्र कर्मो को भस्म कर देता है। ज्ञान जैसा पवित्र और कुछ नहीं। 


ऐसे आत्मज्ञान को श्रद्धावान, तत्पर और संयत इन्द्रियोवाला (faith, devotion and self control) प्राप्त कर लेता है। जिसे पा कर वह परम शांति (supreme peace, absolute happiness, सब दौड़ का अंत) को प्राप्त कर लेता है। 


लेकिन जो अज्ञानी है, अश्रद्धालु है, संशयी है उसका विनाश यानि पतन होता है। ऐसे संशयी मनुष्य को इस लोक या परलोक में सुख प्राप्त नहीं होता। वह उपर दर्शाये परम शांति को नहीं प्राप्त कर सकता।  


इसलिए हे भारत, तुम ह्रदय (स्थूल ह्रदय नहीं अपितु जहां प्रेम और सद्भाव है) में रहे अज्ञान जनित अपने संशय को ज्ञान तलवार से चीर कर उठो। 


अर्जुन उठ गया, आप भी उठें। 


पूनमचंद 

२७ जून २०२२

Sunday, June 12, 2022

बुद्ध पूर्णिमा।

 बुद्ध पूर्णिमा बधाई।🪷🌕


“खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं"


बौद्धों ने आत्मा को माना या नहीं माना यह स्पष्ट नहीं है। ईश्वर को नहीं माना परंतु संसरण और पूर्व जन्म और पुनर्जन्म को माना है। 


संसरण से ही तो संसार बना है। 


किसका संसरण हुआ? कोन बंधन में है? कौन मुक्त हुआ। प्रश्न स्वाभाविक है। 


वैशाख पूर्णिमा की मंगलमयी रात को बोधिवृक्ष के नीचे बैठे सिद्धार्थ गौतम बुद्ध हुए।अज्ञान से निवृत्त होकर प्रज्ञान की रश्मियाँ को प्राप्त हुए। सूक्ष्म से सूक्ष्म आंतरिक क्लेश मैल सब दूर हुए और विमल धर्मच़क्षु प्राप्त किये। कर्म बंधन टूट गये और चित्त बंधन मुक्त हो गया। मन वितृष्ण हो गया। मोह (मूढ़ता), माया (मरीचिका), विभ्रम (विपल्लास) का कुहरा गया। सत्य का साक्षात्कार हुआ। 


विमुक्ति रसास्वादन करते हुए बुद्ध के मुँह से परम उदान शब्द हृदय से निकले। (परावाक्)। 


अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं । गहकारं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं ।। 


गहकारक ! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि। सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसडृतं । विसड्रृारगतं चित्तं तण्हानं खयमज्झागा ।।


{(इस काया - रूपी) घर को बनाने वाले की खोज में (मैं) बिना रुके अनेक जन्मों तक (भव-) संसरण करता रहा, किंतु बार बार दुःख (-मय )  जन्म ही हाथ लगे। ऐ घर बनाने वाले !  (अब )  तू देख लिया गया हैं, (अब) फिर (तू)  (नया) घर नहीं बना सकता। तेरी सारी कड़ियां टूट गयी हैं और घर का शिखर भी विशृंखलित हो गया हैं । चित्त पुरी तरह  संस्काररहित हो गया हैं और तृष्णाओं का क्षय (निर्वाण) प्राप्त हो गया है।}


बुद्ध को ऐसी सम्यक सम्बोधी प्राप्त हुईं सारी सच्चाई आंखों के सामने आ गयी। देख लिया उस घर बनाने वाले को और सामग्रियों को। जब सामग्रियाँ ही नष्ट कर दी फिर किससे बनेगा घर? संस्कारों से विहीन चित्त परिशुद्ध हुआ। काम तृष्णा, भव तृष्णा, विभव तृष्णा गई। 


कौन था यह घर बनाने वाला? 


देवपुत्र मार (मृत्यु राज)। 


कौन हैं यह मार?  


हमारे अंतर्मन में समाए हुए सभी प्रकार के कुत्सित संस्कारों का व्यक्तिकरण ही तो मार है। 

जो बार-बार हमारे लिए नया-नया घर बनाता रहता है। नए-नए जन्म द्वारा नया-नया शरीर उत्पन्न करता रहता है। 


बुद्ध के लिए मार लाचार हो गया। घर बनाने की सारी सामग्री यानी सारा पूर्व संचित संस्कार ही छिन्न - भिन्न हो गया। नया संस्कार बनाने वाली सारी लालसाएं जड़ से उखड़ गयी।  


भूतकाल के संग्रहीत संस्कार और भविष्य के प्रति जागने वाली तृष्णाएं ही तो हमारे लिए नए-नए भव का कारण बनती है। ये दोनों खत्म हो जायँ तो नया भव बनना रुक जाय । आग का जलावन समाप्त हो जाय तो आग अपने आप बुझ जाय। बिना जलावन आग किसको लेकर जले?   


“खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं"। 

(पुराना क्षीण हो गया, नया बन नहीं रहा।)


यहीं तो विमुक्त - अवस्था थी। 


यही तो सम्यक सम्बोधि थी उस बोधिसत्व की। 


यही तो अंधकार पर प्रकाश की विजय थी।  


मृत पर अमृत की विजय थी।   


असत पर सत की विजय थी ।


बुद्धं शरणं गच्छामि। 


पूनमचंद 

१६ मई २०२२

Rise and fall of Buddhism in India

 Rise and fall of Buddhism in India, was it a revolt against Brahmanism or a philosophical challenge? 


