Friday, March 26, 2021

अंतिम गाथा।

 अंतिम गाथा


बुद्ध कुसीनारा के शालवन उपवन में अंतिम क्षणों में मृत्यु के स्वागत में लेटे है। उन्होंने तीन बार भिक्खुओं को पूछा, किसी तरह की शंका संदेह हो तो उसके पूछकर उसके निवारण के लिये। लेकिन भिक्खुओं ने कोई प्रश्न न पूछे। एक आदमी सुभद्र जिसको ख़बर लगी कि बुद्ध देह से परिनिवृत हो रहे है, दौड़ता पहुँचा। आनंद ने रोका लेकिन वह अपने उद्विग्न मन की शांति के लिए अपने प्रश्नों के उत्तर विदा ले रहे बुद्ध से चाहता था। बुद्ध आँख मूँद चुके थे। पर सुभद्र की तड़प तीस साल की थी। सुभद्र और आनंद की बात सुन बुद्ध ने मुँदी हुई आँखें खोली और इजाज़त दी।अमूल्य मौक़ा था। सुभद्र ने प्रश्न पूछ लिये। क्या आकाश में पद है? क्या आकाश में पदचिह्न बनते है? क्या बाहर कोई श्रमण है? क्या संस्कार शाश्वत है? 


तथागत ने सुभद्र को उत्तर में आख़री दो सूत्र कहे। बड़ा सार है। 


आकासे च पदं नत्थि, समणों नत्थि बाहिरे। 

पपन्चाभिरता पजा, निप्पपन्चा तथागता। 

आकासे च पदं नत्थि, समणों नत्थि बाहिरे। 

संखारा सस्सता नत्थि, नत्थि बुद्धानमिन्जितं। 


आकाश में पथ नहीं, नहीं कोई पदचिह्न। बाहर श्रमण नहीं। लोग प्रपंच में लगे रहते है, किन्तु तथागत प्रपंचरहित है। आकाश में पथ नहीं, नहीं पदचिह्न।बाहर श्रमण नहीं। संस्कार शाश्वत नहीं और बुद्धो का कोई अता पता नहीं। 


जीवन हमारा आकाश ही तो है। कहाँ पद चिह्न छूटे? बुद्ध के पदचिह्न का तो सवाल ही नहीं। पंछी कहाँ पदचिह्न छोड़ते है? श्रमण तो रास्ता है मार्ग खोजने का। बाहरी आवाज़ से कैसे होगी खोज? अंदर की आवाज़ सुननी है। अंतर्यात्रा करनी है। और जो अंदर पहुँच गया, उसमें प्रपंच कहाँ? संस्कार ही तो हमारी यात्रा का कारण है। अनुबंधन है लेकिन संस्कार शाश्वत नहीं। बुद्ध भी देह के आख़री संस्कार छोड़ महापरिनिर्वाण हो गये। लकीरें मिटने के लिये है। बुद्ध तो असीम में खो जाना है, फिर कहाँ उसका अता और पता? न फिर कहीं आना जाना। खोज पूरी हुईं। बुंद सागर में गई। महाशून्य में विसर्जित। महापरिनिर्वाण। 


सूत्र आत्मसात् करें। 

आकासे च पदं नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे। 


खोजें। बुद्धि के पार बुद्ध को, अमृत को। 


पूनमचंद 

८ जनवरी २०२१

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