Vedic Dharma was a Brahmin Dharma in which the religious teachings were followed by the Brahmins and the society was into four categories based on professions and accordingly people were performing their duties and passing life. Performing sacrifices (at the cost of Yajman!) was the duty of the Brahmins, fighting was the duty of Kshatriya, trading was the duty of Vaishyas and service was the duty of Shudras. 


The yagyas and sacrifices were not the common practice of large majority of the country except the rituals on birth, marriage and death. The dwij concept was mostly followed by Brahmins and to some extent by the Kshatriyas. However, the practice of classifying people as upper and lower by birth was prevalent. Intercaste marriages were seen as a downfall of the character of an individual. 


Suddhodana, the father of Siddharth Gautam was the King of Sakya kingdoms of Kapilvastu, a Ganarajya where the polity (rules of administration) was decided by the nobles/important group leaders. The Sangha made of youthful males and adults was powerful. As a young man of 20y Sidharth Gautam became a member of Sakya Sangha. The member has to safeguard the interests of the Sakyas by body mind and money, attends all meetings and exposes faults without fear or favour. There was disqualification in case of the member commits rape or murder or guilty of giving wrong evidence. 


On the 8th year of his membership Gautam came in conflict with the Sangha. There was a State of Koliyas bordering the state of Sakyas. Both the kingdoms were subordinate to the Koshalas. The two kingdoms were divided by the river Rohini. The water of Rohini was used for irrigation by the farmers of both the kingdoms. Every season, there used to be disputes regarding who take water of Rohini first and how much. That year, they had a clash and the servants of both the sides suffered injuries. The Senapati of Sakya called a meeting of the Sangha to consider the question of declaring war against the Koliyas. Siddharth Gautam opposed the resolution. He believed that war doesn’t solve problem instead one war becomes seed for another war. He proposed careful investigation to ascertain the guilty party. He heard that their men had also been aggressors and were not free from the blame. The amendment in the resolution proposed by Gautam was lost by an overwhelming majority. The Senapati put his resolution to waging war to vote that Gautam opposed. When Senapati argued that fighting is the Dharma of Kshatriya, Siddharth pleaded that his Dharma consists in recognising that enmity does not disappear by enmity. It can be conquered by the love only. The majority didn’t agree with Gautam and the resolution of the Senapati was passed. (What would our majority of present day choose if they are asked?) 


Next day in another meeting called for the plan of mobilisation of youths of 20-50 age group, the minority of the previous day remained present but none except Gautam opposed the mobilisation. The Senapati grew angry and explained the consequences of his oppose to the Sangh decision and the power of Sangha to order the offender to be hanged or exile or declare social boycott and confiscate family land without the permission of the King of Kosalas. Gautam continued with his opposition of war against the Koliyas. Finally, he accepted his guilt of opposing the decision of the Sangha and chose the second alternative, the exile to save his family and father from social boycott and confiscating the land which was their means of livelihood. The Senapati feared accepting the suggestion of Siddharth to accept exile or death voluntarily as that may invite action against the Sangh by the King of Koshalas. Gautam thereafter proposed a way out, “I can become a Parivrajaka and leave this country. It is a kind of exile”. Gautam assured that he would obtain permission of his parents and wife and leave the country whether he obtains their consent or not. Before conclusion of the meeting, Gautam was allowed to speak. He proposed to postpone the war for sometime so that the King of Koshalas shouldn’t find connection between his renunciation and the decision of war. The Sangh agreed and postponed the commencement of hostilities against the Koliyas. 


Gautam returned home and took consent of his parents and wife. How great was Yashodhara! She replied, “your decision is the right decision. You have my consent and my support. I too would have taken Parivraja with you. If I do not, it is only because I have Rahula to look after”. 


Siddharth left home and took Parivraja at the hands of Bhardwaja who had his Ashram at Kapil-Vastu. After Pariv-raja ceremony Siddharth left Kapilvastu and moved to Rajagraha, the Capital city of Maghadha King Bimbisar. He travelled many places in search of the new light, studied Sankhya philosophy and learned Samadhi {breath control (anapanasati), pranayam, dhyana and Samadhi} from Arada Kalam at Vaishali. Sage Uddaka Ramaputta taught him Dhyana technique one stage higher. He learned the technique of higher concentration. He practices asceticism (self mortification, fasting or taking little meal) torturing the body for six years at Gaya. His belly cleave to his backbone and was unable to move. His inner voice reflected, “this is not the way, even to passionlessness, nor to perfect knowledge, nor to liberation”. He questioned, can the mortification of the body be called religion? It is only the mind’s authority that the body either acts or ceases to act. 


Sujata was a daughter of a household named Senani of Uruvela. She had uttered a wish to a Baniyan tree and viewed a yearly offerings if she should have a son. She sent her maid Punna to prepare the site under the Baniyan tree for the offering. Punna found Gautama sitting beneath the Banyan tree and thought him the God of the tree. Sujata came and offered him the food prepared by her in golden bowl. He took the bowl to the river bank, took bath and ate the food. His five ascetics became angry as Gautama broke the life of austerity and left him. On the night of that day Gautama had five dreams and when he interpreted the dreams he was sure to attain enlightenment. He threw the bowl into the river, the bowl floated. He left Uruvela in the evening and came to Gaya and saw a Banyan tree. Facing east, he sat down cross legged and upright under the tree. He had collected enough food to last for forty days. He continued meditation with an aim of obtaining enlightenment for four weeks and reached to the final fourth stage. The first stage was reasoning and investigation, the second stage was concentration, the third stage was of equanimity and mindfulness and the fourth was purity to equanimity and equanimity to mindfulness. On the night of the last day of the fourth week darkness was dispelled, light arose, ignorance was dispelled and knowledge arose. He saw a new way. It was the night of Vaishakh Purnima. Bodhisatva Gautama became Buddha, the enlightened, therefore Buddha Purnima. 


He found the answer to counter sufferings and unhappiness which were not dealt by Sankhya or Samadhi or the asceticism (Jains) the more prevalent practices of those days. 


Kapilvastu was the capital city of the kingdom of his father Suddhodana. Kapil was the ancient sage referred in Gita and the first part of Gita talks more about the Sankhya philosophy. Sankhya was a physicist theory of searching the truth by analysing the 24 elements of nature (as Vastu-things) and the Purusha the reason of creation. It was followed by Yoga and later by Karma Yoga of Jains and Gita. But none of them had satisfactory answers for the suffering of the humans in present life. Either they didn’t have answer or blamed the actions of previous life the reason for sufferings in present life. Buddha worked on the subject, analysed the problem, mediated to find right answer and brought out the ‘art of living’, treating the human mind by following eightfold path to remove the major cause of misery the human desires. 


Thus the circumstances lead him to Parivrajak life, his intuition to find out right answer for the sorrow and unhappiness in the life of millions marched him on the path of Samkhya, Samadhi and Asceticism, and finally found out the reasons for sufferings, the four noble truths, reached to the destination of “middle path” of eightfold path to attain Nirvana, nirvana from three poisons (raga-dwesha-moha: greed, aversion, ignorance); and attained liberation from the Sansaran (sansar), the cycle of rebirth. 


When other philosophies were talking about Atma (I am), he talked Anatta (I am not). ‘I am’ creates ego and attachment while ‘I am not’ keeps one free from attachment and that way make free from greed, aversion and ignorance, so that the mirror (intellect) gets clear and reflects the Truth. 


All philosophies of India revolve around ‘I’ and the liberation of the ‘I’. I think Buddha wins amongst all. 


Punamchand 

17 May 2022


NB: the details on story of Buddha taken from a book, “The Buddha and His Dhamma”, by Dr. B. R. Ambedkar.

Life in search of peace

 Life is in search of peace.


The nature has created life on earth from all odds. Its core is hot about 6100° Celsius (hotter than outer layer of the Sun) covered with mantle and crust. 71% of the surface of the earth is covered with water and there are five layers (tropo-strato-meso-thermo-exo) of atmosphere providing protection. Earth was formed 4.5 billion years ago in which the sapiens evolved some 2 lakh year ago. The modern man with technology is in neonatal. The size of the earth compared to the Universe is like a dust particle and human may be smaller than a quark. 


How deep one can dig, the centre is 6378 kms away. Human can play around the crust. One may have a simple question, why do some humans with an average life of 70 years and with a working life of two or three decades opt for disturbances? Who would justify recent Russia-Ukraine war? The whole world is affected by inflation.


This reminds me a story of two dogs Laliyo and Motiyo told to me by my father. They were fast friends. One day Motiyo proposed to go on a pilgrimage but Laliyo denied. At last Motiyo went alone on a pilgrimage. Laliyo stayed back and was happily waiting for the return of his friend. Two three seasons were passed but there was no news of Motiyo, made Laliyo worried. It thought that Motiyo must have died. One day after a year, it saw Motiyo coming back home. It couldn’t recognise Motiyo because it was thin and injured all over the body. After some introductory talk and meal together Laliyo asked Motiyo how was the pilgrimage? Did it enjoy it or not? Motiyo gave affirmative answer on which Laliyo expressed its surprise. But your body speaks something else Laliyo asked. Motiyo replied, ‘my dear friend, I have enjoyed the pilgrimage. The trip was very good as the humans at all the places offered me varieties of food. But the problem was with our tribe. Wherever I went, they didn’t allow me to enjoy the pleasure of life; instead, attacked, injured, chased and made my life like a hell’. 


Are we not like the Motiya’s tribe? Mother Earth has given us enough to live with peace and harmony but we humans prefer man made disasters. God knows what do we wish in life, although there is a surety of death. 


Punamchand 

20 May 2022

ब्रह्मविदाप्नोति परम।

 ब्रह्मविदाप्नोति परम।  


ब्रह्म को जानने वाला परम (मोक्ष) को प्राप्त करता है।तैत्तरीय उपनिषद् के दूसरे खंड ब्रह्मवल्ली के प्रथम अनुवाक का यह वाक्य है। 


तैत्तरीय उपनिषद् यजुर्वेद का ब्राह्मण भाग है। वैदिक साहित्य के तीन भाग है। मंत्र विभाग। ब्राह्मण विभाग और ब्राह्मण का ही उपखंड आरण्यक। मंत्र विभाग मंत्र प्रस्तुत करता है। ब्राह्मण उसकी व्याख्या करता है। 


प्रथम वाक्य में तीन बातें रखी गई। ब्रह्म, उसे जानना और उसका फल मोक्ष। साध्य-साधन-फल। 


पहले फल, लक्ष्य-परम की चर्चा करे जिसे मोक्ष या मुक्ति कही जाती है। परम का अर्थ है जिसको पाने के बाद दूसरी सभी कामनाओं की निवृत्ति हो। परम प्रसन्नता एवं तृप्ति प्राप्त हो। 


कैसे पायेंगे उस परम को? 


ब्रह्म को जानकर। जानना यानि ज्ञान पाना है। ज्ञान साधना है। जो अपनी बुद्धि गुहा में है उसको जानना है। कोई बाह्य चीज की जानकारी नहीं लेनी है। 


कैसे मिलेगी जानकारी? 


तीन साधन है, श्रवण, मनन, निदिध्यासन। ऐसे ही सुनने से काम नहीं बनेगा। सुनना है, समझना है और ठहराकर बार बार ध्यान में लाकर अमल करना है। इसके लिए तैयारी करनी होगी, अनंत संस्कारों से ग्रसित साधन-बर्तन-दर्पण रूप अंतःकरण को तैयार करना होगा। उसकी सफ़ाई, स्थिरता के लिए काम करना होगा। उपासना और कर्म उसी तैयारी के लिए है। विपश्यना भी तैयारी है। एक बार अंतःकरण तैयार हुआ फिर उस पात्र में ज्ञान आरूढ होना ही है। शुद्ध अंतःकरण के लिए एक महावाक्य अहं ब्रह्मास्मि सुनना भी ब्रह्म जानने के लिए पर्याप्त हो जाता है। 


चलिए अब ब्रह्म की बात करे। 


ब्रह्म शब्द बृह धातु से बना है जिसका अर्थ होता है विस्तार-विस्तृत। इसका मतलब यह हुआ कि ब्रह्म शब्द विशेषण (adjective) हुआ। विशेषण नाम को लगता है और उसकी मर्यादा नाम से तय होती है। जैसे कि हम कहें बड़ा हाथी और बड़ा मच्छर, तब दोनों में विशेषण बड़ा है पर हम दोनों को अनुपात से कितना बड़ा हाथी या कितना बड़ा मच्छर यह कल्पना कर लेते है। विशाल सरोवर की कल्पना भी ऐसे कर लेते है। अब यहाँ तो शब्दातीत का नामकरण करना है। कैसे संभव होगा। विस्तृत या विस्तारित यानी कितना? ऋषियों ने इसलिए विशेषण को ही नाम बना लिया। अमर्यादित (infinite) कर दिया। कितना विशाल? बुद्धि विशालता की जितनी भी कल्पना कर सके उससे भी विशाल। वह तत्व जो सर्वत्र है, सर्व व्यापक है, उसका कहीं अभाव नहीं है, जिसके एक अंश मात्र में समस्त ब्रह्मांड समाहित हो जाते है वह व्यापक ब्रह्म है। जो परिपूर्ण है, जिसमें कोई कम ज़्यादा नहीं हो सकता वैसा निरतिशय। 


ब्रह्म को जानने वाला उस परम को प्राप्त करता है। ब्रह्म और परम दो अलग नहीं है। ब्रह्म ही परम है। ब्रह्म प्राप्ति ही मोक्ष प्राप्ति है। अब जो इतना व्यापक है कि जिसमें अनंत ब्रह्मांड समायें है उसमें हम भी तो समाये है। वह हमसे दूर कैसे हो सकता है? प्राप्त ही है पर हमें पता नहीं। इसलिए जानना पड़ता है कि किसे ब्रह्म कहते है? ब्रह्म कोई परिच्छिन्न वस्तु नहीं है जिसे पाना है। जो हमसे अलग नहीं है, जुदा नहीं है, जो प्राप्त है, मेरा अपना स्वरूप है, उसे प्राप्त करने में यह विलंब कैसा? यही अविद्या है जिसकी निवृत्ति करनी है। अविद्या की निवृत्ति ही ब्रह्म विद्या है। ब्रह्म का दर्शन ज्ञान से होता है। चर्मचक्षु से नहीं अपितु ज्ञानचक्षु से दर्शन-अनुभव-ज्ञान होता है। 


तैत्तिरीय उपनिषद् इसलिए उस ब्रह्म की व्याख्या करता है।


 दो प्रकार से व्याख्या होती है। एक स्वरूप लक्षण बताकर और दूसरा तटस्थ लक्षण बताकर।तट यानी किनारा, किनारे पर बैठे अलग होकर देखना। जैसे भगवान श्रीकृष्ण को हम कमलनयन या घनश्याम कहे तो यह उनका स्वरूप लक्षण हुआ। और अगर मुरलीधारी या गोवर्धनधारी कहें तो मुरली और पर्वत दोनों बाहर रहकर श्रीकृष्ण को दर्शाते हैं इसलिए यह तटस्थ लक्षण हुए। ब्रह्म की भी वैसे ही स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण से व्याख्या की गई है। 


सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। वह सत्य है। ज्ञान है। अनंत है। यह ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है।


यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत प्रयन्त्यभि संविशन्ति। जिससे भूत उत्पन्न होते है, उत्पन्न होकर जिससे जीते है, और प्रलय में जिसमें विलुप्त होते है वह ब्रह्म है। जगत की उत्पत्ति स्थिति और लय दर्शाते है। यह ब्रह्म का तटस्थ लक्षण हुआ। 


ब्रह्म को स्वरूप लक्षण से जानो। आप ही हो। आपकी अपनी व्याख्या की गई है। आप सत्य हो, ज्ञान हो और अनंत हो। यह ठीक न लगे तो ब्रह्म को तटस्थ लक्षण से जानो। आपकी आँखों के सामने सब कुछ हो रहा है। उत्पत्ति-स्थिति-लय। यह खेल जिस मैदान में हो रहा है वह विस्तृत ब्रह्म है। आप ही वह मैदान हो जिसमें यह खेल चल रहा है। 


जानो जानो जानो। 

सुनो सुनो सुनो। 

श्रवण मनन निदिध्यासन (बार बार ध्यान में लाओ) ही उपाय है। 


बुद्धि गुहा में प्रवेश करो। 

प्राण गुहा में प्रवेश करो। 

हृदय गुहा में प्रवेश करो। 


आपका दीदार दूर नहीं है। 


ब्रह्म को जानने से परम की प्राप्ति है। 


पूनमचंद 

२३ मई २०२२

शांति पाठ।

 शांति पाठ। सह नाववतु। 


हिन्दू शास्त्रों में शांति पाठ का बड़ा महत्व है।विद्या प्राप्ति के प्रतिबंध दूर करने शांति पाठ होता है। विघ्न निवृत्त हो और मन शांत हो।उपसर्ग का उपशमन हो। ग्रंथ लेखन से लेकर समापन तक या उसका अध्यापन और अध्ययन पूरा करने एक प्रार्थना मंत्र पाठ किया जाता है। सभी शांतिदूत पाठों में ॐ सह नाववतु…. और ॐ पूर्णमदः… ज़्यादा प्रचलित है। 


ॐ सह नाववतु ।

सह नौ भुनक्तु ।

सह वीर्यं करवावहै ।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


(परमेश्वर हम दोनों (गुरू-शिष्य, वक्ता-श्रोता) की एक साथ रक्षा करें, दोनों एक साथ विद्या के फल को भोगे, एक साथ विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करे,  विद्या से दोनों तेजस्वी बने, और परस्पर द्वैष (गैरसमज) न करे।) (Aum! May He protect us both together, together may we two relish, together may we perform with vigour, may our study filled with the brilliance, may we not mutually dispute. Aum! let there be peace in me; let there be peace in my environment; let there be peace in the forces that act on me!)


यह मंत्र कृष्ण यजुर्वेद से आया है। कठोपनिषद, तैत्तिरीय उपनिषद् इत्यादि कई उपनिषदों में इसे शांति पाठ के लिए लिया गया है। आमतौर पर भारत में हर आश्रम में भोजन से पहले यह मंत्र गाया जाता है। पर यह भोजन मंत्र नहीं, विद्या मंत्र है।विद्यालयों में, सार्वजनिक समारोहों में, योग सत्र में इसका प्रयोग होता है। 


विद्या मंत्र है इसलिए गुरू और शिष्य दोनों को उसका फल एक साथ प्राप्त होता है। संसार से रक्षित होना है तो वह रक्षा विद्या प्राप्ति से होती है। विद्या का फल जानकारी नहीं है। विद्या का फल निर्भयता और आनंद है। इसके लिए ज्ञान को अनुभव का विषय बनाना पड़ता है। विद्या प्राप्ति के लिए अपने अंतःकरण को अधिकारी बनाना पड़ता है। अधिकारी बनने पूर्ण प्रयत्न करना है, सह वीर्यं। विद्या से सामर्थ्य लाना है इसलिए साधन चतुष्ठ्य से शिस्तबद्ध चलना है। श्रवण करना है। मनन से संशय निवृत्त करने है। बोध का बार बार ध्यान में लाकर अमल करना है। गुरू द्वेष न करे, लेकिन शिष्य में द्वेष हो तो उसकी श्रद्धा डगमगा जायेगी। एक बार गुरू के शब्दों से महत्व चला जाए तो उस शब्दों से अंतर में जो अर्थ प्रकट करना है वह नहीं होगा। इससे शिष्य का ही नुक़सान है। 


तीन प्रकार के ताप की शांति। आध्यात्मिक (शरीर संबंधी), आधिदैविक (दैव जनित), और आधिभौतिक (स्थूल जगत से)। विद्या प्राप्ति में इन तीनों प्रकार से आनेवाले विघ्न से शांति मिले और आत्म विद्या प्राप्त हो जिससे परम श्रेय मोक्ष की प्राप्ति हो। 


विद्या मंत्र है लेकिन कर्मयोगियों को भी उपयुक्त है। वे साथ रहे, साथ भोगें, साथ साथ सामर्थ्य प्राप्त करने हेतु कार्य करे और तेजस्वी बने, परंतु एक-दूसरे का द्वेष न करें। 😊


विद्या प्राप्त करे। सँभालें। द्वेष न करे। 


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


पूनमचंद 

२६ मई २०२२

Shri Krishna Dutam

श्रीकृष्ण दूतम्। 


दूत बने थे श्रीकृष्ण पांडवों के, जाने से पहले पांडवों से परामर्श करते है। 


युधिष्ठिर कहते है कि हमें अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत और पाँचवा जो वे चाहे - ऐसे पाँच गाँव दे दें और भरत वंश का नाश न हो। इसलिए पहला मार्ग तो संधि का रखे। श्रीकृष्ण उसे जवाब देते है कि क्षत्रिय को भीख नहीं माँगनी चाहिए, दीनता उसके लिए प्रशंसा की चीज नहीं है, इसलिए पराक्रमपूर्वक शत्रुओं का दमन कीजिए। 


भीम ने कहा, है मधुसूदन, आप दुर्योधन से ऐसी ही बातें करें जिससे वह संधि के लिए राज़ी हो जाय। युद्ध की बातें कर उसे भयभीत न करें। दुर्योधन के क्रोध से सभी भरतवंशी भस्म हो जायेंगे। भरतवंश को बचाने हम दुर्योधन के नीचे रहकर उसे अनुसरण करने को भी तैयार है। परंतु श्रीकृष्ण उसे द्रौपदी के अपमान के वक्त ली उसकी दुर्योधन वध की प्रतिज्ञा याद कराते हैं और युद्ध के लिए तैयार होने को कहते है। 


फिर अर्जुन ने कहा, हे श्रीकृष्ण, धृतराष्ट्र का लोभ और मोह के कारण अवरोध है पर आप ठीक रीति से प्रयास करे तो तो सफल हो सकते है। फिर भी आप उचित समझें, जिसमें पांडवों का हित हो वह करे। श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं कि दुर्योधन को उसके कर्मो का फल देना है और पृथ्वी का भार उतारना है। 


नकुल ने कहा आपने तीन भाइयों की बात सुनी है। आप शत्रु का विचार जानकर जैसा करना उचित समझें, वही करें।पहले संधि की बात करें बाद में युद्ध की धमकी दें। सहदेव ने कहा आप ऐसा प्रयत्न करें जिससे युद्ध ही हो।भरी सभा में द्रौपदी की जो दुर्गति हुई थी वह दुर्योधन के प्राण लिये बिना कैसे शांत होगी? फिर सात्यकि ने सहदेव से सूर मिलाते कहा, दुर्योधन के वध से ही कोप शांत होगा। बाक़ी यौद्धाओं ने भी ठीक है, ठीक है, कह युद्ध के विकल्प को समर्थन दिया। 


श्रीकृष्णने इसके बाद द्रौपदी से बातचीत की। द्रौपदी सहदेव और सात्यकि की प्रशंसा कर बोली, हे मधुसूदन, दुर्योधन राजभाग न दे तो संधि मत करिए। कोई ढील ढाल न करें क्योंकि शत्रु को दंड देना है। वह उसके अपमान की याद दिलाकर कहती हैं कि हे केशव शत्रुओं से सन्धि की आपकी इच्छा है किंतु आप दुःशासन के हाथोंसे खींचे मेरे केशपास को याद रखें। तेरह साल से मुझे प्रतीक्षा है, दुःशासन की साँवली भुजा को काटकर धूलिधूसरित होते देखना। मेरी छाती तब तक ठंडी नहीं होगी। श्रीकृष्ण धैर्य देते हुए कहते है, हे कृष्णे, तुम शीघ्र ही कौरवों की स्त्रीयों को रुदन करते देखोगी। धृतराष्ट्र पुत्र अगर मेरी बात नहीं सुनेंगे तो कुत्ते और गीदड़ों के भोजन बनेंगे। मैं सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि तुम शीघ्र ही शत्रुओंके मारे जाने से अपने पतियों को श्रीसंपन्न देखोगी। 


अर्जुन फिर कहता हे कि, हे श्रीकृष्ण आप दोनों पक्के संबंधी है इसलिए दोनों का मेल कराकर संधि करावे।श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया कि धर्म के अनुकूल बात करूँगा जिसमें हमारा और कौरवों का हित होगा इतना कह वह रथ में सवार होकर आयुधों के साथ सात्यकि को और सुरक्षा सैन्य लेकर हस्तिनापुर चल दिये। 


यहाँ धृतराष्ट्र ने भी हर्षित होकर उनके स्वागत की तैयारी शुरू कर दी। दुर्योधनने आज्ञानुसार सुन्दर विश्रामस्थान बनवाने आरम्भ किये और श्रीकृष्ण के भव्य स्वागत की तैयारी की। उनके रास्ते में जल छिड़कवा दिया, ध्वज पताकाएँ लहराईं, उनको ठहरने दुःशासन का महल तैयार करवाया। विदुर ने तब धृतराष्ट्र को बताया कि आप धन और अच्छे स्वागत की लालच देकर श्रीकृष्ण को अर्जुन और पांडवों से अलग नहीं कर पाओगे। दुर्योधन ने भी भेंट सौग़ात न देने के विदुर के प्रस्ताव को समर्थन किया। पर यह भी बताया कि जीते जी वह राजलक्ष्मी को पांडवों के साथ बाँटकर भोगना नहीं चाहता। उसने पांडवों को अधीन करने श्रीकृष्ण को क़ैद करने का विचार किया। भीष्म, धृतराष्ट्र और मंत्रियों ने विरोध किया और भीष्म सभा से उठकर चले गये। 


श्रीकृष्ण हस्तिनापुर आये। दुर्योधन के सिवा सभी कौरवों और धृतराष्ट्र, भीष्म आदि ने उनका आगे बढ़कर स्वागत किया। राजमार्ग सजायें गये थे और पूरा हस्तिनापुर आज श्रीकृष्ण दर्शन के लिए राजमार्ग पर था। सभागार में प्रवेश होते ही सब ने अपने स्थान पर से उठकर उनका स्वागत किया। बैठने सुवर्ण का सिंहासन दिया और धृतराष्ट्र ने उनका पूजन सत्कार किया। सत्कार के पश्चात श्रीकृष्ण विदुर भवन गये और इसके बाद बूआ कुन्ती के पास गये। कुन्ती ने अपने पुत्रों को क्षात्र धर्म का संदेश दिया। श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास पहुँचे जहां सुवर्ण के पलंग में बैठाकर दुर्योधन ने उनका सत्कार किया और भोजन के लिए आमंत्रित किया। किंतु श्रीकृष्ण ने अस्वीकार किया। दुर्योधन ने प्रश्न किया तो बताया कि दूत अपना कार्य उद्देश्य पूर्ण करने के बाद ही भोजनादि ग्रहण करता है। तटस्थता बनाये रखने उन्होंने विदुर के भवन आकर उनके घर का भोजन स्वीकार किया और बताया कि वह क्षत्रियों के हित का प्रयत्न करेंगे। 


दूसरे दिन राजसभा में श्रीकृष्ण का स्वागत पूजन हुआ। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर की बात रखी और सन्धि की बात की और पांडवों ने बारह वर्ष वनवास और एक साल अज्ञात वास की शर्तें पूरी की है इसलिए उनके हिस्से का पैतृक राज्य देने का प्रस्ताव रखा। महर्षि परशुराम ने नर-नारायण रूप का वर्णन कर सन्धि करने सलाह दी। ऋषि कण्व ने भी सन्धि सलाह दी। वेदव्यास, भीष्म और नारदजी ने भी दुर्योधन को समझाया। धृतराष्ट्र भी सहमत हुए पर बताया कि वह स्वाधीन नहीं है। दुर्योधन को समझायें तब काम बनेगा। श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में दुर्योधन को समझाने का प्रयत्न किया। सन्धि मे शान्ति है, दोनों का बल मिलकर एक अजेय सेना की संभावना जतायी। दुर्योधन की कमियाँ और पांडवों के सद्गुणोंका ज़िक्र किया। बलाबल मे पांडवों का मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता यह दर्शाया। भीष्म ने भी दुर्योधन को श्रीकृष्ण की बात को मानकर सन्धि स्वीकार संहार रोकने की सलाह दी। द्रोणाचार्य ने भी प्रस्ताव हितकारी बताकर उसे स्वीकार करने की राय दी। विदुर ने भी कहा कि उन्हें दुर्योधन के लिये कम किंतु उसके बूढ़े माँ-बाप की ज़्यादा चिंता है। अंत में धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को युधिष्ठिर के पास जाकर सन्धि कर उनके साथ काम करने को कहा। 


अब दुर्योधन की बारी थी। अपना पक्ष रखने की। उसने कहा कि हे केशव, आप मुझे दोषी ठहरा कर मेरी निंदा करते रहते हो। मुझे तो अपना कोई दोष नहीं दिखता। पांडव शौक़ से जुआ खेलकर अपना राज्य हारे थे और वन गये थे, उसमें उसका क्या क़सूर? फिर बलाबल में खुद को भीष्म, द्रोण, कृप और कर्ण की वजह से बलवान बताया। स्वधर्म और क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करते अगर वे युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए तो उन्हें कोई पछतावा नहीं होगा। उनकी बाल्यावस्था में अज्ञान या भय के कारण पांडवों को राज्य मिल गया था जो अब नहीं मिल सकता। 


श्रीकृष्ण ने जवाब देते बताया कि उसकी वीरशय्या की इच्छा पूरी होगी। पांडवों को जूआ खेलने की खोटी सलाह शकुनि ने दी थी। द्रौपदी के साथ हुए दुर्व्यवहार और  कही अनुचित बातों की याद दिलाई। वारणावत में पांडवों को माता सहित फूंक डालने का भारी यत्न किया था वह याद दिलाया। पांडवों को पैतृक भाग नहीं दोगे तो मरकर देना पड़ेगा। श्रीकृष्ण के कठोर वचन सुनकर दुर्योधन ग़ुस्से से सभागार छोड़ गया। 


फिर गांधारी को दुर्योधन को समझाने बुलाया तो उसने पुत्र मोह के लिए धृतराष्ट्र को दोषी ठहराया। दुर्योधन को फिर से सभा में बुलाया गया। वह क्रोध से भरा था। गांधारी ने उसे पांडवों से सन्धि करने को कहा। लेकिन  दुर्योधन ने माता के वाक्यों पर ध्यान नहीं दिया और वापस निकला। फिर दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुःशासन ने मिलकर श्रीकृष्ण को क़ैद करने की योजना बनाई। सात्यकि यह जान गया इसलिए सुरक्षा के प्रबंध कर जाकर श्रीकृष्ण को सूचना दी। श्रीकृष्ण ने यह बात धृतराष्ट्र और विदुर को बताई। धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को ताकीद कर बुलाया और डाँटा। श्रीकृष्ण ने उसी क्षण दुर्योधन को अपने स्वरूप का दर्शन कराया जिसमें सब देवगण, पांडव, यादव इत्यादि आयुधों सहित मौजूद थे। धृतराष्ट्र ने प्रार्थना की को उन्हें भी ज्ञानचक्षु प्रदान कर यह रूप का दीदार करवाया। फिर उन्होंने अपनी माया समेट सात्यकि और कृतवर्मा का हाथ पकड़कर सभा भवन से चल दिये। वहाँ से कुन्ती को मिले। कुन्ती ने पुत्रों को धर्मयुद्ध करने को कहा। भीष्म और द्रोण ने यह सुनकर दुर्योधन को सन्धि करने समझाया जिससे वह उदास हो गया। 


इधर श्रीकृष्ण कर्ण को रथ में बैठाकर हस्तिनापुर से बाहर लाये और उसे वह कुन्ती पुत्र हैं और पांडव उसके छोटे भाई है यह बताकर पांडवों से जुड़कर राजा बनने का आह्वान किया। परंतु कर्ण ने यह कहकर उसका अस्वीकार किया कि जब कुन्ती ने उसे त्याग दिया था तब सुत माता राधाने उसे स्नेह पूर्वक बड़ा किया है। इसलिए उसके पिण्ड का वह लोप नहीं कर सकता। सुत होकर वह पला बड़ा हुआ है, सुतों में शादी हुई है, बेटे पोते हो चुके है, इस अवस्था में उनको छोड़कर वह लौट नहीं सकता। दुर्योधन ने उसके भरोसे ही युद्ध मोल लिया है उसे वह धोखा नहीं दे सकता। 


श्रीकृष्ण ने फिर कर्ण को कहा कि तुम्हें राज्य प्राप्ति का उपाय भी मंज़ूर नहीं इसलिए जाकर द्रोणाचार्य, भीष्म और कृपाचार्य को सूचना दे दो कि यह महिमा अच्छा है, फलों की अधिकता है, मक्खियाँ कम है, कीच सूख गई है, विशेष गर्मी ठंडी नहीं है, आपसे सातवें दिन अमावस्या के दिन युद्ध प्रारंभ करो। 


कर्ण ने श्रीकृष्ण का आलिंगन लिया और हस्तिनापुर लौट आया और श्रीकृष्ण पांडवों के पास चल दिये। युधिष्ठिर और पांडवों ने श्रीकृष्ण से सारी कहानी सुनकर युद्ध की तैयारी आरंभ कर दी। 


कहानी से यह स्पष्ट हो जाता है किः


१) महाभारत युद्ध के प्रमुख नायक श्रीकृष्ण थे। 


२) वह इतने महान होते हुए भी दुर्योधन की बुद्धि को युद्ध के भयानक परिणामों से नहीं डरा पाये न सन्धि करा पाये। उन्होंने भीम ने कही बात याद नहीं रखी पर द्रौपदी के दिये वचन को याद रख यत्न किया। क्या उनका वह प्रयास गंभीर था? 


३) क्या दुर्योधन इतना मूर्ख था कि कुछ दिन पहले विराटनगर युद्ध में उसके सब महारथी होते हुए सब अकेले अर्जुन से हार गये थे वह भूल गया था? 


४) श्रीकृष्ण ने बिना पांडवों से पूछे आती अमावस्या को युद्ध की घोषणा क्यूँ कर दी? क्या वही थे कर्ताधर्ता?


५) कौरव पक्ष में सब तो तैयार थे संधि के लिए एक दुर्योधन को छोड़कर, फिर क्यूँ अपने विराट रूप से अकेले दुर्योधन को वह नहीं बदल सके? अगर उन्होंने दुर्योधन के साथ भोजन ग्रहण किया होता तो शायद वह उसके क्रोध का शमन कर रास्ता निकाल सकते थे। 


६) पांडवों के पक्ष में क्षत्रिय धर्म और पैतृक संपत्ति वापस लेने का धर्म है। कौरव पक्ष में बड़े पुत्र के राज्याधिकार का अधर्म है?


७) पांडवों के पक्ष में वनवास और अज्ञातवास की शर्तें पूरी हुई थी इसलिए राज्य वापस लेना है। कौरवों के पक्ष में सूर्य केलेन्डर से अवधि समाप्त नहीं हुई थी इसलिए पांडवों को वन में वापस भेजना चाहते थे। किंतु विराटनगर युद्ध में भीष्म ने चांद्र वर्ष की गिनती कर हर पाँच वर्ष में आनेवाले दो अधिक माह को गिनती में लेकर पांडवों के पक्ष में अवधि पूरी हुई बताया था। 


८) वैसे तो धृतराष्ट्र और पाण्डु हस्तिनापुर महाराज शांतनु् के बेटे राजा विचित्रवीर्य के संतान नहीं थे। वह तो मर चुके थे। वे तो पराशर और मत्सयगंधा के प्रेमपुत्र महर्षि वेद व्यास ने विधवाओं से किये नियोग के पुत्र थे। यहाँ क्षत्रिय धर्म का बात की संगति नहीं बैठती। 


९) धृतराष्ट्र ज्येष्ठ होते हुए भी अंधे होने की वजह से राजा नहीं बन पाये लेकिन जब पाण्डु ने निवृत्ति ली तब उसे राजा स्वीकार कर लिया गया। यह बात उसे बहुत परेशान कर रही थी। यह कैसा नियम? उसका मानना था कि प्रथम बार भी उसे ही राजा घोषित करना चाहिए था। ज्येष्ठ पुत्र होते वह राजा बने तो उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र दुर्योधन बनता है। फिर पांडवों से बँटवारे का प्रश्न कहाँ? पांडवों का पक्ष था कि राज्य का विस्तार पाण्डु ने किया था और प्रथम राजा वह थे इसलिए उनका अधिकार है। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर कौरव पक्ष में रहे यह भी हक़ीक़त है। 


१०) एक बात और भी रही, पैतृक संतान की। कौरव धृतराष्ट्र-गांधारी के पुत्र थे। जबकि पांडव पाण्डु के नहीं, कुन्ती के मंत्रपुत्र थे। 


आख़िर में किसने कैसा यत्न किया यह युद्ध रोकने का, यह बात गौण हो गई। १०-१२ को छोड़कर दोनों पक्षों के हज़ारों सैनिकों और महारथियों का नाश हुआ। द्रौपदी के पाँचों पुत्र मारे गये। अभिमन्यु मरा। जिस संतानों के लिए युद्ध किया वह ही नहीं रहे। यादवों का भी यादवास्थली में श्रीकृष्ण सहित विनाश हुआ। परिणाम ख़राब ही आया। युद्ध और हिंसा से राज्य पाने का विकल्प विफल रहा। 


एक ही सिद्धि थी इस युद्ध की। हमें मिल गये एक युग पुरूष, पूर्ण पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण, और उनकी श्रीमद् भगवद्गीता जो पूरे भारत वर्ष को आज भी मार्गदर्शन दे रही है। 


महाभारत महाकाव्य महाबोध है। 


युद्ध नहीं बुद्ध सही मार्ग है। 


पूनमचंद 

२७ मई २०२२

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